रोजा क्या है कब और क्यों फ़र्ज़ किये गए रोज़े
व्यक्ति को गुनाहों से बचाने और परहेजगार बनाने के लिए फ़र्ज़ किये गए थे रोज़े।
औरैया(हि. स.)। रमजान इस्लाम धर्म का सबसे पवित्र महीना है । रमज़ान की शुरुआत आज से हो गयी है। आज रमज़ान मुबारक का पहला रोज़ा है। रोज़े इस्लाम धर्म के मानने वालों पर फ़र्ज़ किये गए जैसे कि पिछली उम्मतों पर भी फ़र्ज़ किये गए थे।रोज़े के सम्बंध में जानकारी देते हुए मदरसा जामिया समदिया फफूंद के मौलाना अहकाम चिश्ती ने बताया कि रमज़ान शरीफ एक मुबारक महीना है जिसमें इस्लाम धर्म के मानने वाले लोग एक माह तक सुबह सादिक से लेकर सूरज डूबने तक बिना कुछ खाए पिए रहते हैं। इसी का नाम रोजा है। इस्लाम धर्म के अनुसार रोजा रखने वाले व्यक्ति के शरीर के एक-एक अंग का रोजा होता है। उसके दिल का रोजा यह है कि वह किसी की तरफ से अपने दिल में बुरे विचार न रखे और आंख का रोज़ा यह है कि वह किसी बुरी चीज को न देखे, कान का रोजा यह है कि किसी बुरी बात को न सुने, हाथ का रोजा यह है कि रोजेदार अपने हाथ से कोई बुरा कार्य न करे तथा पैरों का रोजा यह है कि वह किसी बुरे कार्य की तरफ अपने पैरों से चलकर न जाए।
रोजे इस्लाम धर्म में 1440 वर्ष पूर्व फर्ज किए गए थे। मौलाना अहकाम चिश्ती ने जानकारी देते हुए बताया कि रोजे की तारीख बहुत पुरानी है बल्कि यह कहना सही है कि जब से मानवता है तब से रोजा है। इस्लामी तारीख के अनुसार दस शव्वाल सन दो हिजरी को आज से लगभग चौदह सौ इकतालीस वर्ष पूर्व इस्लाम धर्म के प्रवर्तक हजरत मोहम्मद मुस्तफा सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की उम्मत को अल्लाह की तरफ से यह तोहफा मिला कि उस पर पूरे 1 माह के रोजे फर्ज किए गए जैसे कि पिछले पैगम्बर की उम्मतों पर फर्ज किये गए थे।
रोजे क्यों फर्ज किये गये?—-
इस्लाम धर्म की सबसे पवित्र किताब कुरान के अनुसार तुम पर रोजे फ़र्ज़ किये गए जिस तरह कि तुमसे पहली उम्मतों पर फ़र्ज़ किये गए थे ताकि तुम गुनाहों(पापों) से बच सको और परहेजगार बन जाओ। इस्लाम धर्म के पैगंबर मोहम्मद साहब से पहले अल्लाह के और भी बहुत से पैगंबरों ने रोजे रखे जिसमें हजरत आदम अलैहिस्सलाम हर महीने की 13, 14, 15 तारीख को रोजा रखते थे। हजरत दाऊद अलैहिस्सलाम हमेशा रोजा रखते थे। हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम 1 दिन रोजा रखते थे और दूसरे दिन इफ्तार करते थे मगर मोहम्मद साहब की उम्मत को अल्लाह की तरफ से यह तोहफा मिला कि उस पर 1 माह के रोज़े फर्ज किए गये ताकि उम्मत के लोग परहेजगार बन जाएं।
रोज़ा नाम है (सुबह सादिक) फजिर की अजान होने से पहले सूरज डूबने तक खाने-पीने और जिमा यानि(अपने शरीर के एक एक अंग को तमाम गुनाहों से बचाना) रोजा है।रोजा रखने से इंसान भूखा प्यासा रहता है तो उसका दिल अल्लाह की इबादत में ज्यादा लगता है और इससे उसे दूसरों की भूख और प्यास का अहसास हो जाता है।यह सारी चीजें भी परहेजगारी का जरिया है।
सुनील
