साहूकार तथा फाइनेंस कंपनियों के कर्ज से दबा था परिवार
कर्ज के बोझ से आत्महत्या करने वाले परिवार के मुखिया की हालत नाजुक
प्रादेशिक डेस्क
बिजनौर। जिले में कर्ज के बोझ से आत्महत्या करने वाले एक परिवार की त्रासदी ने पूरे गांव को सन्न कर दिया। मुफलिसी और साहूकारी दबाव के बीच जिंदगी की जंग हार चुकी एक मां और उसकी दो बेटियों ने जहर खाकर अपनी जीवन लीला समाप्त कर दी, जबकि परिवार का मुखिया अस्पताल में जिंदगी और मौत के बीच झूल रहा है।
नूरपुर थाना क्षेत्र के गांव टंढेरा निवासी पुखराज (52) और उसकी पत्नी रमेशिया (50) पर भारी कर्ज था। जानकारी के अनुसार, साहूकारों और फाइनेंस कंपनियों से लिए गए लगभग छह लाख रुपये के कर्ज की किस्त अदा करने में वह असमर्थ हो रहे थे। किस्त की अंतिम तारीख 25 जून थी, और उसी तनाव में पुखराज ने पत्नी रमेशिया और बेटियों अनीता उर्फ नीतू (21) व सविता उर्फ शीतू (18) के साथ जहरीला पदार्थ खा लिया।
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गुरुवार सुबह आठ बजे के करीब जब घर से कराहने की आवाजें आईं, तो चारों लोग अपनी झोपड़ी से बाहर की ओर दौड़ते हुए गिरे। गांव के प्रधान रईस अहमद ने तत्काल पुलिस और एंबुलेंस को सूचना दी। कर्ज के बोझ से आत्महत्या का प्रयास करने वाले चारों लोगों को नूरपुर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पहुंचाया गया, जहां से हालत बिगड़ने पर बिजनौर मेडिकल कॉलेज रेफर कर दिया गया। रमेशिया और अनीता की वहीं मौत हो गई, जबकि शीतू को मेडिकल कॉलेज मेरठ भेजा गया, जहां इलाज के दौरान उसने दम तोड़ दिया।

पुखराज की हालत अभी भी बेहद गंभीर बनी हुई है। परिवार के जीवित सदस्य, पुखराज का बेटा सचिन, जो ईंट भट्ठे पर मजदूरी करता है, गहरे सदमे में है। बताया जा रहा है कि सचिन का अपने पिता से अकसर झगड़ा होता था, खासकर कर्ज की अदायगी को लेकर। पुखराज घोड़ा-बुग्गी चलाकर मजदूरी करता था, लेकिन आय इतनी नहीं थी कि कर्ज के बोझ को संभाल सके।
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इस कर्ज के बोझ से आत्महत्या की घटना के बाद प्रशासन हरकत में आया। एएसपी देहात विनय कुमार सिंह, एसडीएम और क्षेत्राधिकारी (सीओ) गांव पहुंचे और परिजनों व ग्रामीणों से पूछताछ की। जिलाधिकारी जसजीत कौर ने मामले की विस्तृत जांच के लिए तीन सदस्यीय कमेटी गठित की है।
डीएम ने स्पष्ट किया कि यह पता लगाया जा रहा है कि किन-किन साहूकारों या संस्थाओं से कर्ज लिया गया और क्या वे वसूली के लिए गैरकानूनी दबाव बना रहे थे। इसके अलावा पारिवारिक कलह की दिशा में भी जांच की जा रही है। एसपी अभिषेक झा ने कहा कि मामला बेहद गंभीर है और कर्ज के बोझ से आत्महत्या की वजहों की तह तक जाकर कार्रवाई की जाएगी।
कर्ज के बोझ से आत्महत्या की दर्दनाक घटना ने ग्रामीणों को झकझोर कर रख दिया है। गांव में मातम पसरा है और हर आंख नम है। लोगों के मन में यह सवाल उठ रहा है कि क्या गरीब और कर्ज में डूबे व्यक्ति को मरने के सिवा कोई विकल्प नहीं बचता?

कर्ज के बोझ से आत्महत्या जैसी घटनाएं समाज पर गहरा मनोवैज्ञानिक और सामाजिक प्रभाव छोड़ती हैं। जब कोई पूरा परिवार आर्थिक तंगी और सामाजिक उपेक्षा के कारण आत्महत्या जैसा कदम उठाता है, तो यह न सिर्फ उनकी व्यक्तिगत पीड़ा को दर्शाता है, बल्कि समाज की उस असंवेदनशीलता को भी उजागर करता है जो जरूरतमंदों को समय पर सहायता नहीं पहुंचा पाती। ऐसी घटनाएं गरीब वर्ग में डर, असुरक्षा और हताशा को जन्म देती हैं, साथ ही सामाजिक ताने-बाने में दरार पैदा करती हैं। ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति को रोकने के लिए सरकार और समाज दोनों को मिलकर प्रभावी सहयोग, जागरूकता और आर्थिक पुनर्वास की ठोस व्यवस्था करनी होगी।
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