फ्रांस की डसॉल्ट एविएशन ने राफेल मरीन का ‘सोर्स कोड’ साझा करने से किया इंकार
पाकिस्तान से संघर्ष के बाद राफेल मरीन के बजाय रूस से Su-57 विमान खरीदने पर मंथन कर रहा भारत
नेशनल डेस्क
नई दिल्ली। राफेल मरीन डील भारत की नौसेना के लिए 26 अत्याधुनिक लड़ाकू विमानों की खरीद का हिस्सा थी। इन विमानों को INS विक्रांत और INS विक्रमादित्य जैसे विमानवाहक पोतों पर तैनात किया जाना था। लेकिन फ्रांस की डसॉल्ट एविएशन ने राफेल का सोर्स कोड साझा करने से मना कर दिया। सोर्स कोड किसी भी आधुनिक लड़ाकू विमान की रीढ़ होता है। इसके बिना भारत अपने स्वदेशी हथियार, जैसे ब्रह्मोस मिसाइल, को राफेल में एकीकृत नहीं कर सकता। यह भारत की आत्मनिर्भर रक्षा नीति के लिए बड़ा झटका है।
फ्रांस का यह रवैया नया नहीं है। पहले भी मिराज-2000 विमानों के साथ फ्रांस ने सोर्स कोड साझा नहीं किया था। इसके चलते भारत मिराज में स्वदेशी हथियारों को शामिल नहीं कर पाया। अब राफेल मरीन डील में भी वही कहानी दोहराई जा रही है। ओपन मैगजीन की एक हालिया रिपोर्ट के मुताबिक, भारत इस धोखे के बाद राफेल मरीन डील को पूरी तरह रद्द करने पर विचार कर रहा है।
राफेल मरीन डील का महत्व और चुनौतियां
राफेल मरीन डील का मकसद भारतीय नौसेना की हवाई ताकत को बढ़ाना था। 4.5 प्लस जेनरेशन के ये विमान हवा से हवा और हवा से जमीन दोनों तरह के मिशनों में सक्षम हैं। इनकी अधिकतम गति 2,200 किमी/घंटा और रेंज 3,700 किमी है। लेकिन बिना सोर्स कोड के ये विमान भारत की जरूरतों के मुताबिक पूरी तरह अनुकूलित नहीं हो सकते।
सोर्स कोड के बिना भारत को हर बार डसॉल्ट एविएशन पर निर्भर रहना होगा। यह न केवल समय लेने वाली प्रक्रिया है, बल्कि भारत की रक्षा आत्मनिर्भरता को भी कमजोर करता है। मेक इन इंडिया पहल के तहत भारत स्वदेशी हथियारों और तकनीकों को बढ़ावा देना चाहता है। लेकिन फ्रांस का अड़ियल रवैया इस लक्ष्य में बाधा बन रहा है।
रूस की ओर भारत का रुखः Su-57 का विकल्प
राफेल मरीन डील में फ्रांस के धोखे के बाद भारत अब रूस की ओर देख रहा है। रूस ने भारत को Su-57 लड़ाकू विमान की पेशकश की है। यह पांचवीं पीढ़ी का स्टील्थ विमान है, जो राफेल से कहीं अधिक उन्नत है। रूसी कंपनी ने न केवल Su-57 की आपूर्ति, बल्कि भारत में इसका उत्पादन और तकनीक हस्तांतरण का भी वादा किया है।
रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने Su-57 की तकनीक साझा करने की सहमति जताई है। यह भारत के लिए एक शानदार अवसर है। Su-57 में हाइपरसोनिक मिसाइलों को नष्ट करने की क्षमता और 5,500 किमी की रेंज है। यह विमान भारत की रक्षा जरूरतों को बेहतर ढंग से पूरा कर सकता है।
रूस ने पहले भी भारत के साथ तकनीक साझा करने में उदारता दिखाई है। उदाहरण के लिए, कावेरी टर्बोफैन इंजन का परीक्षण रूस में इल्यूशिन II-76 विमान पर किया जा रहा है। यह इंजन भारत के स्वदेशी लड़ाकू विमान कार्यक्रम का हिस्सा है। रूस ने इस जटिल प्रक्रिया के लिए जरूरी बुनियादी ढांचा उपलब्ध कराया है।

मेक इन इंडिया को बढ़ावा देने की रणनीति
राफेल मरीन डील पर पुनर्विचार भारत की मेक इन इंडिया पहल को मजबूत करने की दिशा में एक कदम है। भारत अपने रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता चाहता है। रूस ने Su-57 के उत्पादन के लिए भारत में प्रोडक्शन लाइन स्थापित करने की पेशकश की है। यह न केवल भारत की रक्षा क्षमताओं को बढ़ाएगा, बल्कि हजारों नौकरियां भी पैदा करेगा।
रूस ने पहले भी भारत के साथ ब्रह्मोस मिसाइल और S-400 एयर डिफेंस सिस्टम जैसे प्रोजेक्ट्स में सहयोग किया है। अब S-500 सिस्टम की पेशकश भी की जा रही है। यह सिस्टम हाइपरसोनिक मिसाइलों और अंतरिक्ष में दुश्मन के सैटेलाइट्स को नष्ट करने में सक्षम है। रूस का यह प्रस्ताव भारत की रक्षा रणनीति को और मजबूत कर सकता है।
राफेल मरीन डील का इतिहास और भविष्य
भारत और फ्रांस के बीच राफेल सौदे का इतिहास रहा है। 2016 में भारत ने 36 राफेल विमानों की खरीद के लिए 59,000 करोड़ रुपये का समझौता किया था। इस डील में कुछ कस्टम फीचर्स शामिल किए गए थे, लेकिन सोर्स कोड साझा नहीं किया गया। अब राफेल मरीन डील में भी यही समस्या सामने आई है। राफेल मरीन डील की लागत लगभग 64,000 करोड़ रुपये थी। इसमें 22 सिंगल-सीटर और 4 ट्विन-सीटर विमान शामिल थे। डिलीवरी 2029 से शुरू होनी थी। लेकिन फ्रांस के रवैये ने भारत को इस सौदे से पीछे हटने पर मजबूर कर दिया है।
भारत-रूस रक्षा संबंधों का भविष्य
भारत और रूस के बीच दशकों से मजबूत रक्षा संबंध रहे हैं। S-400 एयर डिफेंस सिस्टम की डिलीवरी इसका ताजा उदाहरण है। तीन स्क्वाड्रन पहले ही भारत को मिल चुके हैं, और बाकी दो 2026 तक मिलने की उम्मीद है। रूस ने S-500 सिस्टम की पेशकश भी की है, जो भारत की रक्षा क्षमताओं को नई ऊंचाइयों पर ले जाएगा।
राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल की हालिया रूस यात्रा के दौरान S-400 और S-500 सौदों पर चर्चा होने की संभावना है। इसके अलावा, Su-57 की खरीद और भारत में इसके उत्पादन पर भी बातचीत हो सकती है। यह भारत की रक्षा रणनीति में एक ऐतिहासिक कदम होगा।
राफेल मरीन डील से सबक
राफेल मरीन डील का संभावित रद्द होना भारत के लिए एक सबक है। यह दर्शाता है कि रक्षा सौदों में तकनीक हस्तांतरण और आत्मनिर्भरता कितनी महत्वपूर्ण है। फ्रांस का धोखा भारत को रूस जैसे भरोसेमंद साझेदारों की ओर ले जा रहा है। Su-57 और S-500 जैसे सौदे भारत की रक्षा शक्ति को नई दिशा देंगे।
भारत अब अपनी रक्षा नीति में आत्मनिर्भरता और तकनीकी स्वतंत्रता को प्राथमिकता दे रहा है। रूस के साथ सहयोग इस दिशा में एक मजबूत कदम है। राफेल मरीन डील का भविष्य भले ही अनिश्चित हो, लेकिन भारत की रक्षा रणनीति अब और मजबूत होगी।


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