कानपुर(हि.स.)। निर्जला (भीमसेनी) एकादशी के अवसर पर शुक्रवार को श्रद्धालुओं ने गंगा स्नान करने के बाद पूजा-अर्चना कर श्रद्धानुसार दान किया। भारतीय संस्कृति व सनातन धर्म में निर्जला (भीमसेनी) एकादशी का बड़ा महत्व माना गया है। ऐसी मान्यता है कि जो भी महिला व पुरुष निर्जला एकादशी के दिन अन्न-जल का त्याग कर भगवान विष्णु की आराधना करता है तो उसे मोक्ष की प्राप्ति होती हैं। निर्जला (भीमसेनी) एकादशी को लेकर आचार्य पं. शिवम शुक्ला ने इस व्रत को लेकर कई अहम जानकारियां दीं।
वे बताते हैं कि निर्जला एकादशी के दिन सबसे पहले स्नान कर के भगवान विष्णु की पूजा करनी चाहिए। खीर का भोग लगाएं, इसमें तुलसी का पत्ता अवश्य डालें। तुलसी पत्र सहित खीर से भगवान विष्णु का भोग लगाने पर घर-परिवार में शांति बनी रहती है। भगवान विष्णु को पीले रंग के वस्त्र, फल और अनाज अर्पित करना चाहिए। भगवान विष्णु की पूजा करने के उपरांत इन चीजों को किसी ब्राह्मण को दान देना चाहिए। ऐसा करने से घर में कभी क्लेश नहीं होते हैं।
आचार्य ने बताया कि निर्जला एकादशी को भीमसेनी एकादशी क्यों कहा जाता है, इसके पीछे भी एक कथा। उन्होंने बताया कि प्राचीन काल में ऋषि वेद व्यास ने पांडवों व उनकी माता को प्रत्येक माह निर्जला एकादशी व्रत करने को कहा था। जिसको लेकर भीमसेन ने कहा कि मुझसे व्रत नहीं रहा जाता है क्योंकि मुझे भूख बहुत लगती है। क्या इसका कोई और उपाय नहीं है कि इस व्रत का लाभ मिल सके और सिर्फ एक ही बार उपवास रहना पड़े। तो वेद व्यास ने बताया कि ज्येष्ठ मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी के दिन व्रत व दान करने से मृत्यु के बाद मोक्ष की प्राप्ति होती हैं। इसीलिए इस व्रत को निर्जला एकादशी व भीमसेनी एकादशी भी कहा जाता है।
हिमांशु/दीपक
