कहा-तीसरे बच्चे के लिए भी महिला कर्मचारी को मिलेगा मातृत्व अवकाश
मातृत्व अवकाश पर मद्रास हाईकोर्ट के फैसले को सर्वोच्च न्यायालय ने किया खारिज
नेशनल डेस्क
नई दिल्ली। मातृत्व अवकाश पर सर्वोच्च न्यायालय ने नीतिगत रूप से प्रभाव छोड़ने वाले अपने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि मातृत्व लाभ महिला के प्रजनन अधिकारों का हिस्सा हैं और मातृत्व अवकाश उन लाभों का अभिन्न अंग है। यह निर्णय केवल एक महिला कर्मचारी की याचिका तक सीमित नहीं है, बल्कि यह देशभर की लाखों महिलाओं के मातृत्व अवकाश संबंधी अधिकारों को मजबूती देने वाला साबित हो सकता है।
इसके साथ ही शीर्ष अदालत ने मद्रास हाई कोर्ट के उस आदेश को खारिज कर दिया, जिसमें एक सरकारी शिक्षिका को यह कहते हुए तीसरे बच्चे के जन्म के लिए मातृत्व अवकाश देने से इनकार कर दिया गया था कि राज्य की नीति के अनुसार मातृत्व अवकाश लाभ दो बच्चों तक सीमित है।
मातृत्व अवकाश केवल दो बच्चों तक सीमित नहीं : सुप्रीम कोर्ट
न्यायमूर्ति अभय एस ओका और न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां की पीठ ने स्पष्ट किया कि मातृत्व लाभ महिला के प्रजनन अधिकारों का ही विस्तार हैं। इसलिए मातृत्व अवकाश को केवल दो बच्चों तक सीमित करना मौलिक अधिकारों के उल्लंघन जैसा है। उन्होंने कहा, ‘हमने प्रजनन अधिकारों की अवधारणा पर गहन विचार किया और निष्कर्ष निकाला कि मातृत्व लाभ संविधान में प्रदत्त व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हिस्सा है। इस कारण हाईकोर्ट का आदेश असंवैधानिक है और उसे खारिज किया जाता है।’
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हाईकोर्ट के फैसले की पृष्ठभूमि
मूल मामला तमिलनाडु की एक महिला सरकारी शिक्षक से जुड़ा था। उनकी पहली शादी से दो बच्चे थे, जो तलाक के बाद पिता की कस्टडी में थे। पुनर्विवाह के बाद जब उन्होंने तीसरे बच्चे के जन्म पर मातृत्व अवकाश मांगा, तो राज्य सरकार ने उन्हें मातृत्व अवकाश देने से मना कर दिया। सरकार ने इसके पीछे ‘दो बच्चों की नीति’ का हवाला दिया।

महिला ने मद्रास हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी, जहां एकल न्यायाधीश ने उनके पक्ष में फैसला सुनाया। उन्होंने कहा कि मातृत्व लाभ अधिनियम, 1961 में बच्चों की संख्या को लेकर कोई सीमा नहीं है। लेकिन राज्य सरकार ने फैसले को चुनौती दी, और खंडपीठ ने एकल जज के आदेश को पलट दिया। खंडपीठ के अनुसार, याचिकाकर्ता तीसरे बच्चे के लिए अवकाश की पात्र नहीं थी।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले से नीतिगत परिवर्तन की राह
अब जब सुप्रीम कोर्ट ने यह ऐतिहासिक टिप्पणी की है कि मातृत्व अवकाश मूलभूत अधिकारों का हिस्सा है, तो इसका असर नीति निर्माण पर भी दिखना तय है। भारत के अधिकांश राज्यों में अभी भी केवल दो बच्चों तक ही मातृत्व लाभ सीमित हैं। यह फैसला सरकारों को मजबूर करेगा कि वे मौजूदा सेवा नियमों की समीक्षा करें और मातृत्व अवकाश के व्यापक अधिकारों को कानूनी रूप से स्वीकृत करें।
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मातृत्व अवकाश की परिभाषा का नया विस्तार
यह फैसला यह भी स्पष्ट करता है कि मातृत्व अवकाश केवल एक सुविधा नहीं बल्कि महिला के सामाजिक, मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य से जुड़ा मौलिक अधिकार है। अदालत ने कहा, ‘हर महिला को यह अधिकार है कि वह बिना किसी दंड के मातृत्व का सुख पा सके।’ सर्वोच्च न्यायालय की यह टिप्पणी न सिर्फ विधायिका के लिए बल्कि कार्यपालिका और नियोक्ताओं के लिए भी मार्गदर्शक सिद्ध होगी।
महिलाओं को नई उम्मीद
तीसरे बच्चे के लिए मातृत्व अवकाश को कानूनी मान्यता मिलने से उन लाखों महिलाओं को राहत मिलेगी, जिन्हें अब तक राज्य की ‘दो बच्चों की नीति’ के तहत मातृत्व अवकाश से वंचित रहना पड़ता था। यह फैसला भविष्य में अदालतों और सेवा नियामकों के लिए एक नजीर बनेगा।

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