Sunday, April 19, 2026
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देश की पहली महिला शिक्षक सावित्री बाई फुले की जयंती मनी

-सावित्री बाई फुले का जीवन महिला सशक्तीकरण के लिये समर्पित था : प्रो. हरेराम त्रिपाठी

वाराणसी (हि.स.)। नारी मुक्ति आंदोलन की प्रणेता एवं देश की पहली महिला शिक्षक सावित्री बाई फुले की 192वीं जयंती मंगलवार को सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय में मनाई गई। इस दौरान विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. हरेराम त्रिपाठी ने सावित्री बाई फुले के चित्र पर माल्यार्पण कर उन्हें याद किया।

प्रोफेसर हरेराम त्रिपाठी ने कहा कि भारत की पहली महिला शिक्षक, महाराष्ट्र में महिलाओं की शिक्षा के प्रति अपना जीवन समर्पित करने वाली सावित्रीबाई फुले का जन्म महाराष्ट्र के सतारा जिले के एक छोटे से गांव नयागांव में तीन जनवरी 1831 को हुआ था। वह दलित परिवार में जन्मी थीं। उनके पिता का नाम खंदोजी नैवेसे और मां का नाम लक्ष्मीबाई था। सावित्री बाई फुले को भारत की पहली शिक्षिका होने का श्रेय जाता है।

उन्होंने यह उपलब्धि तब हासिल की जब महिलाओं का शिक्षा ग्रहण करना तो दूर की बात थी, उनका घर से निकलना भी दूभर था। कुलपति ने कहा कि आजादी से पहले भारत में महिलाओं के साथ काफी भेदभाव होता था। समाज में दलितों की स्थिति अच्छी नहीं थी। महिला दलित होती थीं तो यह भेदभाव और भी बड़ा होता था। जब सावित्री बाई स्कूल जाती थीं, तो लोग उन्हें पत्थर मारते थे। उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और कड़ा संघर्ष करते हुए शिक्षा हासिल की।

सावित्रीबाई फुले का जीवन महिला सशक्तिकरण के लिए समर्पित था। उन्होंने सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ आवाज उठाई। जब वह महज नौ वर्ष की थीं, तब उनका विवाह 13 साल के ज्योतिराव फुले से कर दिया गया था। जिस समय सावित्रीबाई फुले की शादी हुई थी, उस समय वह अनपढ़ थीं। पढ़ाई में उनकी लगन देखकर ज्योतिराव फुले प्रभावित हुए और उन्होंने सावित्रीबाई को आगे पढ़ाने का मन बनाया। ज्योतिराव फुले भी शादी के दौरान कक्षा तीन के छात्र थे लेकिन तमाम सामाजिक बुराइयों की परवाह किए बिना सावित्रीबाई की पढ़ाई में पूरी मदद की। सावित्रीबाई ने अहमदनगर और पुणे में टीचर की ट्रेनिंग ली और शिक्षक बनीं। पति के साथ मिलकर सावित्रीबाई फुले ने 1848 में पुणे में लड़कियों का स्कूल खोला। इसे देश में लड़कियों का पहला स्कूल माना जाता है। कुलपति ने कहा कि फुले दंपति ने देश में कुल 18 स्कूल खोले। ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने उनके योगदान को सम्मानित भी किया। इस स्कूल में सावित्रीबाई फुले प्रधानाध्यापिका थीं। ये स्कूल सभी जातियों की लड़कियों के लिए खुला था। दलित लड़कियों के लिए स्कूल जाने का ये पहला अवसर था।

पुणे में प्लेग फैला तो सेवा करते हुये निधन

कुलपति प्रो. त्रिपाठी ने बताया कि पुणे में प्लेग फैला तो सावित्रीबाई फुले मरीजों की सेवा में जुट गईं। इसी दौरान उन्हें प्लेग हो गया और 1897 में उनकी मृत्य हो गई। उनके पति ज्योतिराव का निधन उनसे पहले 1890 में हो गया था। पति के निधन के बाद सावित्रीबाई फूले ने ही उनका दाह संस्कार किया था। जयंती कार्यक्रम में विभागाध्यक्ष और वरिष्ठ प्रोफेसर भी मौजूद रहे।

श्रीधर

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