महाराजगंज(हि.स.)। दुधारू पशुओं से अधिक दूध लेने के लिए हरा चारा खिलाया जाना जरूरी है। यह पशुओं में प्रोटीन, खनिज और विटामिन सी की आपूर्ति का आधार है। बावजूद इसके पशुपालकों को हरा चारा बुवाई में कोई रुचि नहीं है। यदि किसान अपने पशुओं को नियमित तौर पर हरा चारा दें तो पशुओं के दूध देने की क्षमता में आशातीत बढ़ोत्तरी होगी।
यह कहना है पशु चिकित्सा अधिकारी डॉ अरविंद कुमार गिरी का। डॉ अरविन्द कहते हैं कि महराजगंज जिले में कुछ वन आच्छादित क्षेत्र है। इसके आसपास के क्षेत्रों के पशुपालकों को पशुओं के लिये आसानी से चारागाह मिल जाते हैं। लेकिन अधिकांश पशुपालकों को हरा चारा नहीं मिलता है अथवा न के बराबर वे हरा चारा का प्रबंध कर पाते हैं। बावजूद इसके महराजगंज के महज चार प्रतिशत पशुपालक ही हरा चारा बोते हैं। यह चिंताजनक स्थिति है। डॉ अरविंद का कहना है कि फरवरी से मार्च तक पशुपालकों को अपने पशुओं के लिए हरे चारे की बुवाई करनी चाहिए। अधिकांश यह कर रहे हैं। किसानों को पारम्परिक चारा बुवाई के साथ कुछ अन्य किस्म के चारों की बुवाई भी करनी चाहिए।
इन किस्मों की करें बुवाई:-
– पशुपालकों को ज्वार प्रजातियों यथा एमपी चरी, सूडान चरी, पूसा चरी 9, हरियाणा चरी 260 की बुवाई करें। इसकी बुवाई मार्च से जुलाई तक हो सकती है। एक हेक्टेयर की बुवाई के लिए 20 से 25 किलोग्राम बीज लगता है।
– ग्रीष्म ऋतु वाली चारी को 03 से 05 सिंचाई करें। भूमि तथा फसल की मांग के अनुसार सिंचाई करना चाहिए।
– मक्का भी पशुओं के चारे के रूप में खिलाया जाता है। मक्के में कार्बोहाइड्रेट तथा खनिज लवण की मात्रा के साथ विटामिन ए तथा विटामिन ई पर्याप्त मात्रा में मिलती है। इसकी बुवाई भी मार्च महीने में करें।
– उन्नतशील प्रजातियां अफ्रीकन टाल, मोती कम्पोजिट है।
– बाजरा का भी चारा के रूप में प्रयोग होता है। जिसके डंठल को दुधारू पशु बड़े चाव से खाते हैं। इसकी प्रजाति जायंट, पीएनएससी 1, एफएमएच 3 आदि की बुवाई मार्च से शुरू होती है।
– दलहनी फसल लोबिया भी हरा चारा है। यूपीसी 5287 तथा एचएफसी 42, परिजात, भूमि आदि हैं।
– छिटका विधि से बोने पर अधिक पैदावार देती है।
आमोद
