Tuesday, January 13, 2026
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विद्युत विभाग की नेतागिरी करना पड़ा भारी

मुख्य अभियंता ने साढ़े पांच करोड़ रुपए का लगाया जुर्माना, नोटिस जारी

संवाददाता

अयोध्या। विद्युत विभाग ने अयोध्या में एक अभूतपूर्व और विवादास्पद निर्णय लेते हुए एक ट्रेड यूनियन नेता पर 5.5 करोड़ रुपये का जुर्माना ठोक दिया है। यह जुर्माना उनके द्वारा बर्खास्त किए गए आउटसोर्सिंग कर्मचारियों के समर्थन में किए गए प्रदर्शन के चलते लगाया गया है। इस कार्रवाई को लेकर पूरे प्रदेश में हलचल मची हुई है। बिजली कर्मचारियों के संगठन इसे असंवैधानिक और मनमाना कदम बता रहे हैं।

यूनियन नेता बोले – यह लोकतंत्र का गला घोंटना है
विद्युत विभाग की ओर से जारी नोटिस के अनुसार, जिले में वितरण खंड के मुख्य अभियंता अशोक कुमार चौरसिया ने विद्युत मजदूर पंचायत उत्तर प्रदेश की अयोध्या इकाई के जिलाध्यक्ष जय गोविंद को प्रदर्शन करने के कारण जिम्मेदार ठहराते हुए 5.5 करोड़ रुपये की भरपाई करने को कहा है।

जय गोविंद ने बताया कि उन्हें जो नोटिस मिला है, उसमें कहा गया है कि 22 अप्रैल से 10 मई तक उन्होंने लगातार प्रदर्शन किया। इस दौरान हाई वॉल्यूम स्पीकर का इस्तेमाल किया गया जिससे विभागीय कामकाज, बिजली सप्लाई और राजस्व वसूली प्रभावित हुई। इस आधार पर उन्हें उत्तर प्रदेश राजकीय विद्युत उपक्रम अधिनियम 1958 की धारा तीन के तहत नोटिस भेजा गया है।

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अधिकारी बोले – धारा की जानकारी नहीं, पुलिस और कोर्ट तय करेंगे
इस मामले में हैरान करने वाली बात यह सामने आई है कि जब मुख्य अभियंता अशोक कुमार चौरसिया से पूछा गया कि उन्होंने किस कानून की धारा के तहत यह जुर्माना लगाया है, तो उनका जवाब बेहद असंवेदनशील और गैरजिम्मेदाराना था। उन्होंने साफ कहा, “मुझे कोई धारा या कानून नहीं पता है, मैंने सिर्फ नोटिस जारी किया है। कानून की धाराएं पुलिस और न्यायालय तय करेंगे।” इस बयान ने प्रशासनिक प्रक्रिया और अधिकारों के दुरुपयोग को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। विद्युत विभाग की ओर से इस तरह की अनभिज्ञता को लेकर कर्मचारियों में असंतोष और आक्रोश है।

बर्खास्तगी के खिलाफ आंदोलन बना जुर्माने की वजह
पिछले महीने विद्युत विभाग ने 1500 आउटसोर्सिंग कर्मचारियों को यह कहते हुए बाहर कर दिया कि वे विभागीय मानकों पर खरे नहीं उतरते। इस बर्खास्तगी के खिलाफ कर्मचारियों के संगठन सड़क पर उतर आए थे। इसी क्रम में जय गोविंद ने अयोध्या में प्रदर्शन किया, जो प्रशासन को नागवार गुजरा। अब यूनियन नेताओं का कहना है कि यदि शांतिपूर्ण प्रदर्शन भी अपराध है तो लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का क्या अर्थ रह जाता है? उन्होंने सवाल उठाया है कि यदि प्रदर्शन से कार्य प्रभावित हुआ तो उसका मूल्य 5.5 करोड़ रुपये कैसे तय किया गया?

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विद्युत विभाग के फैसले पर उठे सवाल
अधिकांश श्रमिक संगठनों ने इस कार्रवाई को तानाशाहीपूर्ण, भय पैदा करने वाला और असंवैधानिक बताया है। उन्होंने आरोप लगाया कि यह कदम केवल इसलिए उठाया गया ताकि आगे कोई कर्मचारी हक के लिए आवाज न उठा सके। वे इसे आंदोलन को कुचलने की साजिश बता रहे हैं। कई संगठनों ने यह भी कहा कि विद्युत विभाग का यह फैसला एक मिसाल बनेगा – लेकिन नकारात्मक अर्थों में। अगर प्रशासन चाहे तो किसी भी प्रदर्शनकारी को करोड़ों का जुर्माना लगाकर दबा सकता है, यह सोच लोकतांत्रिक ढांचे को कमजोर करती है।

भू-राजस्व के तहत वसूली की चेतावनी
नोटिस में यह भी उल्लेख है कि अगर जय गोविंद ने 30 दिनों के भीतर यह राशि अदा नहीं की तो पूरी रकम भू-राजस्व के बकाये के रूप में वसूली जाएगी। यानी प्रशासनिक स्तर पर उनकी संपत्ति तक कुर्क की जा सकती है। इससे न केवल जय गोविंद बल्कि अन्य यूनियन नेताओं में भी भय का माहौल बन गया है। जय गोविंद ने स्पष्ट किया है कि वे इस नोटिस के खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़ेंगे और जरूरत पड़ी तो आंदोलन भी तेज करेंगे। उन्होंने कहा कि वे इस दबाव के आगे झुकने वाले नहीं हैं। इस बीच कई अन्य यूनियनों ने भी उनके समर्थन में आवाज उठानी शुरू कर दी है।

राज्य के कई हिस्सों में विद्युत विभाग के इस कदम के खिलाफ विरोध प्रदर्शन की योजना बनाई जा रही है। यदि प्रशासन इस मामले को बातचीत से सुलझाने में विफल रहा, तो स्थिति और बिगड़ सकती है।

विद्युत विभाग की नेतागिरी करना पड़ा भारी

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