Friday, May 8, 2026
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अभिव्यक्ति का शोर या विचार का मौन

अतुल अद्वैत

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19(1)(a) अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रदान करता है लेकिन क्या यह स्वतंत्रता अपने आप में पूर्ण है? क्या कोई व्यक्ति वैचारिक रूप से परतंत्र होते हुए भी अभिव्यक्ति के स्तर पर स्वतंत्रता का दावा कर सकता है? आज, जब अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता अपने चरम पर दिखाई देती है, तब यह प्रश्न और भी महत्वपूर्ण हो जाता है कि कहीं स्वतंत्र अभिव्यक्ति की होड़ में हम स्वतंत्र रूप से विचार करना तो नहीं भूल रहे हैं? अंततः एक गंभीर प्रश्न उभरता है-मानव स्वातंत्र्य के केंद्र में वास्तव में स्वतंत्र क्या है: हमारे विचार या हमारी अभिव्यक्ति?

विचार : अभिव्यक्ति का बीज

मनुष्य की सबसे बड़ी विशेषता उसकी भाषा नहीं अपितु उसका विचार है। विचार की अभिव्यक्ति मनुष्य की सबसे बड़ी सामाजिक शक्ति है। यदि हम इस प्रक्रिया को गहराई से समझें तो विचार भीतर जन्म लेता है और अभिव्यक्ति बाहर आकार ग्रहण करती है। विचार उस बीज की तरह है जिसके बिना अभिव्यक्ति के वृक्ष की कल्पना भी नहीं की जा सकती। बीज के बिना वृक्ष का कोई अस्तित्व नहीं होता और वृक्ष के बिना बीज की पहचान अधूरी रह जाती है। आज की वैचारिक शून्यता की त्रासदी यह है कि हमने बीज अर्थात् विचार को सींचना छोड़ दिया और केवल वृक्ष अर्थात् अभिव्यक्ति की टहनियों पर ध्यान केंद्रित कर दिया है। हमें यह याद रखना होगा कि विचार के बिना अभिव्यक्ति केवल ध्वनि मात्र एक शोर बनकर रह जाती है।

स्वतंत्र विचार : चेतना का प्रथम स्पंदन

विचार वास्तव में मनुष्य की अंतरात्मा का प्रथम स्पंदन है। यह वह अदृश्य प्रक्रिया है जो हमारे भीतर निर्मित होती है। पूर्व से बनी-बनाई धारणाओं पर प्रश्न करती है। संशय को जन्म देती है और अंततः सत्य की ओर हमारी यात्रा का आरंभ करती है। यदि किसी मनुष्य के भीतर स्वतंत्र रूप से सोचने की क्षमता या स्वतंत्रता न हो तो वह बोल तो सकता है परंतु उसका बोलना अर्थहीन होगा। बिना विचार के वाणी केवल कंठ का कंपन बनकर रह जाती है। उसमें चेतना का कोई प्रकाश नहीं होता। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तभी अपने सही अर्थों में सार्थक है, जब उसके पीछे विचार की एक सशक्त और स्वतंत्र पीठिका हो। यदि विचार का दमन हो जाए तो अभिव्यक्ति का तेज स्वतः मंद पड़ जाता है। यदि विचार स्वच्छंद और मुक्त हो तो वही अभिव्यक्ति सृजन, साहस और नई सभ्यता का रूप धारण कर लेती है।

जॉन स्टुअर्ट मिल और वैचारिक स्वतंत्रता

वैचारिक स्वतंत्रता के महत्त्व को महान दार्शनिक जॉन स्टुअर्ट मिल ने अत्यंत प्रभावशाली ढंग से रेखांकित किया था। वे अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ऑन लिबर्टी में स्पष्ट करते हैं कि यदि संपूर्ण मानव-जाति एक ओर हो और उसके विरुद्ध केवल एक व्यक्ति की राय हो तब भी उस अकेले व्यक्ति की आवाज़ को दबाना न्यायसंगत नहीं हो सकता। किसी भी स्थिति में बहुमत का मत अल्पमत को निगल नहीं सकता। मिल की यह स्थापना केवल भाषण की स्वतंत्रता की वकालत नहीं करती, बल्कि यह मानव की बौद्धिक स्वतंत्रता की सबसे बड़ी रक्षा है। उनका मानना था कि विचारों के खुले संघर्ष से ही सत्य अधिक उज्ज्वल होकर सामने आता है। बिना असहमति के सत्य की वास्तविक परीक्षा संभव नहीं है और केवल मुक्त चेतना ही ज्ञान का वास्तविक विस्तार कर सकती है।

असुविधाजनक सत्य कहने का साहस

प्रसिद्ध पुस्तक 1984 और ऐनीमल फर्म के लेखक जार्ज ऑरवेल का कथन आज भी हमारे लिए एक मार्गदर्शक की तरह है। ऑरवेल कहते हैं- स्वतंत्रता का अर्थ लोगों को वह बताने का अधिकार है, जो वे सुनना नहीं चाहते। यह उक्ति इस कठोर सत्य को प्रतिध्वनित करती है कि स्वतंत्रता केवल वही कहने का नाम नहीं है, जो सत्ता या समाज को सुविधाजनक लगे। सच्ची स्वतंत्रता असुविधाजनक सत्य कहने का साहस है। अभिव्यक्ति उसी क्षण मूल्यवान बनती है जब वह सत्ता के अहंकार, समाज की रूढ़ियों और भीड़ के दबाव से परे जाकर अपने अंतरतम के सत्य को निर्भय होकर प्रकट कर सके। यही कारण है कि एक वास्तविक मुक्त समाज केवल बोलने की अनुमति नहीं देता बल्कि असहमति को भी अपनी व्यवस्था का अनिवार्य अंग मानता है।

विचार और अभिव्यक्ति : दो अलग द्वीप नहीं

विचार और अभिव्यक्ति को अलग-अलग द्वीप समझना हमारी सबसे बड़ी भूल होगी। विचार यदि मन की निजी संपत्ति है तो अभिव्यक्ति उसका सार्वजनिक रूप है। विचार भीतर सत्य की खोज करता है जबकि अभिव्यक्ति उस सत्य को समाज के सामने रखती है। विचार का क्षेत्र मौन और एकांत का है जबकि अभिव्यक्ति का क्षेत्र संवाद और विमर्श का है। विचार व्यक्ति का निर्माण करता है और अभिव्यक्ति पूरे समाज को गढ़ती है। इसलिए विचार का स्वतंत्र रहना केवल किसी व्यक्ति का वैयक्तिक अधिकार नहीं, बल्कि संपूर्ण मानव सभ्यता की मूल शर्त है। इतिहास साक्षी है कि जो समाज विचार करने की स्वतंत्रता छीन लेता है, वह आगे चलकर बोलने की स्वतंत्रता भी खो देता है।

इको-चेंबर और तोते की अभिव्यक्ति

आज के इको-चेंबर वाले युग में तोते और मनुष्य के अंतर को समझना अत्यंत आवश्यक हो गया है। तोता किसी भी शब्द को रटकर दोहरा सकता है लेकिन वह कोई नया अर्थ नहीं रच सकता। वह केवल ध्वनि की नकल कर सकता है, विवेक की नहीं। मनुष्य की महानता इसी में निहित है कि वह केवल बोलता नहीं, बल्कि सोचता भी है। अभिव्यक्ति की वास्तविक सार्थकता विचार की उसी आंतरिक गरिमा से उत्पन्न होती है। जब तक मनुष्य का भीतर स्वतंत्र नहीं होगा, तब तक बाहर का भाषण भी उधार लिया हुआ, यांत्रिक और पराधीन रहेगा। सच्ची अभिव्यक्ति अनुकरण से नहीं बल्कि मौलिक विचार से जन्म लेती है। इसलिए विचार को प्राथमिक और अभिव्यक्ति को उसकी परिणति कहना अधिक न्यायसंगत होगा।

लोकतंत्र का वास्तविक मर्म

यदि हम इसे अपने राष्ट्र और लोकतंत्र के संदर्भ में देखें तो लोकतंत्र का वास्तविक मर्म भी विचार और अभिव्यक्ति के इसी संबंध में निहित है। लोकतंत्र केवल चुनाव के दिन मशीन का बटन दबाकर मत देने की प्रक्रिया नहीं है बल्कि यह स्वतंत्र रूप से मत बनाने की संस्कृति है। मत निर्माण के लिए स्पष्ट विचार चाहिए और विचार के लिए पूर्ण स्वतंत्रता आवश्यक है। यदि समाज में केवल सत्ता की ‘हाँ में हाँ’ मिलाने की प्रवृत्ति शेष रह जाए और व्यवस्था से प्रश्न करने की स्वस्थ परंपरा समाप्त हो जाए तो समझ लेना चाहिए कि लोकतंत्र के भीतर से नागरिकता की भावना क्षीण हो रही है। स्वतंत्र अभिव्यक्ति का उद्देश्य केवल विरोध करना नहीं होता बल्कि समाज के विवेक को सार्वजनिक करना होता है। यही स्वतंत्र अभिव्यक्ति सत्ता को जनता के प्रति उत्तरदायी बनाती है। समाज को आत्मालोचन करना सिखाती है और व्यक्ति को अपने निजी पूर्वाग्रहों से ऊपर उठने की शक्ति देती है।

विचारशील व्यक्ति बनो

जर्मन दार्शनिक हेगेल का प्रसिद्ध कथन है- व्यक्ति बनो। इस उक्ति का अर्थ केवल जैविक रूप में अस्तित्व होना नहीं बल्कि वैचारिक चेतना, तर्कसंगतता और स्वतंत्रता को आत्मसात करना है। विचार एक जड़ है और अभिव्यक्ति उसकी शाखा; विचार अग्नि है तो अभिव्यक्ति उस अग्नि की ज्वाला। यदि जड़ ही सूख जाए तो शाखाओं के हरे रहने की कोई संभावना नहीं रहती। यदि भीतर की अग्नि बुझ जाए, तो बाहर की ज्वाला भी अर्थहीन हो जाती है। मनुष्य की वास्तविक मुक्ति तब आरंभ होती है, जब वह बिना किसी भय के स्वतंत्र रूप से सोच सके और उतने ही साहस के साथ अपनी बात कह सके। विचार के बिना अभिव्यक्ति अधूरी है और अभिव्यक्ति के बिना विचार खोखला। इन दोनों का संतुलन ही एक स्वतंत्र चेतना, सुसंस्कृत समाज और जीवंत राष्ट्र की वास्तविक पहचान है। एक जिम्मेदार नागरिक के रूप में हमारी सबसे बड़ी चुनौती यह है कि हम केवल बोलने की मशीन न बनें बल्कि सोचने वाले मनुष्य बने रहें।

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