Sunday, April 26, 2026
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बिहार में शुरू हुई ड्रैगन फ्रूट की खेती, नाम रखा गया ‘कोमलम’

बेगूसराय (हि.स.)। ‘कौन कहता है कि आसमां में सुराख नहीं हो सकता, एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारों।’ बेगूसराय में इसे चरितार्थ किया है किसी युवा ने नहीं, बल्कि 67 वर्ष के एक उम्र दराज व्यक्ति ने। उन्होंने अपनी मेहनत से ऐसा पत्थर उछाला कि बिहार के लोगों को ड्रैगन फ्रूट के लिए अब बाहरी प्रदेशों के भरोसे नहीं रहना पड़ेगा। बिहार के बेगूसराय में इसकी खेती शुरू हो गई है। खेती की शुरुआत किया है झारखंड सरकार के सीआईडी से सेवानिवृत्त इंस्पेक्टर रामनरेश कुंवर ने। 

2010 में राष्ट्रपति प्रतिभा देवीसिंह पाटिल के हाथों वीरता पुरस्कार प्राप्त रामनरेश कुंवर 2014 में जब सेवानिवृत्त हो गए तो चार साल उन्होंने मंथन किया कि आगे क्या हो सकता। इसके बाद 2018 में अपने गांव बेगूसराय के मनियप्पा आकर समेकित कृषि प्रणाली के तहत अंतरर्वती खेती की शुरुआत कर दी। पिछले साल उन्होंने ड्रैगन फ्रूट का पौधा बंगाल से लाया और अपने खेतों में लगा दिया। अब जब वह ड्रैगन फ्रूट उनके खेत में फल गया तो खुशी की कोई सीमा नहीं रही। हालांकि वे इसे ड्रैगन फ्रूट कहने से परहेज करते हैं और उन्होंने गुजरात के मुख्यमंत्री द्वारा इसे दिया गया नाम ‘कोमलम’ कहना पसंद करते हैं।
रामनरेश कुंवर ने बताया कि ट्रायल के लिए उन्होंने दो सौ पौधा लगाया है। ड्रिप इरिगेशन (टपक सिंचाई प्रणाली) के तहत सभी पौधों में पानी और मिनिरल्स देने की व्यवस्था की गई हैै। एक बार लगाने के बाद यह 25 साल तक लगातार फलता है। इसके लिए सिमेंट के पिलर की विशेष व्यवस्था की गई है, एक पिलर पर 15 से 20 किलो फल देता है। गुजरात, असम, नागपुर और मुंबई में तीन सौ रुपये किलो बिकता है। बिहार में अभी तक सिर्फ किशनगंज में एक जगह उत्पादन होता था, लेकिन वह बंगाल सप्लाई हो जाता था। जिसके कारण बिहार का बाजार अन्य प्रदेशों के लाए गए ड्रैगन फ्रूट के भरोसे रहता था और जब उन्होंने उत्पादन शुरू किया है तो लोगों को आसानी से उपलब्ध होगा।
कृषि विभाग को जब इसकी जानकारी मिली तो बिहार के विभिन्न जिलों से किसानों को यहां लाकर ड्रैगन फ्रूट की खेती के लिए जागरूक करते हुए प्रशिक्षण दिया जा रहा है। रामनरेश कुंवर ने बताया कि ड्रैगन फ्रूट का वैज्ञानिक नाम हिलोकेरेस अंडटस है। लेकिन चीन से हुए विवाद के बाद गुजरात के मुख्यमंत्री ने इसका नाम कोमलम रखा है और हम लोग भी इसे ‘कोमलम’ कहना ही पसंद करेंगेे। यह दक्षिण अमेरिका और थाई में मुख्यतया पाया जाता है। गुणों और फायदों को देखते हुए अब इसे पटाया, क्वींसलैंड, पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया और न्यू साउथ वेल्स में भी उगाया जाने लगा है। यह बेल पर लगने वाला कैक्टेसिया फैमिली से संबंधित फल है तथा गूदेदार और रसीला होता है। इसके फूल बहुत ही सुगंधित होते हैं, जो रात में खिलकर सुबह होने तक झड़ जाते हैं। उन्होंने बताया कि डायबिटीज, हृदय रोग, कैंसर, कोलेस्ट्रॉल नियंत्रण, पेट संबंधी समस्या, गठिया, इम्यूनिटी बढ़ाने, रोग प्रतिरोधक क्षमता मजबूत करने, डेंगू, हड्डियों और दांत रोग, शारीरिक कोशिकाओं की मरम्मत, अस्थमा, गर्भावस्था, एनीमिया की समस्या, कंजेनिटल ग्लूकोमा, भूख बढ़ाने, मस्तिष्क रोग, त्वचा एवं बालों के लिए बहुत ही उपयोगी है। रामनरेश कुंवर के बाद बलहपुर के प्रगतिशील किसान अमित कुमार ने भी कुछ पौधा लगाया है तथा आगे और लगाने की तैयारी में हैं। 

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