Sunday, May 10, 2026
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आभूषण बनती जंजीरें: अदृश्य बेड़ियों का सच

अतुल अद्वैत

क्या समाज वाकई केवल चमकदार इमारतों और तकनीक से बदलता है या हमारे मन में चुपचाप बोए गए विचार उससे भी बड़ा बदलाव लाते हैं? जब कोई समाज अपनी यादें और सोचने का तरीका खोने लगता है तो सबसे पहले क्या मरता है- इतिहास, संस्कृति या खुद इंसान? जब एक थका-हारा मजदूर दिन भर की हाड़-तोड़ मेहनत के बाद आसमान की ओर देखकर कहता है- ईश्वर की यही मर्जी थी तो वह क्या कर रहा होता है? वह सिर्फ अपनी थकान नहीं मिटा रहा होता बल्कि अनजाने में उस दर्शनशास्त्र का हिस्सा बन रहा होता है। हम अक्सर मानते हैं कि सोचना, विचार करना और दर्शन भारी-भरकम किताबों और विश्वविद्यालयों के वातानुकूलित कमरों में बैठे गिने-चुने बुद्धिजीवियों की जागीर है। लेकिन क्या सचमुच ऐसा है?

आम आदमी का सहज दर्शन

फ्रांसीसी चिंतक लुई अल्थ्यूसर ने अपनी गहरी दृष्टि से इसी बौद्धिक अहंकार को तोड़ा है। वे कहते हैं कि दुनिया का हर इंसान चाहे वह किसान हो या मजदूर अपने आप में एक दार्शनिक है। हर किसी का अपना एक सहज दर्शन होता है, जिसके चश्मे से वह दुनिया के दुख-सुख को देखता है। विडंबना यह है कि आम आदमी का यह दर्शन अक्सर नियति, सहनशीलता और समर्पण की चादर ओढ़े रहता है। हमें बचपन से यह घुट्टी पिलाई जाती है कि दुनिया जैसी है वैसी ही रहेगी। यह विचार हवा में नहीं तैरते। जब कोई व्यवस्था यह चाहती है कि शोषित वर्ग कभी बगावत न करे तो वह हथियारों से नहीं बल्कि विचारों से शासन करती है।

धर्म, नैतिकता और परंपरा

धर्म, नैतिकता और परंपरा के नाम पर लोगों को यह सिखाया जाता है कि उनकी नियति आसमान से तय होती है। यह वह आदर्शवादी दर्शन है जो सत्ता को यह गारंटी देता है कि शोषित अपनी जंजीरों को ही अपना आभूषण मान लेगा। कोई भी शासक वर्ग केवल पुलिस या सेना के दम पर कितने दिन राज कर सकता है? असली नियंत्रण तब स्थापित होता है जब सत्ता आपके दिमाग पर कब्ज़ा कर ले। स्कूल, परिवार, मीडिया और सांस्कृतिक संस्थाएं ही वे वैचारिक उपकरण हैं, जो बड़ी खामोशी से हमें व्यवस्था का आज्ञाकारी पुर्जा बनाते हैं। जब एक युवा बेरोजगारी की कतार में खड़े होकर खुद को ही कोसता है और व्यवस्था से सवाल नहीं करता तो यह उस वैचारिक जीत का सबसे बड़ा उदाहरण है। सत्ता हमारे भीतर यह भर देती है कि हम स्वतंत्र हैं। इसी तथाकथित स्वतंत्रता के भ्रम में हम उन अदृश्य बेड़ियों को चूमते रहते हैं जो हमें जकड़े हुए हैं।

सच्चा दर्शन: जीवन का संघर्ष

कोई व्यक्ति इस घुटन भरे वैचारिक ढांचे से बाहर कैसे निकले? इसका रास्ता उन साफ-सुथरी अकादमिक बहसों से नहीं निकलता, जो बंद कमरों में होती हैं। इसके लिए एक बड़े घुमाव की जरूरत पड़ती है। एक ऐसा रास्ता जो उस गैर-दर्शन से होकर गुजरता है जिसे बड़े दार्शनिकों ने सदियों से अछूत मानकर खारिज कर दिया। यह गैर-दर्शन क्या है? यह कारखानों की कालिख, शोषितों का पसीना, हाशिए पर धकेल दी गई महिलाओं और बच्चों का श्रम, जेल की सलाखें और पागलखानों का वह सन्नाटा है जिस पर कभी बात नहीं होती। जब दर्शनशास्त्र अपनी किताबी दुनिया से बाहर निकलकर इस ज़मीनी यथार्थ से टकराता है तब उसे अपनी असलियत समझ आती है।

संघर्ष से दर्शन की निर्मिति

अकादमिक और आदर्शवादी दर्शन ने कभी झुलसते यथार्थों पर बात नहीं की। उसने हमेशा शुद्ध विचारों की बात की। ज़मीन और श्रम की बात करने पर उसे सत्ता के शोषण पर सवाल उठाने पड़ते। जब एक साधारण इंसान अपने हाथों से प्रकृति को गढ़ता है या जब एक स्त्री पितृसत्ता की बेड़ियों को तोड़कर सड़क पर उतरती है तो वे एक नए यथार्थवादी दर्शन को जन्म दे रहे होते हैं। एक कारखाने का मजदूर जब अपनी मशीन के पुर्जों को एक नए तरीके से जोड़ता है तो वह केवल उत्पादन नहीं कर रहा होता। वह जीवन के भौतिक नियमों को अपने संघर्ष से समझ रहा होता है। उनका यह संघर्ष कोरी किताबी बात नहीं है बल्कि वह सच्चा भौतिकवादी दर्शन है। जो यह कहता है कि दुनिया किसी जादुई शक्ति से नहीं, बल्कि इंसानी हाथों की मेहनत से बदलती है।

समाज की दशा बदलते विचार

इतिहास गवाह है कि विचारों ने हमेशा समाज की दिशा तय की है। जब पंद्रहवीं और सोलहवीं सदी के साहसी नाविकों ने अछूते महासागरों को पार कर नई दुनिया की खोज की तो वे केवल नक्शे नहीं बदल रहे थे। वे पुराने धर्म और सत्ता के उस खोखले दर्शन को भी तोड़ रहे थे जिसने मनुष्य की चेतना को एक सीमित दायरे में कैद कर रखा था। इसी तरह जब आम आदमी अपने अधिकारों के लिए खड़ा होता है तो वह केवल व्यवस्था का विरोध नहीं कर रहा होता। वह एक नई राजनीतिक और वैचारिक ज़मीन तैयार कर रहा होता है। यह ज़मीन उन करोड़ों लोगों के संघर्ष से बनती है जिनके पास लड़ने के लिए अपनी चेतना और अपने खाली हाथों के सिवा कोई दूसरा हथियार नहीं होता।

काल्पनिक सुख या यथार्थ आभास

समाज को बांधे रखने के लिए कला, साहित्य और मनोरंजन का भी गहरा इस्तेमाल होता है। हम जिस कला या सिनेमा को अपनी थकान मिटाने का जरिया मानते हैं, वह हमें एक काल्पनिक सुख देता है। यह सुख हमें असली समस्याओं से दूर ले जाकर उसी व्यवस्था का अंधा समर्थक बना देता है जिसने हमें हाशिए पर धकेला है। एक आम इंसान के लिए अपने उस अचेतन मन को समझना बहुत मुश्किल होता है जो बाहर से थोपी गई इच्छाओं को अपनी असली चाहत मान बैठता है। विचारधारा कोई सीधा-सादा झूठ नहीं है। यह यथार्थ और भ्रम का एक ऐसा खतरनाक मिश्रण है जो हमें अपनी ही वास्तविकता से दूर ले जाता है।

सत्य सत्ता के लिए

दरअसल, दर्शनशास्त्र शांति से बैठकर सोचने का नाम नहीं है। यह एक युद्ध का मैदान है- सिद्धांतों का युद्ध। अगर हम अपने पसीने, अपनी पीड़ा और अपने अधिकारों से अपना खुद का दर्शन नहीं गढ़ेंगे तो कोई और अपना दर्शन हमारे दिमाग पर थोप देगा। सवाल यह नहीं है कि दुनिया का सत्य क्या है? सवाल यह है कि उस सत्य को कौन और किसके लाभ के लिए गढ़ रहा है। यह एक वैचारिक हथियार है और अगर शोषित वर्ग इस हथियार को नहीं उठाएगा तो शासक वर्ग इसका इस्तेमाल उन पर करता रहेगा।

मनुष्य होने का अर्थ

जब आप खुद को परिस्थितियों के सामने बेबस महसूस करें और सोचें कि शायद ऐसा ही होना लिखा था तो एक पल के लिए रुकिएगा। अपने भीतर झांककर पूछिएगा कि क्या यह आवाज़ सचमुच आपकी है या यह उस व्यवस्था की आवाज़ है जो चाहती है कि आप हमेशा सिर झुकाए रखें? जब एक पूरा समाज सवाल करना बंद कर देता है तो वह केवल अपनी आज़ादी नहीं खोता। वह अपने मनुष्य होने का अर्थ ही खो देता है। अब यह हमें तय करना है कि हम अपनी सोच के असली मालिक बनेंगे या किसी और के विचारों का हथियार।

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