शीतांशु द्विवेदी
ऐसा नहीं था कि महिषासुर के विरुद्ध संघर्ष में गणों (आम जन) की भूमिका सिर्फ नगाड़ा, शंख और मृदंग बजाने की थी। लड़ाई उन्हीं के लिए ही नहीं लड़ी जा रही थी, बल्कि उनके द्वारा भी लड़ी जा रही थी। यह एक जनवादी युद्ध था। देवी को क्रोध भी तभी आता है, जब महिषासुर गणों को कष्ट देने लगता है: ‘इस प्रकार अपनी सेना का संहार होता देख महिषासुर ने महिष का रूप धारण करके देवी के गणों को त्रास देना आरम्भ किया। किन्हीं को थूथुन से मारकर, किन्हीं के ऊपर खुरों का प्रहार करके, किन्हीं-किन्हीं को पूँछ से चोट पहुँचाकर, कुछ को सींगों से विदीर्ण करके, कुछ गणों को वेग से, किन्हीं को सिंहनाद से, कुछ को चक्कर देकर और कितनों को निः:श्वास-वायु के झोंके से धराशायी कर दिया। इस प्रकार गणों की सेना को गिराकर वह असुर महादेवी के सिंह को मारने के लिये झपटा । इससे जगदम्बा को बड़ा क्रोध हुआ।’
गणों को यूँ त्रास देकर महिषासुर को बड़ा आनन्द भी आता है और वह गर्जना भी करने लगता है। तभी देवी निर्णायक स्वर में उसके अंत की वैसी ही घोषणा करती हैं, जैसे भगवान राम ने राक्षसों द्वारा निरपराधों की हड्डियों का पहाड़ बना देने को देखकर की थी- भुज उठाय प्रन कीन्ह। अब देवी बोलती हैं- गर्ज गर्ज क्षणं मूढ़ मधु यावत्पिवाम्यहम्। मया त्वयि हतेऽत्रैव गर्जिष्यन्त्याशु देवताः अर्थात् हे मूर्ख असुर! जब तक मैं यह मधु पी रही हूं, तुम क्षणभर के लिए खूब गर्जना करो। मेरे द्वारा यहीं तुम्हारा वध करने पर देवतागण भी शीघ्र ही गर्जना करेंगे। यानी गणों को त्रस्त करने के बाद देवी क्षण भर बाद ही महिषासुर का अंत कर देती है। महिषासुर वध के बाद देवता गर्जना करेंगे-यह कहना स्थापित करना है कि देवताओं और जनहित में कोई फर्क नहीं है। यदि गणत्रासक खत्म होता है तो वह देवताओं के भी उतने ही उत्साह का विषय है।
इसलिए जो लोग भारत के देवी देवताओं को जनता से पृथक् करने में लगे हैं, वे इन महत्त्वपूर्ण संकेतों की या तो उपेक्षा करते हैं या अपलाप करते हैं। जब-जब आम जन को त्रास देने वाली ताकतें पृथ्वी के प्राणियों को त्रस्त करती हैं, देवता न केवल विष्णु या देवी से प्रार्थना करते हैं, बल्कि जैसी कि रामावतार और कृष्णावतार की कथाएं बताती हैं या दुर्गा सप्तशती के तृतीय चरित्र की कथा बताती है कि वे स्वयं भी धरती पर कभी वानर या कभी गोपों का रूप धारण करने के लिए उतरते हैं या अपनी शक्तियों का सम्मिलन देवी में करते हैं अथवा जैसा कि अंतिम चरित्र में बताया है कि स्वयं उनकी शक्तियाँ उनका रूप धारण कर इस संघर्ष में योग करती हैं। वे सिर्फ फूल नहीं बरसाते। महिषासुर प्रसंग में साफ-साफ कहा गया है कि देवता मनुष्यों की भाँति पृथ्वी पर विचरते हैं।
गणों के द्वारा युद्ध करने पर देवता प्रसन्न होते हैं, यह दुर्गा सप्तशती के उस मध्यम चरित्र, जिसमें देवी महिषासुर से युद्ध करती हैं, में स्पष्ट बताया भी गया है :
देव्या गणैश्च तैस्तत्र कृतं युद्धं महासुरैः।
यथैषां तुतुषुर्देवाः पुष्पवृष्टिमुचो दिवि॥
कि वहाँ देवी के गणों ने भी उन महाअसुरों के साथ ऐसा युद्ध किया जिससे आकाश में खड़े हुए देवता भी बहुत प्रसन्न हुए और उन पर फूल बरसाने लगे।
उन दोनों के- देवताओं के और आम जनता के हितों में कोई विरोध नहीं है। ऋग्वेद में गणतांत्रिक चेतना की जो प्रसिद्ध ऋचा है उसमें भी देव स्मरण है:
संगच्छध्वं सं वदध्वं सं वो मनांसि जानताम्।
देवा भागं यथा पूर्वे संजानाना उपासति॥
यानी एक साथ मिलकर चलो, एक साथ बोलो, और तुम्हारे मन एक साथ विचार करें। जैसे देवता पहले एकत्र होकर अपने हिस्से की भूमिका को स्वीकार करते थे, वैसे ही तुम भी एकजुट होकर कार्य करो।
इसीलिये इतनी शताब्दियों में विधर्मियों के तमाम दुष्प्रचार के बावजूद भारत की आम जनता में हिन्दू सनातनी देवी देवताओं के प्रति श्रद्धा बनी हुई है। यह ध्यान दें कि गण किसी समूह का नाम नहीं है। वह आम जन हैं। और महिषासुर के साथ उसकी सेना है। चिक्षुर, चामर, उदग्र, महाहनु, असिलोमा, वाष्कल, विडाल, उद्धत, ताम्र, अन्धक, उग्रास्य, उग्रवीर्य और उनकी सेनाएँ हैं, पर गण शब्द का प्रयोग कहीं नहीं है। दैत्यगण कहा जा सकता था, सैन्यगण कहा जा सकता था, पर नहीं कहा गया। जैसे विवरण मिलते हैं, उनसे ऐसा लगता है कि महिषासुर का राज्य एक युद्धक राज्य था। बड़ी-बड़ी सेनाएँ थीं और उन्हीं के बल पर वह सब पर हुकूमत करता था। गणशक्ति दयनीय दशा में थी और देवी ने उसमें साँसें फूँकीं, उसे स्पन्दित और स्फूर्त किया।’ नि:श्वासान् मुमुचे यांश्च युध्यमाना रणेऽम्बिका।’
जगह जगह महिषासुर के विरुद्ध स्थानीय जनांदोलन होने लगे। इसलिए वह शतसहस्र गणों की बात आई है। ‘त एव सद्य: सम्भूता गणा: शतसहस्रश: ।’
इसलिए रोमिला थापर का यह कहना कि प्राचीन भारत के गणतंत्र कुलीनतांत्रिक थे, यहां उचित नहीं प्रतीत होता क्योंकि यहाँ किसी कुलीन का उल्लेख ही नहीं है। वे शायद वज्ज, लिच्छवी, मल्ल जैसे गणराज्यों के संदर्भ में बात कर रहीं हों और हो सकता है ये शतसहस्र गणतंत्र वे हों जिन्हें अंग्रेज़ी इतिहासकारों ने लिटिल रिपब्लिक कहा है। कर्नल थामस मुनरो ने 1806 में लिखा कि प्रत्येक गाँव अपने आप में एक लघु रिपब्लिक है। “Every village is a little republic with the Potail [Patel] at the head of it, and India a mass of such republics. उत्तर पश्चिमी प्रांतों के गवर्नर मेटकाफ ने भी लिखा कि ये ग्राम समुदाय लघु गणतन्त्र है। The village communities are little republics, having nearly everything that they want within themselves. टॉड ने जो लिखा वह मार्कन्डेय ऋषि वाले शतसहस्र से इतना मिलता है : ‘प्रत्येक राज्य कई सौ या हजारों गणतंत्रों का सूक्ष्म चित्र प्रस्तुत करता है।’ ऐसा लगता है कि महिषासुर का प्रतिरोध ग्राम स्तर तक भी फैल गया था।
सैन्य शक्ति का मुक़ाबला सैन्य क्षमताओं के विकास से ही हो सकता था। इसलिए गण भी अस्त्र शस्त्र सज्जित होने लगे। पुराने गणतंत्रों की इस बुनियादी कमजोरी का लाभ केंद्रीकृत सैन्य साम्राज्य उठाते रहे कि आंतरिक विभाजन, विकेंद्रीकरण और कूटनीतिक कमी के चलते उनकी सैन्य शक्ति कमतर रही। इसलिए देवी के जन-प्रेरण से अब वे भी युद्ध सन्नद्ध हो सके- ‘युयुधुस्ते परशुभिर्भिन्दिपालासिपट्टिशै:।’ तब सोचिये कि कौन असल ‘जन नायक/नायिका’ था और कैसे आज के चतुर सुजान उस जनसंघर्ष की कथा को कैसे सर के बल उलटा किये दे रहे हैं।
क्या इसलिए कि इनकी परम्परा में हीरोइन गॉडेस को जगह नहीं? कि पीपुल्स हीरोइन के बारे में सोच ही नहीं पाते? जन नायिकाओं का उनकी वामी कौमी विचारधारा में कोई स्थान नहीं। जोन ऑफ आर्क का जो हाल इन्होंने किया था, उसे कौन भूल सकता है? तभी तो इनसे रानी लक्ष्मीबाई, कित्तूर चेन्नम्मा, फूलो और झानो मुरमू, अब्बक्का चौटा, रानी रोपुइलियानी, रानी अवंति बाई, लीपा जरावा की चुनौती स्वीकार नहीं हुई।
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