Sunday, April 19, 2026
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कृषि परिस्थितिकी के अनुरूप ही अपनाना होगा खेती की तकनीक : डाॅ साधना

फतेहपुर(हि.स.)। कृषि मामले में यह जनपद ऐसा है जहां गंगा यमुना के दोआबा के साथ ऊसर, बीहड़ एवं सिंचित, असिंचित क्षेत्र की खेती होती है। कृषि विज्ञान केन्द्र द्वारा कृषि परिस्थितिकी के अनुरूप खेती बाड़ी की तकनीक विकसित की गई है। जिसकी जानकारी लेकर खेती करने की आवश्यकता है।

उक्त बातें शुक्रवार को खेतों के भ्रमण करने के दौरान कृषि विज्ञान केन्द्र थरियांव की प्रभारी वैज्ञानिक डाॅ साधना वैश ने किसानों से कही। उन्होंने जनपद में खरीफ फसलों के लाभकारी उत्पादन के लिए किसानों को तकनीकी सुझाव दिये। कहा कि किसी भी जनपद की लाभकारी व विकास परक खेती विकसित होने के लिए जिले की कृषि परिस्थितिकी पर निर्भर होता है। यदि उसी के अनुरूप फसलों की बुआई की जाती है। तभी अधिक से अधिक लाभ प्राप्त किया जा सकता है। खेती विविधीकरण के साथ सहफसली कृषि अपनाने से भी अधिक लाभ किसान उठा सकते हैं। अच्छी खेती की प्रतिस्पर्धा एवं खेती में रुझान बढ़ने से लोग आर्थिक रुप से मजबूत तो होते ही हैं सामाजिक विकास भी होता है।

उन्होंने कहा कि यह जिला धान व गेहूँ फसल चक्र की खेती वाला क्षेत्र है। धान व गेहूँ फसल चक्र की खेती से मिट्टी के जीवांश कार्बन स्तर की गिरावट तथा भूमि की भौतिक, रासायनिक एवं जैविक तीनों दशा असंतुलित हो रही है। जो चिंताजनक है। जिले की भूमि मुख्य रूप से 06 कृषि परिस्थितिकीय है। सभी की वर्तमान स्थित अलग-अलग है सभी क्षेत्रों में अलग-अलग संभावनाएं हैं। तथा जनपद की 6 प्रकार की खेती की स्थिति के अनरूप तकनीकी प्रबन्धन, निवेश व संसाधन की आवश्यकता को किसानों को जानना होगा। धान व गेहूँ की खेती के साथ गंगा किनारे का क्षेत्र, ऊसर भूमि का क्षेत्र, ढालू भूमि आदि क्षेत्र हैं इन क्षेत्रों की पहली आवश्यकता है कि भूमि व खेत की मिट्टी का संरक्षण तथा भूमि की भौतिक, रासायनिक, जैविक तीनों दशाओं को संतुलित व संरक्षित करना है। ये तीनों दशाओं को संतुलित करने के लिये कई तकनीकी प्रबन्धन एवं विधाए हैं। तुरन्त कारगर उपाय के रूप में ढेंचा की हरी खाद बहुत ही लाभकारी है।

उन्होंने किसानों से कहा कि धान की रोपाई के पूर्व 45-50 दिन के ढेंचा की हरी खाद खेत में पलट दें। ढेंचा हरी खाद पलटकर तुरन्त धान की रोपाई करे तथा यूरिया की मात्रा आधी कर दें। धान की खेती में रोपाई व रोपाई के बाद की तकनीकी को भी जाने और लागू करें। धान के खेत के चारों ओर मेड़ के किनारे ढेंचा बोकर बीज तैयार करें। धान के खेत के मेड़ पर अरहर बोकर दाल से स्वावलंबी बने। खेती को आय परक बनाने हेतु कृषि विज्ञान केन्द्र से तकनीक प्राप्त कर खेती करने तथा योजनाएं का लाभ प्राप्त कर खेती को लाभकारी बना सकते हैं।

देवेन्द्र

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