अजय कुमार शर्मा
मधुबाला हिंदी सिनेमा की एक बेहतरीन, खूबसूरत और लोकप्रिय अदाकारा थीं। उनका हंसमुख चेहरा और चुलबुलाहट भरा अभिनय सभी को बेहद पसंद था, लेकिन रुपहले परदे की चमकती दुनिया के पीछे उनकी एक दर्द भरी दुनिया भी थी जिसके कारण थे उनके पिता और उनका खराब स्वास्थ्य। उन्हें फिल्मी दुनिया में उनके पिता अताउल्ला खान लेकर आए थे और मधुबाला के फिल्म एवं निजी जीवन से जुड़े सभी निर्णय वह ही लेते थे। उनकी कमाई का एक बड़ा हिस्सा उनके परिवार जिसमें पिता के अलावा दो बड़ी बहनें भी थीं के ऊपर खर्च होता था। अताउल्ला जिद्दी और मुंहफट थे, लेकिन सीधी सादी मधुबाला चाहकर भी उनका विरोध नहीं कर पाती थीं। मधुबाला की अशोक कुमार के साथ आई कमाल अमरोही की फ़िल्म महल (1949) की सफलता ने तो उन्हें और घमंडी बना दिया था। मधुबाला के लिए नई फ़िल्म का अनुबंध करते समय अब उनके पिता की एक विशेष शर्त होती थी- आगुंतकों के लिए प्रवेश निषिद्ध!
फ़िल्म निराला (1950) में मधुबाला के हीरो देवानंद थे और साथी कलाकार थे मजहर ख़ान। मजहर खान वी.शांताराम की हिट फ़िल्म पड़ोसी से अपनी पहचान बना चुके थे। एक दिन इस फिल्म की शूटिंग देखने के लिए उन्होंने अपने कुछ मेहमानों को आमंत्रित किया, लेकिन उन्हें मधुबाला के पिता अताउल्ला की उस शर्त के बारे में कोई जानकारी नहीं थी। अताउल्ला ने फिल्म के निर्देशक एम.सादिक से अपनी गुस्सा जाहिर की और और मेहमानों को अंदर नहीं जाने दिया। शूटिंग रुकवा दी सो अलग। मजहर ने तब मधुबाला के पास जाकर अनुमति चाही तो मधुबाला ने भी अपने पिता के सुर में सुर मिलाते हुए कठोरता से कहा कि जैसा अब्बा कहते हैं वैसा ही होगा वरना मैं आज की शूटिंग इसी समय रोककर चली जाऊंगी। मधुबाला ने मजहर खान की प्रतिष्ठा और उनकी आयु का भी ख्याल नहीं किया। अतिथि लोगों को बिना शूटिंग देखे ही लौटना पड़ा। एक साथी कलाकार का इतना बड़ा अपमान…।
देखते-देखते यह बात चारों तरफ फैल गई। कुछ पत्रकारों ने इस बात की जानकारी के लिए सीधे मधुबाला से बात करने की कोशिश की तो अताउल्ला ने उनको वहां से भगा दिया और अपमानित भी किया। अब पत्रकारों को भी गुस्सा आ गया। उन्होंने और पाकिस्तान के पत्रकारों ने मिलकर इंडो पाक जर्नलिस्ट एसोसिएशन बनाकर मूवी टाइम्स नामक फिल्म पत्रिका के संपादक और वरिष्ठ पत्रकार बीके करंजिया को इसका सचिव बनाया और निर्णय लिया कि वे अपनी पत्र-पत्रिकाओं में मधुबाला की तस्वीर, उनकी फिल्मों के विज्ञापन, उसके इंटरव्यू तब तक प्रकाशित नहीं करेंगे जब तक अताउल्ला और मधुबाला पत्रकारों से माफ़ी न मांग लें। फ़िल्म इंडिया पत्रिका को छोड़कर सभी ने ऐसा ही किया। इस बीच मधुबाला को फ़ोन पर धमकियां देने का सिलसिला भी शुरू हो गया … जिसमें उनका अपहरण और उनका चेहरा बदसूरत बनाने की बातें होतीं थी।
इस बीच मधुबाला एक समारोह में मोरारजी देसाई से मिलीं और अपनी मुश्किलों के बारे में बताया तो उन्होंने एक सिपाही उनकी 24 घंटे की सुरक्षा के लिए नियुक्त करवा दिया। विवाद इसी तरह चलता रहा और एक साल गुज़र गया। अब अताउल्ला को चिंता हुई क्योंकि अब मधुबाला की लोकप्रियता पर असर होने लगा था। तब प्रसिद्ध फोटोग्राफर राम औरंगाबादकर से बात कर अताउल्ला ने माफ़ी मांगने की बात कही। तब करंजिया के बंगले पर मधुबाला और अताउल्ला ने एसोसिएशन के उपस्थित सदस्यों से माफी मांगी और दोनों पक्षों में मेल मिलाप हो गया।
चलते चलतेः इस समझौते के अगले रविवार मधुबाला के बांद्रा स्थित बंगले अरेबियन विला में पत्रकारों को एक भव्य पार्टी दी गई। इस पार्टी के दौरान पत्रकारों की आव भगत मधुबाला ने पीले रंग की सलवार कमीज और उसके ऊपर दुपट्टा जैसी साधारण पोशाक में की थी। सभी पत्रकार उनकी सादगी और सुंदरता पर मंत्रमुग्ध से हो गए। करंजिया ने अपनी पत्रिका में लिखा था- मधुबाला अनुपम सौंदर्य की सीमा हैं और अब तक सुंदर के वास्तविक दर्शन किसी भी प्रदर्शित फिल्म अथवा फोटो में नहीं हुए हैं… आगे चलकर उनकी यह बात पूरी तरह सिद्ध हुई।
(लेखक- राष्ट्रीय साहित्य संस्थान के सहायक संपादक हैं। नब्बे के दशक में खोजपूर्ण पत्रकारिता के लिए ख्यातिलब्ध रही प्रतिष्ठित पहली हिंदी वीडियो पत्रिका कालचक्र से संबद्ध रहे हैं। साहित्य, संस्कृति और सिनेमा पर पैनी नजर रखते हैं।)
