Tuesday, January 13, 2026
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जगदीप धनखड़ का इस्तीफाः हाईकमान के दबाव में देर रात लिया फैसला!

सोशल मीडिया पर जगदीप धनखड़ के इस्तीफे के कारणों पर चहुंओर हो रही है चर्चा

फेसबुक पर सुदामा पाठक ने विस्तार से बताया कि क्यों इस्तीफा देने को मजबूर हुए जगदीप धनखड़

नेशनल डेस्क

नई दिल्ली। जगदीप धनखड़ के उपराष्ट्रपति पद से इस्तीफे के बाद इसके कारणों पर सोशल मीडिया पर जबरदस्त चर्चा हो रही है। लोग अपने-अपने हिसाब से कयास लगा रहे हैं कि उन्होंने स्वेच्छा से इस्तीफा दिया अथवा इस्तीफा मांगा गया। अनेक लोगों का मानना है कि स्वास्थ्य कारणों से त्यागपत्र देने की बात तो एक बहाना था, असली कारण कुछ और है। सुदामा पाठक के नाम से फेसबुक पर बने एक एकाउंट पर इस्तीफे के कारणों पर विस्तृत विवेचना की गई है। इसमें साफ कहा गया है कि हाईकमान की तरफ से उनसे तत्काल त्यागपत्र देने को कहा गया था।

सुदामा पाठक अपनी समीक्षा में लिखते हैं कि जगदीप धनखड़ ने राजनीतिक दुश्मनों के साथ मिलकर साजिश रची। मगर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें रंगे हाथ पकड़ लिया। आइए, समझते हैं कि क्या थी पूरी साजिश, कैसे रची गई और पर्दाफाश कैसे हुआ?

राज्यसभा का सभापति अगर सरकार को समर्थन कर सकता है तो सरकार को दुविधा में भी डाल सकता है। जगदीप धनखड़ ऐसा ही करने जा रहे थे। 2024 के लोकसभा चुनावों में जगदीप धनखड़ का सियासी कद सामने आ चुका था। वह बौने साबित हुए थे। जगदीप धनखड़ जाटों के नेता बनने और दिखाने की कोशिश भले ही करते रहें हों, लेकिन न तो वे राजस्थान में भाजपा की मदद कर सके और न ही हरियाणा में। और न ही पश्चिमी उत्तर प्रदेश में। वे एक तरह से भाजपा के लिए भार ही बन चुके थे। फिर सत्ताधारी दल उन्हें ढो रहे थे।

जगदीप धनखड संवैधानिक पद पर रहते हुए जिस तरह से न्यायपालिका के खिलाफ बोल रहे थे, वह भाजपा की लाइन नहीं थी। भाजपा/सरकार उनके बयानों से अक्सर अपमानित और शर्मसार हुई। उप राष्ट्रपति बनने के साथ ही जगदीप धनखड़, जाटों के सबसे बड़े नेता की तरह व्यवहार करने लगे थे। एक बार शिवराज सिंह को भरे मंच पर उन्होंने अपमानित कर दिया था।

जगदीप धनखड़ ने पिछले दिनों अपना जनसंपर्क काफी बढ़ा दिया था। वे संभवतः यह मानने लगे थे कि संविधान के दूसरे सबसे बड़े पद पर पहुंच कर वे सत्ता से भी बड़े हो गए हैं। वे बीजेपी ही नहीं, किसी भी पार्टी से बड़े हो चुके हैं। इसलिए अपने घर आने वाले मेहमानों से और जहां वे जाते थे, वहां के मेजबानों से सरकार के विरुद्ध बातें करते थे। विशेष तौर पर किसानों को लेकर।

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कांग्रेस ने जगदीप धनखड़ के बूढे मन और अशक्त तन में उभर रही राजनीतिक महत्वाकांक्षा को देख लिया था। कभी जगदीप धनखड़ के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने वाली कांग्रेस ने अब जगदीप धनखड़ के कंधों पर हाथ रख दिया था। जगदीप धनखड़ अब भाजपा से अलग अपनी सियासी राह बनाने में लगे थे। वे उस जगह से काफी आगे बढ़ चुके थे, जहां वे एनडीए सरकार के लिए एक धर्म संकट नहीं संकट की वैतरणी बनने वाले थे। संसद का मानसून सत्र शुरू होने से पहले सियासी चौसर की बिसात बिछ चुकी थी। गोटी भी हाथ में थी, बस चाल चली जानी बाकी थी। तभी सत्ता के आलाकमान ने जगदीप धनखड़ को टाटा, बाय-बाय कह दिया।

जगदीप धनखड़, जस्टिस शेखर यादव के खिलाफ महाभियोग प्रक्रिया शुरू करना चाहते थे। इसके लिए वे जनसंपर्क के माध्यम से पर्याप्त समर्थन जुटा चुके थे। जगदीप धनखड़, विपक्ष खासतौर पर कांग्रेस को यह भरोसा दे चुके थे कि जैसे ही जस्टिस यशवंत वर्मा खिलाफ महाभियोग प्रक्रिया शुरु की जाएगी, वैसे ही शेखर यादव के खिलाफ भी प्रक्रिया शुरु करने की अनुमति दे देंगे। यह सब छद्म रूप से हो रहा था। विपक्ष जगदीप धनखड़ को मोहरा बनाकर सरकार के खिलाफ नैरेटिव खड़ा करना चाहता था और यह साबित करना चाहता था कि सनातन जैसे किसी भी मुद्दे को पनपने नहीं दिया जाएगा।

विपक्ष अपने मंसूबों में सफल भी हो चुका था। लेकिन जगदीप धनखड़ से एक गलती हो गई। उन्होंने नियम 267 के तहत प्रश्नकाल को स्थगित कर मल्लिकार्जुन खड़गे को संवैधानिक विषय उठाने की अनुमति दे दी। मौके का फायदा उठाते हुए मल्लिकार्जुन सरकार को घेरने के लिए ऑपरेशन सिंदूर और पहलगाम के बिंदुओं पर चर्चा करने लगे। मानसून सत्र से पहले जगदीप धनखड़ ने विपक्ष के साथ इतना ममत्व कभी नहीं दिखाया था। मलिकार्जुन को बोलता देख…सत्ता पक्ष समझ गया कि क्या खेल हो रहा है। नेता सदन ने हस्तक्षेप किया। यहीं से सारा खेल 360 डिग्री घूम गया।

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सभापति के कक्ष में सत्ता पक्ष से ज्यादा विपक्ष के सासंदों की बैठकें होने लगीं। इसी बीच सत्ता पक्ष को पता चला कि सभापति जगदीप धनखड़ ने जस्टिस शेखर यादव के खिलाफ भी महाभियोग प्रक्रिया के लिए विपक्षी सांसदों के प्रस्ताव स्वीकार कर लिए हैं। सभापति ने विपक्ष को यह भी बता दिया कि 54 में से 51 प्रस्ताव स्वीकार कर लिए गए हैं। जगदीप धनखड़ को परंपरानुसार जस्टिस शेखर यादव के खिलाफ आए विपक्षी प्रस्तावों की जानकारी नेता सदन और संसदीय कार्यमंत्री को देनी चाहिए थी, जिनके माध्यम से यह बात सरकार और भाजपा हाईकमान तक पहुंचती और फिर सरकार जैसा चाहती, वैसा कदम उठाती, मगर जगदीप धनखड़ ने नेता सदन और संसदीय कार्य मंत्री दोनों को अंधेरे में रखा।

आनन-फानन में सत्ता पक्ष ने भी अपने सांसदों के प्रस्ताव जगदीप धनखड़ के पास भिजवाए। इसके बाद सभापति जगदीप धनखड़ ने नेता सदन से परामर्श किए बिना ही शाम चार बजे बिजनेस एडवायजरी कमेटी की मीटिंग बुला ली। सरकार, सभापति जगदीप धनखड़ और विपक्ष की चाल समझ चुकी थी। इसीलिए नेता सदन और संसदीय कार्य मंत्री दोनों इस बैठक में नहीं पहुंचे। सभापति जगदीप धनखड़ ने यह मीटिंग 23 तारीख के लिए टाल दी। 23 तारीख की बिजनेस एडवायजरी कमेटी में क्या होने जा रहा है, सभापति और विपक्ष की क्या मंशा है अब तक सरकार के सामने साफ हो चुकी थी।

इससे पहले एक घटना और हुई। वह यह कि जगदीप धनखड़ के कार्यालय से प्रेसनोट जारी हुआ जिसमें कहा कि उपराष्ट्रपति 23 तारीख को जयपुर के रामबाग पैलेस में कन्फेडरेशन ऑफ रियल एस्टेट डेवलपर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया के कार्यक्रम में शामिल होंगे। इस कार्यक्रम के बहाने जगदीप धनखड ऐसा ऐलान करने वाले थे, जिससे सरकार के सामने संवैधानिक संकट और धर्म संकट दोनों पैदा हो सकते थे। ध्यान रहे, 23 तारीख को प्रधानमंत्री मोदी इंग्लैण्ड प्रवास का कार्यक्रम बहुत पहले से लगा हुआ था। संसद सत्र के दौरान पीएम के विदेश में रहने के दौरान दोनों सदनों के सभापतियों का दिल्ली में रहना अति आवश्यक होता है। उपसभापति कार्यालय ने जानबूझ कर इस तथ्य की अवहेलना की।

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अपनी विचारधारा से बाहर के व्यक्तियों को सत्ता के केंद्र में लाने का दुष्परिणाम क्या होता है पहले यह सतपाल मलिक साबित कर चुके थे, जगदीप धनखड़ ने उस पर मुहर लगा दी। हालांकि जगदीप धनखड़ पहले नेता नहीं हैं जिन्होंने भाजपा की पीठ में खंजर भोंकने की कोशिश की। सतपाल मलिक, यशवंत सिन्हा और अरुण शौरी जैसे कई नाम हैं। उपसभापति जगदीप धनखड़ विपक्ष के हाथों की कठपुतली बन कर उसी सरकार के खिलाफ सियासी साजिश रच रहे थे, जिसने उन्हें उपराष्ट्रपति जैसी हैसियत बख्शी थी। एनडीए ने जिसे बड़ा पद दिया, वही पीठ में खंजर घोंप रहा था।

22 तारीख की शाम चार बजे से रात नौ बजे तक रायसीना हिल की शाम बहुत गहमागहमी भरी रही। सभापति जगदीप धनखड़ को विवश किया गया कि वे तत्काल इस्तीफा दें। मतलब यह कि जगदीप धनखड़ से इस्तीफा आनन-फानन में इसलिए लिखवाया गया, ताकि पीएम मोदी निश्चिंत होकर ब्रिटेन के दौरे पर जा सकें। सभापति जगदीप धनखड़ के इस्तीफे में अनुच्छेद 67ए का जिक्र है। इसका अभिप्रायः ‘तत्समय से प्रभावी’ है। जगदीप धनखड़ ने सरकार को नीचा दिखाने का आखिरी मौका भी नहीं छोड़ा। इस्तीफा सौंप कर राष्ट्रपति भवन से बाहर आने से पहले ही जगदीप धनखड़ के इस्तीफे की कॉपी सोशल मीडिया पर तैर रही थी। मतलब, यह कि अधिकारिक घोषणा से पहले ही जगदीप धनखड़ का इस्तीफा आम हो चुका था।

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