Saturday, May 9, 2026
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उपेक्षित है योग के प्रणेता महर्षि पतंजलि की जन्मस्थली कोंडर

(अंतरराष्ट्रीय योग दिवस पर विशेष)

डॉ चन्द्र गोपाल पाण्डेय

आज (21जून) सातवां अंतरराष्ट्रीय योग दिवस है। पतंजलि ने योग को ’चित्त की वृत्तियों के निरोध’ के रूप में परिभाषित किया है। योग सूत्र में उन्होंने पूर्ण कल्याण तथा शारीरिक, मानसिक और आत्मिक शुद्धि के लिए अष्टांग योग का मार्ग विस्तार से बताया है। योगसूत्र, योग दर्शन का मूल ग्रंथ है। योग सूत्रों की रचना पतंजलि ने की है। योगसूत्र में चित्त को एकाग्र करके ईश्वर में लीन करने का विधान है। पतंजलि के अनुसार चित्त की वृत्तियों को चंचल होने से रोकना (चित्तवृत्तिनिरोधः) ही योग है अर्थात् मन को इधर-उधर भटकने न देना, केवल एक ही वस्तु में स्थिर रखना ही योग है। योग दर्शनकार पतंजलि ने आत्मा और जगत् के संबंध में सांख्य दर्शन के सिद्धांतों का ही प्रतिपादन और समर्थन किया है। महर्षि पतंजलि को लेकर जनश्रुति में एक श्लोक है, “योगेन चित्तस्य पदेन वाचा मलं शरीरस्य च वैद्यकेन। योपारोक्तं प्रवरं मुनीनां पतंजलिर्नप्रान्जलिर्नतोस्मि“ अर्थात् मैं करबद्ध होकर ऐसे पतंजलि मुनि को प्रणाम करता हूँ, जिन्होंने योग के द्वारा चित्त शुद्धि, व्याकरण के द्वारा वचन शुद्धि और आयुर्वेद के द्वारा शरीर शुद्धि का उपाय बताया। प्रसिद्ध इतिहासकार राजबली पाण्डेय ने अपनी पुस्तक प्राचीन भारत में उन्हें गोण्डा (अवध) का निवासी बताया है। कई अन्य इतिहासकारों ने भी पतंजलि की जन्मभूमि गोण्डा माना है। महाभाष्यकार पतंजलि का स्थान संस्कृत वैयाकरणों में सर्वश्रेष्ठ माना गया है। पाणिनी, कात्यायन और पतंजलि की मुनित्रयी में पतंजलि सर्वोच्च माने गए हैं।

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पतंजलि के लिये महाभाष्य में गोनिकापुत्र और गोनर्दीय दो विशेषण मिलते है। स्व. आरजी भंडारकर ने अपनी पुस्तक “इंडियन ऐंटीक्वेरी“ में अवध प्रदेश के गोण्डा जनपद को गोनर्दीय पतंजलि की जन्म भूमि माना है। उन्होंने भाषा विज्ञान के सिद्धान्तों का प्रमाण देकर सिद्ध किया है कि “गोनर्द“ शब्द से“ गोण्डा“ की व्युत्पत्ति हुई है। महाभाष्य में “इह वसामः इह पुष्यमित्रम् याजयामः“ आदि साक्ष्यों से स्पष्ट होता है कि पतंजलि पुष्य मित्र शुंग के समकालिक थे। इस तरह पतंजलि का समय 185 ई.पू.रहा होगा। स्वामी भगवदाचार्य तथा राम सागर शुक्ल समेत कई अन्य विद्वानों ने गोण्डा जनपद के वजीरगंज विकास क्षेत्र के कोंडर गांव को महर्षि पतंजलि की जन्मभूमि माना है। यह स्थान गोण्डा-अयोध्या मार्ग से जुड़े चंदापुर-मझारा मार्ग पर दो किमी दूर सुरम्य कोडर झील की गोद में स्थित है। अयोध्या धाम से इसकी दूरी 25 किलोमीटर से कम है। पर, सन्त तुलसीदास की जन्मभूमि राजापुर (गोण्डा) की तरह महर्षि पतंजलि की जन्मभूमि भी पूरी तरह उपेक्षित है। दो दिन पहले डॉ राजेश प्रताप सिंह के साथ कोडर गया था। यहां लगभग एक एकड़ क्षेत्रफल वाले परिसर में महर्षि पतंजलि की जन्मभूमि का एक शिलापट लगा है। परिसर में भगवान शंकर के नवनिर्मित मन्दिर के साथ ही एक अति प्राचीन “सम्मय माता“ और एक राम जानकी का मंदिर भी है।

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इस पूरे परिसर में महर्षि पतंजलि के नाम पर शिला पट के अतिरिक्त कुछ भी नही है। अलबत्ता विकास के नाम पर इस पवित्र परिसर में सरकारी पैसे से सार्वजनिक शौचालय बना दिया गया है। वर्तमान में यह स्थान तरबगंज विधान सभा और कैसरगंज लोकसभा क्षेत्र का हिस्सा है। यह स्थान भाजपा के क़द्दावर नेता व सांसद कैसरगंज बृज भूषण शरण सिंह और समाज कल्याण मंत्री रमापति शास्त्री के पैतृक निवास बिश्नोहरपुर से मात्र लगभग 15 किलोमीटर की दूरी पर है। यहां योग दिवस पर आयोजित एक कार्यक्रम में प्रदेश के तत्कालीन कृषि मंत्री स्मृति शेष विनोद कुमार उर्फ़ पण्डित सिंह शामिल हुए थे। महर्षि की गरिमा के अनुकूल कोडर को पर्यटक स्थल के रूप में विकसित करने का उनका वायदा भी मूर्ति रूप न ले सका। प्रदेश सरकार का आयुष विभाग, योग को जन-जन तक पहुंचाने के लिये प्रत्येक जिले में कई योग वेलनेस सेंटर खोल रखा है, लेकिन महर्षि पतंजलि की जन्मभूमि को यह भी नसीब नहीं है। उल्लेखनीय है कि महर्षि पतंजलि ही पहले और एक मात्र ऐसे मनीषी थे जिन्होंने योग को आस्था, अंधविश्वास और धर्म से बाहर निकालकर स्वस्थ रहने का आधार बताया था।

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 27 सितम्बर 2014 को सयुंक्त राष्ट्र महासभा में स्वास्थ्य के क्षेत्र में योग की महत्ता को सारगर्भित तरीके से रखा। सयुंक्त राष्ट्र के 177 सदस्यों ने 11 दिसम्बर 2014 को 21 जून को अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के रूप में स्वीकृति प्रदान की। 21 जून 2015 से यह तिथि अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के रूप में प्रतिवर्ष मनायी जाती है। यहां विचारणीय बिंदु यह है कि अंतरराष्ट्रीय फलक पर योग को मान्यता दिलाने वाले प्रधानमंत्री मोदी और मुख्यमंत्री पद पर आसीन एक योगी के समक्ष योग सूत्र के प्रणेता महर्षि पतंजलि की जन्मस्थली के विकास का खाका सम्भवतः अधिकारियों ने नही रखा है, अन्यथा महर्षि पतंजलि की जन्मभूमि अब तक उपेक्षित नहीं रहती। योग प्रेमियों के साथ ही स्थानीय लोग चाहते हैं कि महर्षि की जन्मस्थली होने में कोई संशय नहीं है तो, कमल के पुष्पों से आच्छादित कोडर व अरगा पार्वती की मनोरम झील का यह क्षेत्र पर्यटक स्थल के रूप विकसित करने के साथ ही यहां योग का एक विश्वविद्यालय या उच्च स्तरीय शिक्षण संस्थान स्थापित किया जाय।

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