Sunday, February 8, 2026
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आपातकाल की दिल दहला देने वाली सच्चाई!

आपातकाल के दौरान जेल में डाल दिए गए थे 200 पत्रकार, हर खबर पर रहती थी सरकार की पैनी नजर

नेशनल डेस्क

नई दिल्ली। 25 जून 1975 को जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सिफारिश पर राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने आपातकाल घोषित किया, तब देश का लोकतांत्रिक ढांचा हिल गया था। देश के नागरिक अधिकारों, राजनीतिक स्वतंत्रता और विशेष रूप से प्रेस की आजादी पर ऐसा कुठाराघात हुआ, जिसकी मिसाल आज भी दी जाती है।

सरकारी आंकड़ों के अनुसार, आपातकाल के दौरान 200 से अधिक पत्रकारों को जेल में डाल दिया गया, क्योंकि उन्होंने सरकारी दिशा-निर्देशों के विपरीत काम करना स्वीकार नहीं किया। यह एक ऐसा समय था जब हर अखबार की प्रत्येक पंक्ति सरकार की सेंसरशिप की छांव में लिखी जाती थी।

समाचार एजेंसियों का जबरन विलय और सेंसरशिप की कठोरता
प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया (PTI), यूनाइटेड न्यूज ऑफ इंडिया (UNI), हिंदुस्तान समाचार और समाचार भारती इन चार प्रमुख समाचार एजेंसियों का जबरन विलय कर एक नई एजेंसी ‘समाचार’ का गठन किया गया। तत्कालीन पीटीआई के सीईओ एम.के. राजदान के अनुसार, आपातकाल के दौरान सूचना प्रसारण मंत्रालय ने समाचारों की निगरानी के लिए एक वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी को नियुक्त किया, जिसकी जिम्मेदारी थी कि केवल सरकार समर्थक खबरें ही अखबारों तक पहुंचें।

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आपातकाल की दिल दहला देने वाली सच्चाई!

पत्रकारों को सरकार के पक्ष में लिखने का दबाव
आपातकाल के दौरान संजय गांधी द्वारा चलाए गए जबरन नसबंदी जैसे कार्यक्रमों की प्रशंसा करने के लिए पत्रकारों पर दबाव डाला गया। विपक्षी नेताओं की गतिविधियों से जुड़ी खबरों को छोटा करके छापने के आदेश दिए गए। संपादकों से साफ कहा गया कि वे ‘सरकार विरोधी’ कुछ भी प्रकाशित न करें।

जेल भेजे गए नामी संपादक और सेंसरशिप की सीमा
प्रख्यात पत्रकार कुलदीप नैयर और ‘द मदरलैंड’ के केआर मलकानी को केवल इसलिए जेल भेजा गया क्योंकि उन्होंने आपातकाल के दौरान भी जयप्रकाश नारायण की गतिविधियों को समाचारों में प्रमुखता से प्रकाशित किया। वरिष्ठ पत्रकार एस. वेंकट नारायण ने बताया कि उन्हें हर लेख की पांडुलिपि सेंसर अधिकारी के पास भेजनी होती थी। सरकार की नीतियों की आलोचना करना ‘देशद्रोह’ जैसा माना जा रहा था।

बिजली काटकर रोका गया अखबारों का प्रकाशन
26-27 जून 1975 की रात दिल्ली के बहादुर शाह ज़फ़र मार्ग स्थित प्रमुख अखबारों के दफ्तरों की बिजली काट दी गई ताकि वे अगले दिन के संस्करण न छाप सकें। इसके अलावा सरकार ने उन समाचार पत्रों के विज्ञापन बंद कर दिए जो सरकारी लाइन से हटकर चल रहे थे। ‘इंडियन एक्सप्रेस’ ने विरोधस्वरूप 28 जून को अपना संपादकीय कॉलम खाली छोड़ा, जिस पर सरकार ने कड़ी आपत्ति जताई।

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‘हिम्मत’, ‘नवजीवन’ जैसे संस्थानों पर दबाव
आपातकाल के दौरान महात्मा गांधी द्वारा स्थापित नवजीवन प्रेस की प्रिंटिंग सुविधाएं बंद कर दी गईं। गांधीजी के पौत्र राजमोहन गांधी द्वारा संपादित साप्ताहिक ‘हिम्मत’ को आपत्तिजनक सामग्री प्रकाशित करने पर भारी राशि जमा करने को कहा गया। यह सरकार की असहिष्णुता का बड़ा संकेत था।

विदेश से लौटते पत्रकार तक सुरक्षित नहीं थे
वरिष्ठ पत्रकार वेंकट नारायण ने बताया कि जब वे स्कॉलरशिप के बाद लंदन से लौटे तो दिल्ली एयरपोर्ट पर पुलिस उनके इंतजार में खड़ी थी। उनके बैग की तलाशी ली गई कि वे कोई ‘आपत्तिजनक साहित्य’ लेकर तो नहीं आ रहे हैं।

प्रेस को पूरी तरह नियंत्रण में रखने की कोशिश
नागपुर से प्रकाशित ‘हितवाद’ के संवाददाता ए.के. चक्रवर्ती ने बताया कि हर खबर के लिए सूचना विभाग से अनुमोदन लेना अनिवार्य हो गया था। यह प्रेस की स्वतंत्रता पर पूरी तरह लगाम कसने जैसा था।

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