एक कवि के जन्म पर गम, दूसरे की मौत पर रंज!

के. विक्रम राव

एक अंग्रेजी कवि की 157वीं जयंती है आज, (30 दिसंबर 2022)। वह जन्मते ही मर जाता। अथवा भ्रूणावस्था में ही चल बसता! तो हम अश्वेत गुलाम रहे लोगों को अपार हर्ष होता। मगर वह 70 साल जिया। हम भारतीयों की छाती पर (लोहे की) दाल दलते। इस उपनिवेशवादी का नाम था जोसेफ रुडयार्ड किपलिंग: संपादक, उपन्यासकार भी। दूसरे कवि की आज पुण्य तिथि है। चवालीस पर ही अलविदा कह गया। बिलखते छोड़ गया। असीम पीड़ा देकर। नाम था दुष्यंत कुमार। कुल नाम था त्यागी। मगर लिखता नहीं था। था पूर्णतया वैसा ही। उत्सर्ग का पर्याय। एकदम निर्लिप्त, विरागी, विरक्त। आज उनकी 47वीं पुण्यतिथि है। जिस देश में सठियाने के बाद जवानी शुरू होती हैं, दुष्यंत कुमार दो दशक पूर्व ही रुखसत हो चला।
तो चर्चा हो रुडयार्ड किपलिंग की। दैनिक “पायोनियर” (पहले इलाहाबाद-प्रयागराज से, अब लखनऊ से प्रकाशित, 162 वर्ष पुराना) के प्रधान संपादक वे रहे। साहित्य के नोबेल पुरस्कार के विश्व में सर्व प्रथम विजेता थे। सबसे युवा आयु में पाया, तब केवल 41 वर्ष के थे। लंदन के वेस्टमिंस्टर एब्बे (गिरिजाघर) के “कवि कॉर्नर (कोना)” में दफन है। कुछ ही दूर काले पाषाण से निर्मित विंस्टन चर्चिल की मूर्ति लगी है। दोनों एक ही रक्त-समूह के थे। निखालिस उपनिवेशवादी। किपलिंग की कुत्सित काव्यमय पंक्ति थी वाइटमैन बर्डन अर्थात “श्वेत मनुष्य का बोझ।” तात्पर्य था कि दुनिया को सभ्य बनाने का ठेका (पट्टा) ईश्वर ने केवल गोरों के नाम लिख डाला है। अतः दुनिया पर उनका राज देव-प्रदत्त है। किपलिंग कि इसी पंक्ति को ईसाई पादरी भी सच्चा तर्क मानते थे, मतांतरण हेतु। भूल गये वे कि यीशु तो दयालु होता हैं। उनके बारे मे साहित्य-समालोचक डगलस कर्र ने लिखा था कि “किपलिंग अपनी लेखनी द्वारा उत्कट विभेद (असहमति) सर्जाते हैं। वैचारिक विषमता और वैमनस्य, खासकर। अंग्रेजी साहित्य के इतिहास और संस्कृति जगत में उनका स्थान कतई निर्विवाद नहीं है।” वे इतने काबिल नहीं पाए गए कि प्रतिष्ठित ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में दाखिला पा सकते। अतः उनके पिता जॉन लाकवुड किपलिंग ने लाहौर भेजा जहां वे दैनिक “सिविल एंड मिलिट्री गजट” में सह-संपादक नियुक्त हुए। जॉन तब बम्बई के सर जेजे स्कूल आफ आर्ट में कला-अध्यापक थे। रुडयार्ड का जन्म बम्बई में ही हुआ था। वे स्वयं लिखते हैं कि “बम्बई में देसी गाली बोलना मैंने सीखा।” दैनिक “गजट” को वे “मेरी रखैल और प्रेयसी” कहते थे। संपादक स्टीफन व्हीलर ने उन्हें लिखने की पूरी छूट दी थी। अतः “शैली खूब विकसित हो गई।” लाहौर से शिमला डेढ़ सौ किलोमीटर दूर है। अतः ग्रीष्मावकाश उनका पहाड़ पर ही बीतता था। कहानियां, उपन्यास आदि वहीं खूब लिखीं। काव्यमय रचनाएं भी की। फिर दैनिक “गजट” के ही प्रकाशन “दि पायोनियर” में रुडयार्ड संपादक नियुक्त होने पर इलाहाबाद आ गए। वेलवेडर हाउस (एलेन गंज के समीप) रहे। वहीं कविताएं लिखीं “चेरूट ओठों तले थामकर।” यही उनकी लघु कथाओं तथा लेखों का पहला रचना-संग्रह छपा था। दैनिक “पायोनियर” से रुडयार्ड की रचनाओं को पहचान मिली। पूर्वाेत्तर भारत की चाय बागानों के ब्रिटिश मालिक जॉर्ज एलेन ने 1865 में इलाहाबाद में “पायोनियर” स्थापित किया था। यहां सह-संपादक पद पर रहे रुडयार्ड का प्रबंधन से वेतन पर विवाद हो गया। छोड़कर बम्बई चले गए। इसी अखबार के बंगलुरू में, फिर प्रथम विश्व युद्ध के संवाददाता रहे थे विंस्टन चर्चिल। रुडयार्ड के वैचारिक भ्राता थे। सोलह आने साम्राज्यवादी।
बाद में पायोनियर का लखनऊ से प्रकाशन चालू हो गया। संपादक थे डेसमंड यंग जो इसके इलाहाबाद संस्करण में सह संपादक रहे। यंग ने अपने संस्मरण “ट्राई एनीथिंग टवाइस” (प्रकाशन: हेमिल्टन, लंदन, 1963, पृष्ठ 234) में लिखा है, ‘संपादक की टेबल के दराज में करैत साँप और छिपकलियों का वास रहता था। सब एडिटर लोग उनका वध करते थे।’ संपादक यंग ही दैनिक “पायोनियर” को लखनऊ में प्रकाशनार्थ लाए थे। उनका पहला इंटरव्यू था जवाहरलाल नेहरू के साथ जो तभी जेल से रिहा हुए थे। इस भावी प्रधानमंत्री के बारे में यंग ने लिखा कि, “नेहरू बजाए अपने हमवतनियों के, अंग्रेजों के सान्निध्य में अधिक सकून पाते थे।” कानपुर के व्यापारी सर ज्वाला प्रसाद श्रीवास्तव तब “पायोनियर” के अधिष्ठाता थे। यह अवध के ताल्लुकदारों का समाचार पत्र था और ब्रिटिश राज का निर्लज्ज समर्थक। द्वितीय विश्वयुद्ध (हिटलर-टोजो का) तभी शुरू हुआ था। “नेशनल हेरल्ड” (राष्ट्रीय कांग्रेस का दैनिक) को गवर्नर हैलेट राज ने जुर्माना लगाकर बंद कर दिया गया था। डेसमंड यंग ने “हेरल्ड” संपादक, गांधीवादी के. रामा राव को अगस्त 1942 में पांच हजार रुपए के मासिक वेतन पर नियुक्ति प्रस्तावित की थी। तब रुपए में एक मन चावल और सात आने सेर देसी घी मिलता था। “हेरल्ड” में वेतन केवल 450 रुपए था। पर के. रामा राव का प्रण था “भारत की आजादी ही लक्ष्य है।” हेरल्ड नहीं छोड़ा। फिर जेल हो गई। रुडयार्ड किपलिंग ने ब्रिटिश उपनिवेशवाद को अश्वेत राष्ट्रों के लिए “दैवी वरदान” करार दिया था। जलियांवाला बाग के नरसंहार के नृशंस कर्ता कर्नल रेजिनाल्ड डायर को रुडयार्ड ने बताया कि “इस ब्रिटिश कमांडर ने पंजाब प्रदेश को अराजकतावादियों से बचा लिया।” हत्यारे डायर की सहायता हेतु जमा की गई राशि में उन्होंने अपने वेतन का हिस्सा भी दान किया था। कर्नाटक के साहित्यकार आरके नारायण (“गाइड” फिल्म के लेखक और कार्टूनिस्ट आर. के. लक्ष्मण के अग्रज) ने लिखा, “रुडयार्ड मे पशुओं की सोच तथा मानसिकता थी क्योंकि वे जंगल में जानवरों की कहानियां खूब लिखते रहे।” कांग्रेसी सांसद और रचनाकार शशि थरूर ने बताया, “रुडयार्ड का पित्ताशय अंग्रेजों के गैस से भरा रहता था।” अब युवा कवि दुष्यंत कुमार के बारे में। वे आज ही के दिन दुनिया छोड़ गए थे। उनकी पंक्तियां हम लोग गुनगुनाते हैं, “मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही, हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए। कैसे आकाश में सूराख नहीं हो सकता? एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारों।” अतः रुडयार्ड को सिर्फ भर्त्सना। दुष्यंत को केवल श्रद्धा सुमन !

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं आइएफडब्लूजे के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं।)

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