अतुल अद्वैत
क्या आप सचमुच खुद से सोच रहे हैं या केवल अपनी मोबाइल स्क्रीन पर दूसरों के विचारों को स्क्रॉल कर रहे हैं? क्या हज़ारों पुस्तकें पढ़ लेने के बाद कोई महान विचारक बन सकता है? आज के डिजिटल युग में, जहाँ हर समय नई जानकारी हमारी आँखों के सामने चमकती है, कहीं हमने स्वतंत्र रूप से सोचना तो नहीं छोड़ दिया? कहीं हम डेटा के मूक उपभोक्ता बनकर तो नहीं रह गए हैं? ये प्रश्न आज के समय की सबसे बड़ी चुनौती हैं।
पढ़ना और सोचना: दो अलग ध्रुव
कहा जाता है कि स्टालिन की निजी पुस्तकालय में लगभग पच्चीस हज़ार पुस्तकें उपलब्ध थीं। हिटलर एक दिन में पूरी किताब समाप्त कर देता था और माओ देर रात तक पुस्तक पढ़ता रहता था। फिर भी क्या इन तीनों को स्वतंत्र विचारक कहा जा सकता है? अपनी पुस्तक ‘मास्टर योर थिंकिंग’ में लेखक थिबॉ म्यूरिस इस प्रश्न को पाठक के सामने प्रस्तुत करते है । वे लिखते हैं कि पढ़ना और सोचना दो नितांत अलग क्रियाएँ हैं। आज हर व्यक्ति के हाथ में स्मार्टफ़ोन है और वह सूचनाओं की बाढ़ में डूबा हुआ है। हम लगातार पढ़ रहे हैं, स्क्रॉल कर रहे हैं लेकिन क्या हम सचमुच सोच भी रहे हैं? हमें यह भ्रम होता है कि जो बहुत पढ़ता है, वह बहुत बड़ा विचारक होता है। जर्मन दार्शनिक शोपेनहावर इस भ्रम को तोड़ते हैं। उनका कहना है कि जब हम पढ़ते हैं तो कोई और व्यक्ति हमारे लिए सोच रहा होता है। हम केवल उसकी मानसिक प्रक्रिया को दोहराते हैं। खाली समय में लगातार किसी पुस्तक को पढ़ते रहना दिमाग के लिए शारीरिक मज़दूरी से भी ज़्यादा लकवा मारने वाला हो सकता है। जब कोई व्यक्ति अपने मस्तिष्क में लगातार दूसरों के विचारों को भरता रहता है तो वह खुद सोचने की क्षमता खो देता है।
तानाशाहों का अध्ययन और उनकी विचारहीनता
अब ज़रा स्टालिन या हिटलर जैसे तानाशाहों के पढ़ने की आदत पर विचार करें। स्टालिन लाइब्रेरी में इतिहास, दर्शन और राजनीति की बहुत किताबें पढ़ता था लेकिन उसका पढ़ना स्वतंत्र चिंतन के लिए नहीं था। वह एक कट्टर मार्क्सवादी था। वह सिर्फ अपनी विचारधारा को सही साबित करने के लिए पढ़ता था। ऐसे लोग पुस्तकों का अध्ययन अपने विचारों को चुनौती देने के लिए नहीं बल्कि पहले से पुष्ट विचारों को और मजबूत रखने के लिए करते हैं। अत्यधिक पुस्तकों को पढ़ने के बाद भी स्वयं से कुछ न सोच पाने का परिणाम क्या होता है? इसका सबसे खौफनाक उदाहरण नाज़ी अधिकारी एडॉल्फ इकमैन था। इस पर लाखों यहूदियों को मारने का आरोप था। प्रख्यात दार्शनिक हन्ना आरेंड्ट ने जब इकमैन के मुक़दमे को कवर किया तो उन्होंने पाया कि उसमें स्वतंत्र आलोचनात्मक चिंतन की क्षमता नहीं थी। यह कोई मूर्खता नहीं थी बल्कि यह पूरी तरह से विचारहीनता थी। जब व्यक्ति दूसरे के नियमों और आदेशों पर बिना चिंतन किए कार्य करने लगता है तो वह सबसे बड़ी बुराई को जन्म देता है।
ज्ञान बनाम विवेक का संकट
आज के डिजिटल युग में हम एक नए तरह के संकट का सामना कर रहे हैं। निकोलस कार अपनी पुस्तक ‘द शैलोज़’ में लिखते हैं कि कैसे इंटरनेट और डिजिटल उपकरण हमारे दिमाग को बदल रहे हैं। आज हम सूचनाओं से इतने घिरे हुए हैं कि हमारे भीतर एकाग्रता समाप्त हो रही है। इंटरनेट हमारे भीतर और अधिक सूचनाओं को निगलने की भूख को जन्म देता है। इसके कारण हमारा दिमाग किसी विषय पर गहराई से चिंतन नहीं कर पा रहा है। क्या ढेर सारी सूचनाएं हमें बुद्धिमान बना रही हैं? हम एक ऐसी दुनिया में रह रहे हैं जहां सूचनाएँ भरी पड़ी है लेकिन हमारे पास विवेक का भारी अकाल है। हम इन दोनों को एक ही समझ लेते हैं। हम सोचते हैं कि ज़्यादा सूचनाएं होने से ज़्यादा ज्ञान मिलेगा और उससे हम विवेकशील बनेंगे लेकिन यह सोच सत्य नहीं है। बिना सही चिंतन के अधिक सूचनाएं हमारी समझ को और उलझा देती हैं।
विचारों को दिशा देना
सोशल मीडिया ने हमारी स्थिति ऐसी कर दी है कि हम दूसरों के विचारों को ही अपना विचार मान बैठते हैं। शोपेनहावर कहते हैं कि जो विचार हमने किसी और से पढ़कर अपनाए हैं, वे किसी अजनबी के उतारे हुए पुराने कपड़ों की तरह हैं। पढ़ना वास्तव में अपने सिर के बजाय किसी दूसरे के सिर से सोचने के बराबर है। जब तक हम दूसरे की पढ़ी बातों को स्वयं के चिंतन से नहीं तपाते, तब तक वे विचार हमारे अपने नहीं हो सकते। थिबॉ म्यूरिस अपनी पुस्तक ‘मास्टर योर थिंकिंग’ में बताते हैं कि कैसे हमारे सोचने के तरीके अक्सर त्रुटिपूर्ण होते हैं। ऐसे तरीके तनाव बढ़ाते हैं और हमारी प्रगति को रोकते हैं। हमारा तर्क अक्सर बेबुनियाद मान्यताओं और संज्ञानात्मक पूर्वाग्रहों (Cognitive Biases) से प्रभावित होता है। एक स्वतंत्र विचारक बनने के लिए हमें अपने दिमाग में चल रहे विचारों और पूर्वाग्रहों की खुद समीक्षा करनी चाहिए। यह तभी संभव है जब हम सूचनाओं को सिर्फ निगलना बंद करें और उन पर सवाल उठाना शुरू करें।
विचार की ओर वापसी
आज की तेज़ रफ़्तार दुनिया में इसका उपाय क्या है? इसका एक शानदार उपाय महात्मा गांधी के जीवन में मिलता है। गांधीजी ‘स्लो रीडिंग’ और चिंतन के हिमायती थे। उन्होंने पढ़ने-लिखने को औद्योगिक युग की अंधाधुंध रफ़्तार को धीमा करने के एक साधन के रूप में देखा। अगर हमें गहराई से सोचना है तो हमें पढ़ने की गति को धीमा करना होगा। किसी लेख या विचार के बीच में रुकना, उस पर चिंतन करना और उसके बाद आगे बढ़ना चाहिए। यही स्वतंत्र विचार की ओर पहला कदम है। किताबें हमें उड़ान देती हैं पर दिशा केवल विचार तय करती है। स्टालिन, हिटलर या माओ की पढ़ाई का वज़न इतिहास को नहीं बचा सका क्योंकि उनके पास स्वतंत्र चिंतन का साहस नहीं था। आज हमारा युद्ध अज्ञानता से नहीं बल्कि अंधविश्वास और सतही सूचना से है। थिबॉ म्यूरिस की पुस्तक केवल एक लेखक का काम नहीं बल्कि एक समय की पुकार है। हमें पढ़ना जारी रखना चाहिए लेकिन थोड़ी देर तहर कर सोचना जरूर चाहिए। जब तक हम दूसरे के शब्दों को अपने सवालों से नहीं तौलेंगे, तब तक हम केवल शोर का हिस्सा बने रहेंगे।
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