कुत्तों पर राष्ट्रीय और सुप्रीम विमर्श के दौरान मुतरेजा को कुत्ते ने काट लिया है. काटा गली के किसी कुत्ते ने पर वह सम्पूर्ण कुत्ता बिरादरी के खिलाफ हो गया है. परशुराम की तरह वह सृष्टि से कुत्ता जाति को मिटाने के लिए खड्गहस्त हो घूम रहा है. एक हाथ में फरसा और दूसरे में कुत्तों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का आदेश लिए सुबह सुबह मेरे पास आया.
‘अरे मुतरेजा सुबह सुबह?’ मुतरेजा घूमा और अपनी पृष्ठभूमि दिखाता हुआ चिल्लाया, “देखिए मुझे आवारा कुत्ते ने काट लिया. हर साल 37 लाख लोगों को काटते हैं ये बेहूदे. हर साल 45 हज़ार लोग और मासूम बच्चे कटखने कुत्तों के कारण रैबीज से मरते हैं. और इंडिया गेट पर ये आधुनिकाएँ फ़ैशन परेड की तरह कुत्ता परेड कर रही हैं. किसे परवाह है रैबीज से मरते बच्चों की. कुत्तों के लिए दुनियां को सिर पर उठाए ये कुत्ता प्रेमी क्या मरे हुए मासूमों को वापस ला सकते हैं.” मैंने देखा, मुतरेजा के पिछवाड़े फटी पतलून से खून रिस रहा था.
मैंने कहा, “मुतरेजा भाषण देने से पहले डॉक्टर के पास जाओ. मरहम पट्टी करवाओ. एंटी-रैबीज की सुई लगवाओ. तुम्हें पता है रैबीज कितनी ख़तरनाक बीमारी है”. मुतरेजा भभका, “मैं आप जैसे कुत्ता प्रेमी को यह दिखाने आया हूँ की दिल्ली की हालत इन आवारा कुत्तों ने क्या कर दी है. बच्चे पार्कों में खेल नहीं पा रहे हैं. बुजुर्ग कालोनियों में मॉर्निंग वॉक नहीं कर पा रहे हैं. महिलाएँ घर से नहीं निकल रही हैं. चौतरफ़ा इन आवारा कुत्तों का आतंक है. जिसे पाते हैं उसे काटने नोचने लगते हैं.
“मुतरेजा पहले डॉक्टर के पास जाओ. तुम्हें डॉगबाइट की भयावहता का अंदाज़ नहीं है”. “मुझे अंदाज़ है सर”, वह चिल्लाया… “हाँ, हाँ, मैं इससे मर सकता हूँ. पागल हो सकता हूँ. विचारधारा बदल सकती है. पर मैं कुत्तों के खिलाफ अपनी निर्णायक लड़ाई जारी रखूँगा. मुझे इसके ख़तरे का अदांजा है. कुत्ता काटने से एक नई बीमारी फैल रही है. आदमी की विचारधारा 360 डिग्री बदल जाती है. सर, आप जानते होंगे पाश को. उसने लिखा है- मेहनत की लूट सबसे ख़तरनाक नहीं होती. पुलिस की मार सबसे ख़तरनाक नहीं होती. ग़द्दारी और लोभ की मुट्ठी सबसे ख़तरनाक नहीं होती. पर सबसे ख़तरनाक होता है विचारधारा का बदल जाना”.( यह मुतरेजा ने ख़ुद जोड़ लिया) मुतरेजा पूरे रव में बोलता रहा, “अब देखिए! अपने संपादक जी को, वे असम गए थे. उन्हें नॉर्थ ईस्ट में किसी कुत्ते ने क्या काटा, उनकी विचारधारा बिल्कुल उलट गयी.
आरएसएस के तृतीय वर्ष प्रशिक्षित संपादक जी संघ को भर-भरकर गालियाँ देने लगे. सन १४ से २२ तक मोदी जी के प्रति प्रशंसा के भाव वाले संपादक जी का वश चले तो वह अकेले सरकार का तख्ता पलट दें. सुबह होते ही दुनिया की हर समस्या के पीछे संघ और भाजपा को देखते हैं. यह स्थिति भयावह है. सर मैं इस स्थिति से डर रहा हूँ”. “अरे डरने से क्या होगा? तुरंत सुई लगवाओ. फ़ौरन अस्पताल जाइए वरना ख़तरा तुम पर भी है. तुम भी ऐसी अवस्था को प्राप्त हो सकते हो. पहले तो लोग नगर-गांव में कहते ही थे कि क्या कुत्ता काट लिया है कि कम्युनिस्ट….”. “बाप रे, बाप रे, सही कह रहे हैं आप”, मुतरेजा चीखा.
मैं उसे समझाने लगा, “अस्पताल जाने से पहले यह सुनते जाओ मुतरेजा कि तुम जिन्हें आवारा कुत्ते कह रहे हो उन्हें आवारा नहीं, समाजिक कुत्ता कहो. कुत्तों को आवारा कह देना एक सस्ता तरीका है. ऐसा वही कह सकते हैं जो या तो अपनी छत के दंभ में हैं या कुत्ते की सामाजिकता को समझते नहीं हैं. तुम्हारी सोच में पट्टे से बंधा कुत्ता ही पात्र और सुयोग कुत्ता है. क्योंकि उसका नाम है, घर है, मालिक है, नस्ल और गोत्र की पहचान है. उनके पास मॉम हैं और सेवक भी हैं. लेकिन निशाने पर तो वो कुत्ता है जो पट्टे और चेन के दायरे से बाहर है. दरअसल यह सर्वहारा कुत्ता सदा से सामाजिक रहा और घरों में बँधकर नहीं पला. इसलिए इसे आवारा कहा गया. जबकि आवारगी एक आध्यात्मिक अवस्था है. माशूक़ और माशूका के मिलन का ज़रिया है. आवारगी इश्क़ हक़ीक़ी का रास्ता है. मोहसिन नकवी ने लिखा है – ये दिल ये पागल दिल मेरा, क्यों बुझ गया आवारगी. इस दश्त में इक शहर था, वो क्या हुआ आवारगी… इसलिए आवारगी बदचलनी या लुच्चई नहीं है. इन कुत्तों को आवारा कहना जायज़ नहीं है”.
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दरअसल आवारगी के मायने स्वच्छंदता है. आवारगी कुछ और नहीं बल्कि एक घर और एक परिवार की चिंता से इतर देखने, सोचने और विचरने की जीवनशैली है.ऐसे लोग प्रकृतिवादी होते हैं, घुमक्कड़ हो सकते हैं. दार्शनिक या कलाकार हो सकते हैं. क्रिएटिव और जीनियस हो सकते हैं. विचारक और विद्रोही हो सकते हैं. वो किसी जंजीर या रिश्ते में बंधते नहीं. हमारे बीच रहते हैं और हमारे साथ रहते हैं लेकिन समाज के द्वारा व्याख्यायित तरीकों, नियमों, मर्यादाओं और संबंधों से ऊपर होते हैं.
इसलिए ऐसे कुत्ते समाजिक होते है. वो एक मोहल्ले मे जन्मते है. जैसे-जैसे वो बड़े होते है, अपने रोटी देने वालों, पुचकारने और डांटने वालों, बच्चों, महिलाओं, बड़ों, मोहल्ले में रहने वालों, आने जाने वालों और यहां तक कि दूसरे जानवरों को पहचानते है. वो वहां के समाज का एक खाका अपने मन में उतारते है. इससे इतर जब कोई आता है तो वो उससे सवाल करता है. भौंकता है. रोकता है. सचेत करता है. कुत्ते की इस सामाजिक परिधि में वो दूसरे मोहल्ले या इलाके के कुत्तों को भी आने नहीं देता. वो अपनी सीमा तय करता है. दूसरी सीमा में जाता है तो दुम दबाता है, अपनी सीमा में आए हुए को कान खड़े कर गुर्राता है.
महानगरी चरित्र में कुत्ते और इंसान की इसीलिए अनबन देखने को मिलती है क्योंकि यहां आए लोग किसी एक सामाजिक संस्कृति के नहीं हैं. एक बसाहट के नहीं हैं. उनकी नदियां, पुरखे, खेत, रिवाज और भाषाएं, बोलियां अलग हैं. ये महानगर एक भ्रष्ट सामाजिक चरित्र में जीते हैं. कुत्ता यहां कनफ्यूज़ है. वो अपने पराए को पहचान नहीं पा रहा. न उसको नेह से भरी आंखें दिखती हैं और न ही उसके वजूद को स्वीकारने वाले लोग. वो अपने ही मोहल्ले में अपरिचित है और मोहल्ला ख़ुद से भी अपरिचित है. महानगर ने अपना सामाजिक चरित्र खोया है. जो है वो समावेशी नहीं है. वहां जानवरों, पक्षियों के लिए जगह नहीं है. वहां केवल दौड़ है साबित करने की, जीतने की, अर्जित करने की और समाज से दूरी बनाकर अपनी एक क़ैद ज़िंदगी जीने की. ऐसा अक्सर देखने को मिलेगा कि लोग पड़ोस में रहकर, एक टॉवर में होकर भी एक दूसरे को जानते नहीं. आते जाते नहीं. ऐसा समाज जो आदमी को अपनत्व नहीं दे पा रहा, बहुत आसानी से कुत्तों को आवारा कह देता है.
आवारगी का मतलब सिर्फ गलियों और सड़कों पर भटकने वाले नहीं है. यह विचारों, सपनों और अनुभवों की स्वतंत्र यात्रा है. क्योंकि स्वछंद आवारगी में बिना मंजिल के सफ़र की रोमांचक अनुभूति होती है. मिर्ज़ा गालिब कहते हैं -“रुस्वा-ए-दहर गो हुए आवारगी से तुम ,बारे तबीअतों के तो चालाक हो गए”. यानी तुम दुनिया में बदनाम तो हो गए हो, आवारागर्दी से, लेकिन अपनी फितरतों के तो चालाक हो गए हो.
“मुझे आप ज्ञान मत पिलाइए. अगर कटखने कुत्ते को शेल्टर होम में डाल दिया जाए तो इसमें आपको एतराज क्या है? यही तो सुप्रीम कोर्ट कह रहा है. उन्हें उन बेचारे बकरों की तरह काटा तो नहीं जा रहा है. जिन करोड़ों बकरों के काटे जाने पर यह पशु प्रेमी मुँह में दही जमाए रखते है”. “लेकिन मुतरेजा, आठ हफ्ते में सात करोड़ कुत्तों को कैसे शेल्टर होम भेजा जा सकता है? समय कम है”. “जब आठ हफ़्ते में बिहार के साढ़े सात करोड़ मतदाता के दस्तावेज चुनाव आयोग जॉंच सकता है तो कुत्ते क्यों नहीं पकड़े जा सकते. यह संख्या तो उससे कम है”, मुतरेजा विजेता भाव में बोल रहा था.
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मुतरेजा को ठंडा करने के लिए मैंने चुटकी ली, “मुतरेजा, सुप्रीम कोर्ट आजकल के राजनैतिक लोगों के भाषण और डॉयलॉग्स सोशल मीडिया में पढ़ और सुनकर लगता है, पक गया है. उसे लगता है कि इन सभी को कुत्तों ने काट लिया है. इसीलिए सुप्रीम कोर्ट ने तंग आकर कहा होगा कि सब कुत्तों को आश्रय गृह में रखिये. न रहेगा बांस न बजेगी बाँसुरी”.
“मुझे उलझाइए मत. मुद्दा एक है कि इन सड़क के कुत्तों को तो हटना ही पड़ेगा”. “मुतरेजा, मैं भी कुत्ता प्रेमी हूँ. मेरे सेक्टर में भी लोगों ने मॉर्निंग वॉक बंद कर दिया है. एक बड़ा वर्ग, जो पीड़ित भी है, वह चुप है. लेकिन यह उपाय नहीं हैं. अगर समाज में कुछ बलात्कारी हैं तो सभी पुरुषों को तो जेल में बंद नहीं किया जा सकता. यही बात तो इन सामाजिक कुत्तों पर भी लागू होती है”.
मुतरेजा उत्तेजना में आ गया, “सर इन कथित पशु प्रेमियों को मैंने दोनों हाथ से मांस खाते हुए देखा है. ये बेशर्म उसके विडियो भी पोस्ट करते हैं. और फिर खुद को पशु प्रेमी भी बताते हैं. कहते हैं कि सरकार इन्हें पकड़कर इनकी नसबंदी करे. सर नसबंदी से रैबीज नहीं रुकता. अगर आप वैक्सिनेशन भी कर दें तो भी कुत्तों के द्वारा बच्चों का नोचना और उन्हें काटना नहीं रुकता”.
“मुतरेजा, सुनो. मेरे मोहल्ले के कुत्ते बहुत सहमे और डरे हुए हैं. कुछ भूमिगत हो गए हैं. इस आशंका में कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर सरकार उन्हें कहीं पकड़कर बंद न कर दे. वे लगभग वैसी ही मानसिक स्थिति से गुजर रहे हैं जिस मनःस्थिति में २५ जून १९७५ को इमरजेंसी लगने के बाद राजनैतिक कार्यकर्ता डरे हुए थे. उनकी ज़िन्दगी दुर्दशा को प्राप्त है. छुप गए हैं. इन सर्वहारा कुत्तों को सेक्टर का श्रेष्ठी वर्ग शक की नज़रों से देख रहा है. और वे किसी आसन्न विपत्ति की आशंका में अपनी पूँछ को दो टॉंगों के बीच घुसेड़े सहमे सहमे घूम रहे हैं. एक तरफ़ कुत्ता विरोधी समूह दूसरी तरफ सुप्रीम कोर्ट का डंडा”.
मुझे फैज-अहमद-फैज याद आ रहे हैं. उनकी एक नज्म है- कुत्ते.
ये गलियों के आवारा बेकार कुत्ते,
कि बख्शा गया जिनको जौक-ए-गदाई,
जमाने की फटकार सरमाया इनका,
जहाँ भर की दुत्कार इनकी कमाई.’
फैज इस नज्म में कुत्तों को जरिए मजलूम इनसान की बात कर रहे हैं या यूँ कहिए कि सर्वहारा कुत्तों का दर्द बयाँ कर गए हैं. पर फिलवक्त देश के कुत्तों पर यह फिट बैठ रही है.
रिसते खून और बढ़ते दर्द के वावजूद मुतरेजा हार नहीं मान रहा था, “यह दिखावा है. नक़ली कुत्ता प्रेम है. अगर सही में इन्हें ज़रा भी आवारा कुत्तों की परवाह है, तो हर प्रेमी पॉंच-पॉंच आवारा कुत्तों को अपने घर में रखे. समस्या का समाधान भी होगा और इनका अस्ल प्रेम भी साबित होगा. इन्हें कहॉं आपके सर्वहारा कुत्तों की परवाह है. इनके कुत्ते तो चकाचक हैं, वो आलीशान घरों में रहते हैं. बिस्तरों पर सोते हैं. मल्टीनेशनल कम्पनियों में बने भोजन करते हैं. इनकी आम आदमी से ज्यादा ऐश है”.
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“नहीं मुतरेजा, ऐसा नहीं है. करोड़ों साल की अपनी मेहनत से यह भेड़िया प्रजाति का प्राणी आज मनुष्य के घर में ही नहीं, उसके ह्रदय में गहरे उतर गया है. ये उसका प्रेम ओर समर्पण है, जो कोई और प्राणी नहीं कर पाया, गाय कभी मनुष्य के बहुत नज़दीक थी. पर उसमें अपना स्वार्थ भी था, क्योंकि वह दूध देती थी उसके बछड़े खेतों में काम करते थे. कुत्ते का कोई खास काम नहीं है, वह अपनी सरलता और तरलता से मनुष्य के साथ रच बस गया. मन भी तरल है, जल की तरह. एक हमारा पालतु कुत्ता था. उसके हाव भाव को मैंने बहुत बरीकी से देखा ओर समझने की कोशिश की. उसका समर्पण और साधना बेमिसाल है. भगवान भी उसके आगे नतमस्तक होता है”.
इसे समझने के लिये एक कथा सुनो. बात पुरानी है. जंगल में एक फकीर रहता था. बहुत प्रेमपूर्ण, सरल और निर्मल हृदय का. वह जंगल में साधना करता और लोगों को प्रेम व करुणा का संदेश देता. सम्पत्ति और सुविधा के नाम पर उसके पास केवल एक पुराना कंबल और एक कुत्ता था. कुत्ता उसका सच्चा साथी था. जहाँ भी फकीर जाता, कुत्ता उसके साथ चलता. एक दिन फकीर तीर्थयात्रा पर निकला. नदी पहाड़ पार कर वह नगर-नगर घूमता रहा. लोग फकीर के उपदेशों से प्रभावित होते, लेकिन वे यह देखकर चकित भी होते कि एक कुत्ता सदा उसके साथ क्यों है. समय बीतता गया. एक दिन फकीर को पता चला कि पास के गाँव में एक बड़े संत प्रवचन कर रहे हैं. उसने सोचा, चलकर सुनना चाहिए. वह अपने कुत्ते के साथ वहाँ पहुँचा. संत ने बड़े भावपूर्ण शब्दों में कहा, “जो ईश्वर की खोज करना चाहता है, उसे सब छोड़ना पड़ता है. यहाँ तक कि पशु, संबंध, बंधन– सब छोड़ो. तभी परमात्मा मिलेगा”.
फकीर ने सोचा, यह बात तो सही है. अब मुझे इस कुत्ते को भी छोड़ देना चाहिए. अगले दिन वह एक जंगल में गया और कुत्ते से कहा, “अब मैं तुझे छोड़ता हूँ. तू स्वतंत्र है. मैं तुझसे प्रेम करता हूँ, पर ईश्वर की खोज में अब तेरे साथ नहीं रह सकता.” कुत्ता कुछ नहीं बोला, केवल उसकी आँखों में करुणा थी. फकीर चला गया. लेकिन कुछ दूर जाने के बाद उसने देखा कि कुत्ता पीछे-पीछे आ रहा है. उसने उसे डांटा, भगाया, पत्थर फेंके, पर कुत्ता रुका नहीं. फकीर थक गया. उसने सोचा, यह कैसे संभव है? मैंने तो इसे छोड़ दिया! रात हुई. फकीर ध्यान में बैठा. कुत्ता थोड़ी दूर पर बैठा रहा, उसके आंखों से ऑंसू बहते रहे. रात बीती. फकीर ध्यान से उठा. उसकी निगाहें अनायास ही उस ओर गईं, जहाँ कुत्ता बैठा था. लेकिन अब वह बैठा नहीं था. वह चुपचाप जमीन पर लेटा था, उसकी आँखें खुली हुई थीं. पर उनमें जीवन नहीं था. वह चल बसा– भूखा, प्यासा, थका हुआ, पर अपने मालिक के प्रति प्रेम में अडिग, समर्पित.
फकीर फूट-फूटकर रो पड़ा. उसने कहा, “हे प्रभु! मैं इस कुत्ते से जीत नहीं सका. उसकी भक्ति ने मुझे पराजित कर दिया. उसका समर्पण ही मेरा गुरु बन गया.” उसी क्षण फकीर के भीतर एक ज्योति फूटी. उसे अनुभव हुआ कि ईश्वर कहीं बाहर नहीं, भीतर ही है – प्रेम में, भक्ति में, और समर्पण में. उसी क्षण उसे आत्मज्ञान प्राप्त हुआ. फकीर ने कांपती आवाज़ में कहा, “हे प्रभु! मैंने इसे छोड़ दिया, पर इसने मुझे नहीं छोड़ा. मैंने इसे त्यागा, पर इसने मुझे अपनाया. इसकी भक्ति ने मेरी साधना को पराजित कर दिया. इसका प्रेम मेरा गुरु बन गया. मैं तो तप करता रहा, ध्यान करता रहा, लेकिन जो समर्पण इसने किया, मैं उसके आगे कुछ भी नहीं हूँ”.
तभी फकीर के भीतर कुछ टूटा, और कुछ नया जन्मा. एक गहन अनुभूति, एक प्रकाश, एक शांति उसके समूचे अस्तित्व को भर गई. उसे समझ में आ गया कि ईश्वर को पाने के लिए कहीं जाने की आवश्यकता नहीं, किसी को छोड़ने की ज़रूरत नहीं – ईश्वर तो इसी प्रेम में, इसी भक्ति में, इसी समर्पण में है. फकीर ने कहा, “अब मुझे कोई और गुरु नहीं चाहिए. यह कुत्ता ही मेरा गुरु है. इसने मुझे सिखा दिया कि अहंकार छोड़ो, प्रेम करो, समर्पण करो. तब ईश्वर स्वयं प्रकट हो जाएगा. मैं बाहर खोजता रहा, पर यह जीव तो भीतर बैठा ईश्वर ही बन गया – जिसने मेरी आत्मा को जगा दिया.” फकीर ने उस दिन से तप करना छोड़ दिया, वह केवल प्रेम करने लगा – हर जीव से. उसे पता चल गया कि ईश्वर को खोजने की नहीं, अनुभव करने की ज़रूरत है. कुत्ते का समर्पण उसकी साधना की पूर्णता बन गया.
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“तुम भी, मुतरेजा, नफ़रत छोड़ दो. प्रेम करो. हमारी परम्परा में वेदों में भी जानवरों का ध्यान मनुष्यों से पहले रखा गया है. केवल मनुष्यों नहीं, ’प्राणिमात्र’ की चिन्ता की गयी है. ‘बृहदारण्यक उपनिषद्’ में कहा गया है. “सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुःखभाग्भवेत्”. सभी सुखी हों, सभी निरामय हों, सब निरोग हों, किसी को दुख का भागी न होना पड़े. यह सिर्फ मनुष्य पर नहीं हर जीव के लिए है. इसमें कुत्ते भी शामिल हैं.
पालतू या जीव के प्रति उदार भावना हमारे संस्कारों में है. हम बिना कहे बचपन में ही जान जाते हैं कि किस जीव से हमारे कैसे रिश्ते हैं. हमारे जीवन में ये लाड़-प्यार के वाहक रहे हैं. इसलिए ऋषियों ने इन्हें देवताओं से जोड़ा. उसने समूची सृष्टि की चिंता की. “ॐ द्यौ: शान्तिरन्तरिक्षँ शान्ति:, पृथ्वी शान्तिराप: शान्तिरोषधय: शान्ति: वनस्पतय: शान्तिर्विश्वे देवा: शान्तिर्ब्रह्म शान्ति:, सर्वँ शान्ति:, शान्तिरेव शान्ति:, सा मा शान्तिरेधि”. हमारी उदार परम्परा केवल पशु पक्षी नहीं वनस्पतियों के कल्याण की भी कामना करती है.
हम इस विचार से भटके नहीं इसलिए हमारे मनीषियों ने पशु-पक्षियों को भगवान के वाहनों से जोड़ दिया. ताकि उनके प्रति हमारा व्यवहार संवेदनशील हो. एक प्रेम का भाव हो. हिंसा का भाव कभी मन में न आए. इसलिए वैदिक ऋषियों ने हर पशु को किसी न किसी भगवान का प्रतिनिधि बना दिया. विष्णु का वाहन ‘गरुड़’ हुआ, शिव का ‘बैल’, भैरव का ‘कुत्ता’, लक्ष्मी का वाहन ‘उल्लू’. सरस्वती का वाहन ‘हंस’ माना गया. दुर्गा का वाहन ‘बाघ’ है. गणेश का वाहन ‘चूहा’ है. कार्तिक का वाहन ‘मोर’ है. इंद्र का वाहन ‘ऐरावत’ है. समुद्र मंथन में निकले 14 रत्नों में से एक था. यमराज का वाहन ‘भैंसा’ है. भैंसा शक्ति और स्फूर्ति के लिए जाना जाता है. मां गंगा का वाहन ‘मगरमच्छ’ है. यमुना का वाहन कछुआ है. शनि का वाहन ‘कौवा’ बहुत ही चतुर और चालाक होता है. सूर्य का वाहन ‘घोड़ा’ है. घोड़ा शक्ति, ऊर्जा और गति का प्रतीक है.
पशुओं और पक्षियों को सम्मान और आदर दिलाने के लिए वैदिक ऋषि यही नहीं रुकते. वे उससे भी आगे बढ़ते हैं. कुछ पशुओं को भगवान का अवतार बता दिया गया. ‘मत्स्य’ अवतार हुआ. ‘कूर्म’ अवतार हुआ. ‘वाराह’ अवतार हुआ. ‘नरसिंह’ अवतार हुआ. सृष्टि को बचाने राक्षसों के अंत के लिए भगवान को यह अवतार लेना पड़ा. इन जीवों को भगवान का अवतार बता प्रेम भाव को पूजा भाव में बदल दिया.
मुतरेजा अब हताश और निरुत्साहित हो चला था. वो सिर पकड़ कर बैठ गया. मैं कहता गया, “मुतरेजा, सृष्टि की शुरुआत से मनुष्य के साथ-साथ कुत्तों का नाता मिलता है. ऋग्वेद दुनिया की पहली किताब है. कुत्ते का जिक्र सबसे पहले इसमें मिलता है. ‘सरमा’ नाम की एक कुतिया देवताओं के लिए जासूसी करती थी. वेदों के बाद वाल्मीकि रामायण में इसका जिक्र आता है. राम वनगमन के बाद अयोध्या की सुरक्षा के लिए भरत को उनके नाना कैकेय नरेश ने दो हजार कुत्ते दिए थे.
रामायण के बाद महाभारत का काल शुरू होता है. महाभारत की शुरुआत ही एक कुतिया के शाप से होती है. संदर्भ दो हैं. पांडवों के बीच एक नियम था कि जिस वर्ष द्रौपदी जिस पांडव के साथ पत्नी के रूप में रहती. उस वर्ष उनके अंत:पुर में किसी और का प्रवेश वर्जित था. एक दफा अर्जुन बिना बारी से चले गए तो उन्हें एक साल का वनवास लेना पड़ा. कथा है एक बार कुत्ता युधिष्ठिर की बारी में अन्त:पुर में प्रवेश कर गया. उस वक्त युधिष्ठिर द्रौपदी के साथ एकांत क्षणों में थे. युधिष्ठिर को कुत्ते को देख क्रोध आ गया. उन्होंने समस्त कुत्ता जाति को श्राप दे दिया था कि भविष्य में कुत्ते जब इस कार्य को संपादित करेंगे तो वह सार्वजनिक होगा. आज जो गली, चौराहे पर कुत्तों को इस स्थिति में देखते हैं. वह उनका लंपटपन नहीं युधिष्ठिर का श्राप है.
महाभारत में कुत्ते का दूसरा प्रसंग युद्ध के बाद जब पांडव स्वर्ग की तरफ जा रहे थे. तो युधिष्ठिर के कुत्ते धर्म का जिक्र आता है. इस यात्रा में सबने उनका साथ एक-एक कर छोड़ दिया. सबसे पहले द्रौपदी गयी, उसके बाद सहदेव, फिर नकुल, फिर अर्जुन और अंत में भीम गए. एक-एक सब मृत्यु को प्राप्त हुए. सिर्फ युधिष्ठिर और उनका कुत्ता बचा. युधिष्ठिर को लेने इंद्र स्वयं आए. इंद्र ने युधिष्ठिर से कहा आप सशरीर स्वर्ग आइए पर कुत्ता नहीं आ पाएगा. युधिष्ठिर ने कहा मैं अकेले नहीं आऊंगा कुत्ता साथ जाएगा. वह हमारा आखिरी तक साथ देने वाला भक्त है. मुझे ऐसा स्वर्ग नहीं चाहिए जो कुत्ते के बिना हो. यह कुत्ता नहीं धर्म है. धर्मावतार है. इंद्र प्रसन्न हुए और कुत्ते को ले जाने की इजाजत दी.
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भारत में कोई आठ करोड़ आवारा (सर्वहारा) कुत्ते हैं. 2024 में, 30 लाख से ज़्यादा कुत्तों के काटने के मामले सामने आए, हालाँकि वास्तविक संख्या निश्चित रूप से इससे कहीं ज़्यादा है. विश्व भर में रैबीज़ से होने वाली मौतों में से 36% भारत में होती हैं. विश्व स्वास्थ्य संगठन का अनुमान है कि हर साल अठ्ठाईस से तीस हज़ार मौतें होती हैं. भारत में पालतू जानवरों के बाज़ार में कुत्तों का दबदबा है. 2023 में भारत में पालतू कुत्तों की कुल आबादी 33 मिलियन से ज़्यादा थी, और 2028 तक इसके 51 मिलियन से ज़्यादा हो जाने की संभावना है. अमूमन पालतू कुत्तों के नाम विदेशी रखे जाते हैं. पहले ज्यादातर के नाम मोती होते थे. मैं इसकी वजह ढूँढ़ता रहा. कुछ रोज बाद समझ में आया कि कांग्रेस को चिढ़ाने की यह समाजवादियों की ही कारस्तानी होगी. मोती लाल नेहरू से जोड़कर मजा लेते होंगे समाजवादी आमिर खान ने शाहरुख खान को चिढ़ाने के लिए अपने कुत्ते का नाम शाहरुख रखा था. बाद में कबीर के जरिए समझ में आया कि पाँच सौ बरस पहले से ही कुत्ते का मोती नाम रखा जाता रहा है. कबीरदास कहते हैं-
कबिरा कूता राम का, मोतिया मेरो नाव
गले राम की जेवरी, जित खींचें तित जाऊँ.
दुनिया जिस रफ्तार से बदल रही है उसमें सबसे पीड़ादायक है रिश्तों की बुनियाद का हिल जाना. इंसानी रिश्तों में एक अजीब दूरी बढ़ती जा रही है. रिश्तों के मायने, दायरे और तरीके बदल रहे हैं. लेकिन इंसान की बदलती दुनिया में जिसे पालतू कहा गया है वो अभी भी बदला नहीं है. उसमें वफादारी है. अपनत्व है. मासूमियत है. छल, कपट, धोखा, बनावट नहीं है. अब इन्हीं से उम्मीद है.
पालतू हमसे आत्मीयता चाहते हैं. थोड़ा सा प्रेम. थोड़ा सा स्नेह. उनकी हरकतें कई बार बच्चों जैसी होती हैं. अब मेरे मित्र तिवारी जी को ही ले लो. लखनऊ में रहते हैं. बड़े आदमी हैं. उन्होंने छोटे-बड़े ढेर सारे कुत्ते पाले हैं. मैं एक रोज उनके घर गया तो उनका कुत्ता भौंकने के बजाय दौड़कर अंदर भागा और जोर-जोर से आवाज कर दूध पीने लगा. मैंने पूछा, कुत्ता हमें बिना जाँचे-सूँघे कहाँ गायब हो गया. उनकी पत्नी ने बताया कि वह दिन भर दूध पीने में नखरे करता है, पर जब भी घर में कोई अतिथि आता है, तो दौड़कर दूध पी जाता है. उसे लगता है कि घर आए मेहमान कहीं उसका दूध न पी जाएँ. ऐसी होती हैं इनकी बालसुलभ हरकतें.
मुतरेजा अब दाँत पीस रहा था. लेकिन वो मेरे प्रति नहीं, ख़ुद के प्रति. यह असमंजस की अवस्था थी. एक तरफ़ परशुराम जैसी प्रतिज्ञा और दूसरी तरफ़ कुत्तों के इतिहास और महत्व पर मेरा प्रवचन. वो इस असमंजस में अब घाव की जगह सिर खुजाने लगा था. मैंने देखा कि ये ठीक नहीं. मैं उठा और मुतरेजा के कंघे पर हाथ रखा. “मुतरेजा, अभी तुम्हारी समस्या कुत्ते नहीं, ये घाव और इसके कारण होने वाली बीमारी है. अगर कोई सांप किसी को काट ले तो सांप के पीछे नहीं भागा जाता. काटे हुए को बाँध कर उपचार के लिए तत्पर हुआ जाता है. अभी तुम्हारा पहला काम है इलाज लेना. तत्काल जाओ, सुई लगवाओ. ड्रेसिंग करवाओ. इस पतलून को नमस्ते करो वरना ये तुमको दंश देती रहेगी”.
मुतरेजा का दर्द अब दिमाग़ से हटकर वापस घाव की ओर चल चुका था. उसे मेरी बाकी बातें समझ आईं कि नहीं, ये नहीं कह सकता. लेकिन घाव की पीड़ा अब वो वापस अनुभूत कर रहा था. इस पीड़ा में प्रतिशोध नहीं था, उपचार की ज़रूरत को समझना था. मुतरेजा बोला, “कुत्तों का कुछ करिए सर…” “लेकिन पहले उपचार… फिर करेंगे विचार. स्वस्थ होकर आओ मुतरेजा.” मुतरेजा अब पलटकर चल दिया था. उसकी पृष्ठभूमि पर घाव जाते हुए दिख रहा था. पृष्ठभूमि के घाव जाकर भी कहां जाते हैं. वो याद रहते हैं. फिर फिर कुरेदते हैं. मुतरेजा तो ठीक हो जाएगा. पता नहीं, कुत्तों का क्या होगा.
(लेखक देश के जाने-माने पत्रकार हैं।)
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