Thursday, June 25, 2026
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गंगापार में एप्पल बेर की खेती बनी कमाई का जरिया

एप्पल बेर की खेती कर कमायें लाखों : रवि प्रकाश मौर्य

प्रयागराज (हि.स.)। बेर लगभग सबने खाया और देखा होगा, लेकिन एप्पल जैसा आकार और खाने में बेर का स्वाद, यह शायद पहली बार ही सुना होगा। थाईलैंड का यह फल इंडिया में थाई एप्पल बेर के नाम से प्रसिद्ध है। थाईलैंड में इसको जुजुबी भी कहते हैं।

जानकारी गंगापार के प्रगतिशील किसान रवि प्रकाश मौर्य ने देते हुए बताया कि एप्पल बेर की खेती वन टाइम इनवेस्टमेंट है। इससे एक बार फसल लेने के बाद करीब 25 साल तक फसल ले सकते हैं। कम रख-रखाव व कम लागत में अधिक उत्पादन के कारण किसान इसकी ओर आकर्षित हो रहे हैं।

उन्होंने बताया कि यह प्रेरणा उन्हें लवकुश से मिली और इसे करने की ठानी। पिछले वर्ष पौधे लगवाये और इस वर्ष कुछ फल भी मिले हैं। श्री मौर्य ने बताया कि यह दूसरा वर्ष है, उम्मीद है कि इस बार और फल मिलेगें। उन्होंने बताया कि लवकुश के मुताबिक राजस्थान के सीकर के रसीदपुरा गांव के अरविन्द और आनंद ने ऐसे ही बेर अपने 21 बीघा खेत में उगा रखे हैं। आनंद ने 14 माह पहले इस फल के 1900 पेड़ खेत में लगाए गए थे। यह दूसरा मौका है जब पेड़़ों में फल आए हैं। पांच वर्ष बाद उन्हें 21 बीघा के इस खेत से सालाना करीब 25 लाख रुपए की आय होने वाली है। उन्हें इस वर्ष करीब आठ लाख रुपए की आय होगी। उनकी प्रेरणा लेकर करीब 50 और खेतों में थाई एप्पल बेर के पेड़ लगाए गए हैं।

अरविन्द और आनंद के मुताबिक पेड़ लगाने के चार माह बाद इसमें फल आना शुरू हो जाता है। पहली बार फल प्रति पेड़ में दो से पांच किलो, दूसरी बार में प्रति पेड़ 20 से 40 और पांच वर्ष बाद प्रति पेड़ में एक से सवा कुंतल फल आते हैं। इसके लिए सीकर का क्षेत्र अनुकूल है। यह माइनस डिग्री से $50 डिग्री सेल्सियस तापमान में भी कारगर हुआ है।

उनका कहना है कि अप्रैल माह में इसके पेड़ को नीचे से गन्ना की तरह काट दिया जाता है। दिसम्बर तक इसके फलों को बाजार में सप्लाई किया जा सकता है। यह बेर 60 से 120 ग्राम वजनी होता है। आनंद के पिता किशोर सिंह थाईलैंड गए थे। वहां पर थाई एप्पल बेर की खेती देखकर आए थे। इसके बाद हम दोनों भाइयों ने नेट पर इसके बारे में पढ़ा। अहमदाबाद जाकर इसकी खेती देखी।

सेब व बेर के मिश्रित स्वाद वाले फल की मांग इंदौर, अहमदाबाद, वडोदरा, मुम्बई समेत बड़े शहरों में बढ़ रही है। बेर के खरीददार अधिकांश निजी कम्पनियां हैं। वे इन्हें विदेशों में निर्यात करती हैं। इसके आकर्षक रूप व स्वाद के कारण स्थानीय बाजारों में इसकी मांग बढ़ रही हैं। बाजार में इसका भाव 45 से 50 रुपए किलो तक जाता है।

विद्या कान्त

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