Friday, March 6, 2026
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Hariyali Amavasya पर 25 साल बाद दुर्लभ संयोग

आज किए जाने वाले विशेष पूजन से शांत होंगे पितृदोष और कालसर्प दोष

Hariyali Amavasya का प्रभाव: बन रहे अमृतसिद्धि और गुरु पुष्य जैसे शक्तिशाली योग

धर्म-कर्म डेस्क

सावन माह की अमावस्या तिथि पर मनाया जाने वाला Hariyali Amavasya प्रकृति, श्रद्धा और साधना के पर्व के रूप में मनाया जाता है! इस बार दुर्लभ खगोलीय संयोगों और धार्मिक महत्व के कारण यह दिन बेहद खास बन गया है। 25 वर्षों के बाद इस तिथि पर गुरु पुष्य योग, अमृत सिद्धि योग, सर्वार्थ सिद्धि योग और हर्षण योग का समागम हो रहा है। श्रद्धालु इस दिन शिव, विष्णु, देवी पार्वती के साथ-साथ पितरों की विशेष पूजा-अर्चना कर रहे हैं और कालसर्प दोष जैसे कष्टकारी ग्रह दोषों से मुक्ति के लिए उपाय कर रहे हैं।

Hariyali Amavasya का पर्व न केवल भगवान शिव और श्रीहरि विष्णु की पूजा से जुड़ा है, बल्कि प्रकृति और पितृ पूजा का भी विशेष दिन माना जाता है। श्रद्धालु सुबह ब्रह्ममुहूर्त में उठकर स्नान कर, सूर्य को अर्घ्य देकर पूजा आरंभ करते हैं। इस दिन पवित्र नदी में स्नान करना अत्यंत शुभ माना गया है। नदी स्नान संभव न होने की स्थिति में घर पर ही बाल्टी में गंगाजल डालकर स्नान करने की परंपरा भी मानी जाती है। इस दिन आम, नीम, पीपल, बरगद जैसे पौधों का रोपण कर पर्यावरण की रक्षा का संकल्प भी लिया जाता है।

तीन शुभ योगों ने बढ़ाया महत्व
Hariyali Amavasya इस बार इसलिए विशेष है क्योंकि इस दिन तीन अत्यंत शुभ योग बन रहे हैं। सर्वार्थ सिद्धि योग पूरे दिन रहेगा, जो किसी भी कार्य को सिद्ध करने वाला माना जाता है। इसके अलावा गुरु पुष्य योग शाम 4:43 से प्रारंभ हो रहा है, जिसमें व्यापारिक कार्य, पूजन और दान अत्यंत लाभदायक माने जाते हैं। अमृत सिद्धि योग और हर्षण योग के कारण इस दिन किए गए कार्यों का फल अक्षय और दीर्घकालिक माना गया है।

ज्योतिषाचार्य डॉ. संदीप शुक्ला के अनुसार, यह संयोग 25 वर्षों बाद बन रहा है। पुनर्वसु नक्षत्र भी शाम 4:43 बजे तक रहेगा। हर्षण योग प्रातः 9:51 तक रहेगा, जिससे इस अवधि में विशेष पूजन और व्रत अत्यंत लाभकारी रहेंगे।

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Hariyali Amavasya पर 25 साल बाद दुर्लभ संयोग
Hariyali Amavasya के शुभ योग में शिव-विष्णु पूजन

पूजन के साथ पितृ दोष निवारण की प्रबल मान्यता
Hariyali Amavasya पर पितृ पूजा का विशेष महत्व है। मान्यता है कि इस दिन जलांजलि, तर्पण, और श्राद्ध जैसे कर्म करने से पितृ प्रसन्न होते हैं और पूर्व जन्मों के कष्ट दूर होते हैं। नर्मदा और अन्य पवित्र नदियों के तट पर श्रद्धालु पितृकर्म करने के लिए एकत्र हुए हैं। हथेली में तिल रखकर जल में प्रवाहित करने की परंपरा आज भी निभाई जा रही है। इससे पितृदोष का शमन होता है और परिवार में सुख-शांति आती है।

पुत्र-पुत्र वधुएं भगवान विष्णु और शिवजी की विधिपूर्वक पंचोपचार पूजा कर रहे हैं। विष्णु चालीसा और विष्णु स्तोत्र के पाठ के साथ दान-पुण्य का क्रम चल रहा है। इस दिन विशेषकर पीत वस्त्र, तिल, अनाज और जल से भरे कलश का दान शुभ माना गया है।

शुभ मुहूर्त में पूजा से मिलेगा लाभ
डॉ. शुक्ला के अनुसार, ब्रह्म मुहूर्त सुबह 04:15 से 04:57 तक, विजय मुहूर्त दोपहर 02:44 से 03:39 तक और गोधूलि मुहूर्त शाम 07:17 से 07:38 तक रहेगा। निशिता मुहूर्त रात्रि 12:07 से 12:48 तक रहेगा। इन शुभ मुहूर्तों में पूजन और संकल्प लेने से मनोकामनाओं की पूर्ति मानी जाती है।

Hariyali Amavasya न केवल प्रकृति की पूजा का दिन है, बल्कि अध्यात्म, ज्योतिष और पितृकर्म की त्रिवेणी भी है। ऐसे में यह दिन श्रद्धालुओं के लिए पुण्य अर्जन और मानसिक शांति का अनोखा अवसर लेकर आया है।

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