Sunday, September 27, 2026
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नरेंद्र मोदी: संवाद और कर्मयोग से बना व्यक्तित्व

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिन (17 सितंबर) पर विशेष

प्रो. संजय द्विवेदी

राजनीति में संवाद की बड़ी भूमिका है। कुशल नेतृत्व के लिए नेतृत्वकर्ता का कुशल संवादक होना अत्यंत आवश्यक है। संवाद की इसी प्रक्रिया को भारत के माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक क्रांतिकारी दिशा दी है। आम आदमी से जुड़कर सीधे संवाद करने की कला को मोदी ने पुन: जीवित कर जनता को ‘प्रधान’ का दर्जा दिया है और स्वयं ‘सेवक’ की भूमिका का निर्वहन कर रहे हैं। वे भारत और भारतीय जन को संबोधित करने वाले नेता हैं। उनकी देहभाषा और उनकी जीवन यात्रा भारत के उत्थान और उसके जनमानस को स्पंदित करती है। यह कहने में संकोच नहीं करना चाहिए कि नरेंद्र मोदी उम्मीदों को जगाने वाले नेता हैं।

नरेंद्र मोदी के व्यक्तित्व का विश्लेषण करते हुए अक्सर लोग ये प्रश्न पूछते हैं कि आखिर उनकी सफलता का राज क्या है? आखिर वो कौन सी चीज है, जो उन्हें भारत की मौजूदा राजनीति में नेताओं की भीड़ में सबसे अलग और सबसे खास बनाती है? असल में नरेंद्र मोदी की यात्रा एक साधारण इंसान के असाधारण बनने की कहानी है। वो आज जिस मुकाम पर हैं, इसमें उनकी संवाद शैली की सबसे अहम भूमिका है। उनके भाषणों की गूंज सिर्फ देश में ही सुनाई नहीं देती, बल्कि उन्होंने अपनी अनूठी संचार कला से दुनिया भर को प्रभावित किया है। वो बोलते हैं तो हर किसी के लिए उनके पास कुछ ना कुछ रहता है, वो अपनी बात जिस तरीके से समझाते हैं और लोगों को प्रभावित करते हैं, उससे लोग प्रेरित होते हैं।

अपनी संवाद कला से प्रधानमंत्री मोदी ने देश के नेताओं को लेकर सोचने के बने-बनाए ढर्रे को तोड़ने का काम किया है। आम लोग जब नेताओं के भाषणों से उकता गए थे, जब चारों ओर निराशा घर कर चुकी थी, तब उनके भाषणों ने हताश-निराश माहौल के अंधेरे को छांटने का काम किया। वो आए और लोगों के दिलो-दिमाग पर छा गए। अपने जीवन में मन-वचन-कर्म को एक कर उन्होंने करोड़ों लोगों में अपनी अद्भुत भाषण शैली से नई जान डाल दी। याद कीजिए 13 सितंबर, 2013 का वो दिन, जब नरेंद्र मोदी को भारतीय जनता पार्टी ने 2014 के लोकसभा चुनाव की कमान सौंपी और उन्हें प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया।

महज 6 महीने के भीतर शुरू हो रहे आम चुनावों में उन्हें पार्टी ने सवा अरब भारतवासियों के साथ संवाद करने की जिम्मेदारी सौंपी। और तब जिस जोरदार तरीके से उन्होंने रैलियों में अपने अनूठे अंदाज वाले भाषणों से समां बांधा, उस चुनाव अभियान ने एक बारगी पूरे विश्व को अचंभित कर दिया। बगैर थके-बगैर रुके और बगैर एक भी सभा स्थगित किए, नरेंद्र मोदी ने 440 रैलियों के साथ पूरे देश की 3 लाख किलोमीटर की बेहद थकाऊ यात्रा महज 6 महीने में पूरी कर रिकॉर्ड कायम किया। इस चुनावी कैंपेन में उनके ओजस्वी भाषणों में कुछ ना कुछ नया और अनूठा था। काशी में जब मोदी की चुनावी सभा पर प्रशासन द्वारा रोक लगाई गई, तब उन्होंने कहा था, “मेरी मौन भी मेरा संवाद है।” इस एक वाक्य ने पूरे देश को उनके करिश्माई नेतृत्व में ऐसा गूंथ दिया कि भारतीय जनमानस में आत्माभिमान और आत्मगौरव वाले राजनीतिक नेतृत्व को लेकर एक नई बहस पैदा हो गई।

नरेंद्र मोदी ने श्रोताओं के हिसाब से अपने भाषणों में बदलाव किया, जो उनकी शैली की सबसे बड़ी खासियत भी बनी। अपने चुनावी अभियान में मोदी ने युवाओं और वृद्ध दोनों आयु वर्ग के लोगों को प्रभावित किया। मोदी ने रटे-रटाए भाषणों के बजाय लय में बात रखी, जिसने अपेक्षाकृत अधिक लोगों के दिलों को छुआ। अपनी बॉडी लैंग्वेज में मोदी हाथों और उंगलियों का शानदार इस्तेमाल करते हैं। अपने शब्दों के हिसाब से वह चेहरे पर भाव लाते हैं । तर्कों को जब आंकड़ों और शानदार बॉडी लैंग्वेज का साथ मिलता है, तो भाषण अधिकतम प्रभाव छोड़ता है। मोदी अपने विजन को लोगों तक पहुंचाने के लिए आंकड़ों का खूब इस्तेमाल करते हैं। जरुरतों और उपलब्धता के आंकड़े अपने भाषणों में इस्तेमाल कर मोदी ने मुश्किल समस्याओं को आसानी से लोगों के सामने रखा। महान वक्ता इतिहास के किस्सों से अपने भाषणों को जीवंत बनाते हैं। अपनी बात को प्रभावी तरीके से रखने के लिए वे मुस्कुराहट, नारों और लयात्मक शब्दों का इस्तेमाल करते हैं। कई बार अच्छे वक्ता एक कहानी के माध्यम से ही अपनी बात और इरादे साफ कर देते हैं। नरेंद्र मोदी इस कला में निपुण हैं। उनके ‘वन लाइनर्स’ भाषण को यादगार बना जाते हैं।

विदेशों में बसे भारतीय मूल के लोगों को जब वे संबोधित करते हैं, तब भी ऐसा ही होता है। प्रधानमंत्री मोदी ने भारत की ‘सॉफ्ट पॉवर’ को पेश करने के लिए खास तौर पर प्रवासी भारतीयों पर ध्यान दिया है। चूंकि विदेशों में गए प्रवासी भारतीय काफी प्रभावशाली भूमिकाओं में हैं, इसलिए प्रधानमंत्री ने विभिन्न देशों के प्रमुख शहरों (जैसे कि ब्रसेल्स या दुबई) में विशेष कार्यक्रम आयोजित किए, जिससे मजबूत संदेश दिया जा सके। ये प्रवासी भारतीय विदेश नीति संबंधी प्रयासों में एक अहम तत्व हैं और साथ ही भारत की ‘सॉफ्ट पॉवर’ को आगे भी बढ़ा रहे हैं। मोदी सोशल मीडिया और पारंपरिक मीडिया का जम कर उपयोग करते हैं। मीडिया प्रबंधन की उनके पास कारगर रणनीति है। वे सोशल मीडिया की अहमियत को हमेशा स्वीकार करते रहे हैं और इसलिए लोगों को सीधे इसी के जरिए संबोधित करते हैं। प्रधानमंत्री मोदी उन शुरुआती नेताओं में से हैं, जिन्होंने हाल के समय में शुरू हुए ‘सेल्फी ट्रेंड’ के महत्व को समझा और इसका उपयोग उन्होंने अपने प्रचार के लिए किया।

मोदी के बेहद लोकप्रिय ट्विटर अकाउंट पर सेल्फी को काफी महत्वपूर्ण जगह मिलती है और इस कारण युवाओं में उनकी काफी लोकप्रियता है। संचार को ले कर वे जैसी रणनीति बनाते हैं, वो सबसे अलग है। साल 2014 के प्रचार के दौरान उन्होंने होलोग्राम तकनीक का इस्तेमाल किया, ताकि एक साथ उन्हें कई जगह पर देखा जा सके। संचार की यह रणनीति उनकी ‘लार्जर दैन लाइफ’ छवि बनाने में मददगार साबित हुई। नरेंद्र मोदी लोगों से सीधा संवाद कायम करने में सक्षम भी हैं और इच्छुक भी हैं। मोदी जब विदेश जाते हैं, उस दौरान वहां के लिए संदेश देने के लिहाज से भी सोशल मीडिया ही उनकी पहली पसंद है। वे दूसरे देशों के लोगों के सामने उनकी अपनी भाषा में बात रखते हैं। यह भारतीय कूटनीति के तरकश में एक तीर है। सोशल मीडिया के जरिए पब्लिक डिप्लोमेसी आधुनिक कूटनीति का एक अहम साधन है, जिसका उद्देश्य खास तौर पर अपनी ‘सॉफ्ट पॉवर’ को पेश करना है। नरेंद्र मोदी इस कूटनीति के माहिर खिलाड़ी हैं।

लेकिन क्या मोदी का व्यक्तित्व सिर्फ भाषणों ने गढ़ा है? असल में नरेंद्र मोदी ‘मैन ऑफ एक्शन’ हैं। उन्हें मालूम है कि किस चीज को कैसे किया जाता है और भाषण की चीजों को एक्शन में कैसे लाया जाता है। लक्ष्य केंद्रित मोदी को मालूम है कि उनकी जिंदगी का उद्देश्य क्या है? 2014 में ब्यूरोक्रेसी के साथ सारे सहयोगियों को समय पर आने के आग्रह की शुरुआत प्रधानमंत्री खुद दफ्तर में ठीक 9 बजे हाजिर होकर शुरु करते हैं। उनका ये एक कार्य ही मातहतों के लिए साफ संकेत था कि प्रधानमंत्री किस तरह की कार्यशैली के कायल हैं। एक तंत्र, जो अरसे से चलता आ रहा है, प्रवृत्ति का शिकार है, उस तंत्र को भीतर से दुरुस्त कर उसे इस तरह सक्रिय करना कि देखते ही देखते सारा काम पटरी पर आ जाए। ये कमाल उस नेतृत्व का है, जिसके आते ही प्रशासन में लोग खुद को बदलने के लिए मजबूर हो गए।

जापान दौरे में ताइको ड्रम बजाकर उन्होंने जिस तरह से संसार भर को खुद के भीतर लय-सुर-ताल की समझ रखने वाले शख्स का अहसास कराया, उसने क्षण भर में ही उनके भीतर मौजूद हर मौके पर आम लोगों की दिलचस्पी के मुताबिक काम करने वाले बहुआयामी शख्सियत को सामने ला दिया। जो बताता है कि मोदी को मालूम है कि आखिर उनके सामने दर्शक वर्ग उक्त समय में क्या सुनना पसंद करेगा और किस तरह के बर्ताव और संवाद की अपेक्षा लोग उनसे करेंगे। लोकप्रिय भाषण देने में वो समकालीन नेताओं में सबसे आगे दिखाई देते हैं, क्योंकि उनके भाषणों के पीछे कठोर तपस्या और कर्म-साधना का बल खड़ा रहता है। हर जगह के हिसाब से उनके भाषणों का मिजाज अलग होता है। स्थानीय बोलियों के साथ देश की अनेक मातृभाषाओं में जनता के साथ वो सीधा संवाद करते हैं। स्थानीय लोकोक्तियों और स्थानीय लोगों की जिंदगी से जुड़े मार्मिक प्रसंगों का वो सहारा लेते हैं। मोदी अपने भाषणों में अक्सर जरुरत के अनुसार कहीं सख्त प्रशासक, तो कहीं नरमदिल और उदार नेता के तौर पर खुद की भावनाओं को आगे रखते हैं।

जिंदगी के रास्ते में उनके ऊपर फेंके गए पत्थरों से कैसे उन्होंने सफलता की सीढ़ियों का निर्माण किया, उनका जीवन और उनके भाषण इसका जीता-जागता उदाहरण हैं। वो एक ओर देश के युवाओं में आस भरते हैं, तो खिलखिलाकर हंसते भी हैं। मुट्ठी बांधकर आसमान में देश की ताकत का परचम फहराते हैं, तो दोनों हाथ उठाकर करोड़ों भारतीयों के आत्मविश्वास को आवाज देते हैं। आंखों में आंसू भरकर अपने बचपन की दुखों भरी जिंदगी का हवाला देकर वो आम भारतीय को हार न मानकर हिम्मत के साथ लड़ने और कर्मक्षेत्र में डटने की सीख भी देते हैं। ताकि गांव-गरीब-किसान, झुग्गी-झोपड़ी के इंसान, बेरोजगार नौजवान की जिंदगी में उम्मीदों का नया सवेरा आए। प्रधानमंत्री इन्हीं वजहों से बार बार ‘मुद्रा बैंक योजना’ के जरिए युवकों को स्वरोजगार के लिए कर्ज देने, नए बैंक खातों की योजना को सफल बनाने और ‘स्किल इंडिया’ के जरिए हर नौजवान को देश की जरुरत के हिसाब से हुनरमंद बनाने की बात करते हैं। ‘स्टार्टअप योजना’ के जरिए लाखों नए उद्यमी खड़े करने, स्वच्छता अभियान के जरिए भारत की बदरंग तस्वीर बदलने और ‘बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ’ के जरिए महिलाओं और बच्चियों की जिंदगी में बड़ा बदलाव लाने की कोशिश करते हैं। वह देश के कॉरपोरेट, विज्ञान, शिक्षा और खेल जगत समेत हर वर्ग और हर क्षेत्र में ‘सबका साथ-सबका विकास’ का महान मंत्र देते हैं, ताकि सबके साथ मिलकर भविष्य के भारत की तस्वीर को बदला जा सके।

प्रभावपूर्ण अभिव्यक्ति सब के बस की बात नहीं है। यह कला सीखी नहीं जा सकती। यह केवल और केवल अनुभव से आती है। जनता के बीच से निकला जमीनी नेता ही इस स्तर तक पहुंच सकता है। जैसे कि नरेंद्र मोदी। उन्हें सुनने वालों की फेहरिस्त में देश के लोग भी हैं और दुनिया के भी। विरोधियों को घेरना हो या मन की बात करनी हो, उनके शब्दों का चयन अनूठा होता है। पुलवामा हमले के बाद जब उन्होंने कहा, “घर में घुसकर मारेंगे”, तब उनके चेहरे पर जो भाव थे, वे बता रहे थे कि यह महज भाषणबाजी नहीं है। विरोधी भले ही इसे जुमलेबाजी कहें, लेकिन शायद जनता इसे जुमलेबाजी नहीं मानती। अगर मानती तो मोदी का नाम ‘ब्रांड मोदी’ नहीं बन पाता। राष्ट्रीय राजनीति में अपने सेवा भाव, साधारण जीवन शैली, शानदार प्रबंधन और शब्दों के प्रभावी चयन के बूते नरेंद्र मोदी अगली कतार में आ खड़े हुए हैं। जिस तरह से नरेंद्र मोदी ने देश की विविध जनता को ध्यान में रखते हुए अपनी संवाद क्षमता का इस्तेमाल किया है, वह उनकी सफलता का बड़ा आधार भी है। ऐसे परिदृश्य में जब भारत के प्रधानमंत्री को वैश्विक नेता के रूप में मान्यता मिली है, उनका प्रत्येक शब्द मूल्यवान हो जाता है। विशाल देश की विशाल जनसंख्या से संवाद करने का इससे ज्यादा प्रभावी तरीका दूसरा नहीं हो सकता।

(लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में जनसंचार विभाग में प्रोफेसर और अध्यक्ष हैं।)

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