Thursday, April 23, 2026
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खिचड़ी में चढ़े अन्न के हर दाने का उपयोग करता है मंदिर प्रशासन

– भंडारा, वनवासी आश्रम दृष्टिहीन विद्यालय और धर्मार्थ संस्थाओं को जाता है बाबा की खिचड़ी का अन्न

– जरूरतमंदो के घर शादी-ब्याह में भी दिया जाता है चावल-दाल

गोरखपुर (हि.स.)। गोरखनाथ मंदिर में खिचड़ी पर्व पर चढ़ने वाले अन्न के एक एक दाने का सदुपयोग होता है। यह न सिर्फ मंदिर के भंडारा में प्रसाद बनाने के लिए होता है बल्कि वनवासी आश्रम, दृष्टिहीन विद्यालय और धर्मार्थ संस्थाओं को भी जाता है। बाबा की खिचड़ी के अन्न का उपयोग जरूरतमंदों के घर शादी-ब्याह में भी दिया जाता है। यह सहयोग लोगों को चावल-दाल कर रूप में मिलता है।

माह भर तक चलने वाले खिचड़ी मेले के बाकी दिनों में भी आने वाले लोग भी बाबा गोरखनाथ को खिचड़ी चढ़ाते हैं। ऐसे में ये जिज्ञासा स्वाभाविक है कि इतना अन्न जाता कहां है ? इसका सीधा और सपाट उत्तर भी है। दरअसल, बाबा गोरखनाथ को चढ़ने वाले चावल-दाल को पूरे साल लाखों लोग प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं। मंदिर में चढ़ने वाली सब्जियां और अन्न मंदिर के भंडारे, गरीबों के यहां शादी-ब्याह, वनवासी आश्रम, दृष्टिहीन विद्यालय और ऐसी ही अन्य संस्थाओं को जाता है।

मंदिर भंडारे में प्रतिदिन लगभग 600 लोग पाते हैं प्रसाद

मंदिर से करीब साढ़े चार दशक से जुड़े द्वारिका तिवारी के मुताबिक परिसर में स्थित संस्कृत विद्यालय, साधुओं और अन्य स्टॉफ के लिए भंडारे में रोजाना करीब 600 लोगों का भोजन बनता है। नियमित अंतराल पर मंदिर में होने वाले आयोजनों में भी इसी अन्न का प्रयोग होता है। इन आयोजनों में हजारों की संख्या में लोग प्रसाद पाते हैं। इस सबको जोड़ दें तो यह संख्या लाखों में पहुंच जाती है। मंदिर के भंडारे से अगर कुछ बच जाता है, वह गोशाला के गायों के हिस्से में जाता है। मंदिर प्रशासन अन्न के एक-एक दाने का उपयोग करता है।

अन्न को ऐसे करते हैं एक-दूसरे से अलग

आने वाले भक्त बाबा गोरक्षनाथ को चावल-दाल के साथ आलू, हल्दी आदि भी चढ़ाते हैं। सबको एकत्र कर पहले बड़े छेद वाले छनने से चाला जाता है। आलू और हल्दी जैसी बड़ी चीजें अलग हो जाती हैं। फिर इसे महीन छन्ने से गुजारा जाता है। इस दौरान आम तौर पर चावल-दाल भी अलग हो जाता है। थोड़ा-बहुत जो बचा रहता है, उसे सूप से अलग कर दिया जाता है। यह सारा काम मंदिर परिसर में रहने वाले कर्मचारी और उनके घर की महिलाएं करती हैं।

डा. आमोदकांत

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