Tuesday, January 13, 2026
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आपातकाल की वो काली यादें!

के. विक्रम राव

आज इंदिरा गांधी द्वारा भारत पर थोपी गई फासिस्ट (आपातकाल) इमर्जेंसी की स्वर्ण जयंती है। स्वर्णिम कदापि नहीं। कालिख-भरी। तारकोल से भी ज्यादा काली। वह सुबह (बृहस्पतिवार, 26 जून 1975, आषाढ़ मास) थी। तैमूर लंगड़े से उज़बेकी डाकू बाबर तक कईयों ने दिल्ली को गुलाम बनाया था। तबाह किया था। रातों-रात इंदिरा गांधी ने भी कीर्तिमान रचा था। वह आज़ाद गणतंत्र की एकछत्र मालकिन बन गईं। वह भयावह भोर काली और यादगार है।

उस सुबह बड़ौदा में मैं दांडिया बाज़ार आया। यूएनआई ऑफिस। आकाशवाणी से आपातकाल लगने की घोषणा सुन ली थी। यूएनआई ऑफिस में पूरी रपट पढ़ी। मीडिया और प्रेस को क्लीव (कमज़ोर) बनाने की साजिश। इंदिरा सरकार ने तय कर लिया था कि सेंसर ही हमारी खबर की रपट की जांच करेगा, तब वह छपेगी।

मुझे एक चतुराई सूझी। मैंने वहीं यूएनआई ऑफिस में बैठे-बैठे (26 जून 1975) IFWJ के उपाध्यक्ष के नाते एक बयान जारी किया। प्रधानमंत्री के तानाशाह बनने की भर्त्सना की, सेंसरशिप के खात्मे की मांग की। कैदी प्रतिपक्ष नेताओं को रिहा करने की अपील की थी। बयान तो देश भर में जारी हो गया। शायद सेंसर तब तक सो रहा था। कई प्रादेशिक दैनिकों में बयान छपा भी। मगर वह पहला और अंतिम रहा। फिर तो ताले लग गए थे। खुद सत्तर साल के बुज़ुर्ग मियां फखरुद्दीन अली अहमद भी उस आधी रात को राष्ट्रपति भवन में सक्रिय रहे होंगे।

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हालांकि मेरे बड़ौदा में रहते सितंबर 1975 में ऐतिहासिक घटना हुई। उस एक शाम हमारे प्रतापनगर रेलवे कॉलोनी के ऑफिसर्स क्लब में भजन गायक हरिओम शरण का कार्यक्रम था। तभी सुधा ने सूचना भेजी कि एक विशिष्ट अतिथि अकस्मात घर (78-B, प्रतापनगर रेलवे कॉलोनी) आए हैं। मुझे घर आना पड़ेगा। सिख के वेश में जॉर्ज फर्नांडिस थे। इमर्जेंसी थोपे जाने के बाद जॉर्ज के आगमन की प्रतीक्षा मैं नित्य कर रहा था। अब प्रश्न था कि जॉर्ज को टिकाया कहां जाए? क्योंकि हमारी रेलवे कॉलोनी का हर व्यक्ति अपने इस क्रांतिकारी नेता को पहचानता था।

अतः इंडियन एक्सप्रेस के साथी और यूनियन ऑफ बड़ौदा जर्नलिस्ट के अध्यक्ष साथी किरीट भट्ट की मदद से अलकापुरी में उद्योगपति भरत पटेल के गेस्ट हाउस ले गए। दूसरे दिन पता चला कि जॉर्ज ने स्वयं भरत पटेल से डायनामाइट के बारे में पूरी जानकारी पा ली है। आगे का सब पुलिस रिकॉर्ड में है क्योंकि यह उद्योगपति सरकारी गवाह बन गया था।

इस बीच होली के त्योहार पर लखनऊ गया। यह अवकाश पहले से ही अनुमोदित था। लखनऊ में कुछ दिन बाद ही नेशनल हेरल्ड के स्थानीय संपादक सी.एन. चितरंजन ने मुझे बताया कि लखनऊ पुलिस अधीक्षक एच.डी. पिल्लई मेरी खोज कर रहे हैं। गुजरात पुलिस का संदेश आया था। यह पिल्लई साहब IPS अधिकारी थे जो इंदिरा गांधी के सुरक्षा अधिकारी रहे। मैंने संपादक चितरंजन को बताया कि मैं अहमदाबाद पहुंचकर स्वयं को पुलिस को सौंप दूंगा क्योंकि परिवार के कारण मैं भूमिगत नहीं रह सकता। सुधा रेल अधिकारी हैं। पुलिस ने मोहलत दे दी।

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मैंने अहमदाबाद में पुलिस महानिरीक्षक पी.एम. पंत के समक्ष पेश किया। ये पंत साहब पत्रकार राजदीप सरदेसाई के नाना हैं। फिर तीस दिन की पुलिस रिमांड के बाद मुझे बड़ौदा सेंट्रल जेल में रखा गया। वहां छह अन्य साथियों के साथ। मुझे भी कालकोठरी के तन्हा सेल में रखा गया। डबल ताले में।

शुरू में बड़ौदा केंद्रीय कारागार में डायनामाइट षड्यंत्र के हम केवल सात अभियुक्तों को अलग-अलग तन्हा कोठरी में कैद रखा गया। लोहे के दो छोटे फाटकनुमा दरवाज़े डबल ताले में बंद होते थे। सुबह केवल एक घंटे के लिए खोलते थे, शौच-स्नान के लिए। कोठरी भी पिंजड़ानुमा, दस बाई दस फीट की थी। किसी से कोई संपर्क नहीं। अतः मौन व्रत जबरन रखना पड़ता था।

जेल में सबसे ज़्यादा पीड़ादायक समाचारपत्रों का न मिलना था। पर यह दुख एक स्वयंसेवक ने दूर कर दिया। वह जेलर मोहम्मद मलिक को एक समाचारपत्र बंडल मेरे लिए रोज़ दे जाता था। फिर दयादृष्टि अपनाकर जेलर उसे मेरी कोठरी में भिजवा देते थे। उस पुण्यात्मा युवा का नाम बाद में पता चला। वह था नरेंद्र दामोदरदास मोदी, आज देश के प्रधानमंत्री।

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यह वाकया मुख्यमंत्री मोदीजी ने स्वयं पत्रकार श्रोताओं को बताया था। गांधीनगर में सांसद नरहरि अमीन के स्कूल सभागार में 2 जनवरी 2003 के दिन गुजरात जर्नलिस्ट यूनियन द्वारा आयोजित हमारे इंडियन फेडरेशन ऑफ वर्किंग जर्नलिस्ट (IFWJ) के अधिवेशन में। मेरी जेल यातनाओं का उल्लेख भी किया। मोदीजी तपाक से मिले थे। मैं अध्यक्षता कर रहा था। मेरे बारे में मोदीजी ने कहा : जब बड़ौदा सेंट्रल जेल में विक्रम राव तन्हा कोठरी में नज़रबंद था, तो उन्होंने जेलर से अख़बार देने की विनती की थी। पत्रकार को समाचारपत्र न मिले जैसे जल बिन मछली! फिर चंद दिनों बाद मुझे अख़बार मिलने लगे।

नरेंद्र भाई मोदी मेरे संकटत्रस्त तथा दुखद काल के सुहृद रहे। इसीलिए ज़्यादा भले लगते हैं। वर्ना इस वक्त तो प्रधानमंत्री के करोड़ों मित्र और समर्थक होंगे। यह बात मई 1976 की है। मोदीजी तब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कर्मठ कार्यकर्ता थे, तरुणाई में थे, आयु 26 वर्ष रही होगी।

हमारी कैद के दौरान तानाशाही राज ने सारे कानून तोड़ डाले थे। उस निर्दयी आपातकालीन दौर में न्याय-तंत्र पंगु हो गया था। इस त्रासद स्थिति का निजी अनुभव मुझे हुआ था जब मुझे बड़ौदा जेल से कर्नाटक पुलिस बेंगलुरु ले गई थी। मल्लेश्वरम थाने में हिरासत में रखा। न्यायाधीश के समक्ष पेश किया। मैंने कोर्ट में शिकायत की कि मुझे रात भर तेज़ रोशनी फेंक कर जगाए रखा गया, घुटने को मोड़ कर खड़ा रखा गया, पंखे से बांधने की धमकी दी।

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इसे पुलिसिया लहजे में ‘हेलीकॉप्टर बनाना’ कहते हैं। मगर न्यायाधीश पुंसत्वहीन हो गए थे। मेरी याचना और इस जिरह के दौरान मुझे अपार जिल्लत भुगतनी पड़ी। गूंगे बने रहे थे जज साहब। मगर बाहर आकर पता चला कि (COD) कॉर्प्स ऑफ डिटेक्टिव्स की क्रूरता हिटलर की गेस्टापो जैसी मानी जाती है।

पुलिसिया कठोरता ने मेरे दर्द को बढ़ाया, शारीरिक तथा मानसिक भी। बहुधा हम भूमिगत कार्यकर्ताओं को मलाल रहता था कि एक लाख के करीब लोग जेल चले गए। यदि वे भूमिगत रहते तो हमारा संघर्ष तीव्र होता। रिहा होने के बाद जनता पार्टी के नवनियुक्त अध्यक्ष चंद्रशेखर से मैंने पूछा भी था कि जेल के बाहर रहकर वे संघर्ष चलाते? मगर उनका बेबसी भरा उत्तर था कि जब सभी नेता कैद हो गए तो आंदोलन कैसे चलाया जाता और फिर देश में विरोध मुखर था ही नहीं।

कई पत्रकार साथी मुझसे पूछते थे, कि डायनामाइट के अतिरिक्त कोई अन्य रास्ता नहीं था? बहस को छोटा करने की मंशा से मैं यही जवाब देता कि सेंट्रल असेम्बली में बम फेंक कर भगत सिंह ने बहरे राष्ट्र को सुनाना चाहा था। डायनामाइट की गूंज से गूंगे राष्ट्र को हम लोग वाणी देना चाहते थे। हम राजनेता तो थे नहीं कि सत्याग्रह करते और जेल में बैठ जाते। श्रमजीवी पत्रकार थे अतः कुछ तो कारगर कदम लेकर विरोध करना ही था।

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लेकिन मधुरतम घटना थी जब तिहाड़ जेल के सत्रह नंबर वार्ड में उस रात के अंतिम पहर में मेरे पॉकेट ट्रांजिस्टर पर वॉइस ऑफ अमेरिका के समाचार वाचक की उद्घोषणा सुनी कि रायबरेली चुनाव क्षेत्र में कांग्रेसी उम्मीदवार के पोलिंग एजेंट (यशपाल कपूर) ने निर्वाचन अधिकारी से मांग की कि मतगणना फिर से की जाए।

मैं तुरंत उछल पड़ा। जॉर्ज फर्नांडिस को जगाया और बताया कि इंदिरा गांधी पराजित हो गईं। पूरे जेल में बात फैल गई। तारीख 17 मार्च 1977 थी। लगा दीपावली आठ माह पूर्व आ गई। पूरे जेल में लाइट जल उठीं। विजय रागिनी बज उठी। आखिर मतदाताओं ने तानाशाह को धराशायी कर ही दिया।

(यह लेख स्मृतिशेष वरिष्ठ पत्रकार रहे के. विक्रमराव जी की आत्मकथा ‘तूफ़ान तो आए कई, झुका न सके!’ में प्रकाशित है।)

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