Tuesday, January 13, 2026
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हथकरघा: हमारी विरासत, हमारा भविष्य

अमेरिका द्वारा भारत पर 50% टैरिफ लगाये जाने के बाद ऐसे तो सभी उद्योगों पर मार पड़ी है लेकिन जो चर्चा के केंद्र में रहा वह है- हथकरघा उद्योग। भारत के हथकरघा उत्पादों का एक बड़ा हिस्सा (कालीन, दरी, शॉल आदि) अमेरिका जाता है। टैरिफ के बाद ये उत्पाद अमेरिकी बाज़ार में अत्यधिक महंगे हो जाएंगे, जिससे ऑर्डर अचानक घट सकते हैं। इससे मुख्यता उत्तर प्रदेश, राजस्थान, कश्मीर जैसे राज्यों के हजारों बुनकरों और कारीगरों की रोजगार व आय दोनों पर सीधी चोट पड़ेगी। भारत के हस्तनिर्मित उत्पादों की जगह अब अमेरिका अन्य देशों जैसे तुर्की, मिस्र, बांग्लादेश और पाकिस्तान से सस्ते माल खरीदेगा। यह तो बात हुई हथकरघा उद्योग के वर्तमान परिदृश्य की, लेकिन भारत के इतिहास में हथकरघा इतना महत्वपूर्ण स्थान क्यों रखता है? राष्ट्रीय हथकरघा दिवस मानने की शुरुआत कब से हुई और सतत विकास लक्ष्यों की पूर्ति के लिए हथकरघा कैसे कदमताल कर रहा है, इसका विश्लेषण कर रही हैं महाराजा सयाजीराव बड़ौदा विश्वविद्यालय की असिस्टेंट प्रोफेसर निकिता शर्मा

हाल ही में बीते 7 अगस्त को देशभर में 11वां राष्ट्रीय हथकरघा दिवस उत्साह और गर्व के साथ मनाया गया। यह दिन हमें न केवल अपने पारंपरिक वस्त्रों और कारीगरी की याद दिलाता है, बल्कि उन लाखों बुनकरों के श्रम और कौशल का सम्मान भी करता है, जो पीढ़ियों से इस विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं।

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ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

राष्ट्रीय हथकरघा दिवस मनाने की शुरुआत वर्ष 2015 में हुई थी। 7 अगस्त का दिन ऐतिहासिक महत्व रखता है क्योंकि 1905 में इसी दिन स्वदेशी आंदोलन की शुरुआत हुई थी। उस समय विदेशी वस्त्रों के बहिष्कार और स्वदेशी कपड़ों के प्रयोग का आह्वान किया गया था। बुनकरों और कारीगरों ने न केवल अपनी कला से देश की आर्थिक नींव को मजबूत किया, बल्कि आज़ादी के आंदोलन में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

हथकरघा केवल वस्त्र उत्पादन का माध्यम नहीं रहा, बल्कि यह सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक स्वावलंबन का प्रतीक रहा है। हमारे पूर्वजों ने इसे न केवल रोजमर्रा की जरूरत के लिए अपनाया, बल्कि एक सांस्कृतिक पहचान के रूप में भी संजोया।

भारतीय हथकरघा की विविधता

भारत में हथकरघा की विविधता अद्वितीय है। बनारसी, पोचमपल्ली, इक्कत, जामदानी, खादी, कांजीवरम, बालूचर, महेश्वरी और कई अन्य वस्त्र अपनी अनूठी बुनाई, रंग और डिजाइन के लिए प्रसिद्ध हैं। हर क्षेत्र का हथकरघा अपने भूगोल, जलवायु और स्थानीय संस्कृति से गहराई से जुड़ा है। एक हथकरघा वस्त्र में केवल धागे ही नहीं, बल्कि उस क्षेत्र की कहानी, लोककथाएँ और जीवनशैली भी बुनी होती है।

आर्थिक और सामाजिक महत्व

हथकरघा उद्योग भारत के ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में करोड़ों लोगों के लिए आजीविका का प्रमुख साधन है। इसमें बड़ी संख्या में महिलाएं भी जुड़ी हैं, जो घर से काम करके अपने परिवार की आय में योगदान देती हैं। यह क्षेत्र न केवल रोजगार पैदा करता है, बल्कि पलायन को भी कम करता है और स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाता है।

हथकरघा उत्पाद पर्यावरण-अनुकूल होते हैं क्योंकि इनका उत्पादन कम ऊर्जा और न्यूनतम रसायनों से होता है। यह स्लो फैशन का एक उत्कृष्ट उदाहरण है, जिसमें टिकाऊ, लंबे समय तक चलने वाले और पुनः उपयोग योग्य वस्त्र बनाए जाते हैं।

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सतत विकास लक्ष्य (SDGs) और हथकरघा

हथकरघा केवल एक उद्योग नहीं, बल्कि संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) को प्राप्त करने का एक महत्वपूर्ण साधन है:

  1. SDG 1 – गरीबी समाप्त करना: ग्रामीण और हाशिये पर रहने वाले समुदायों को स्थिर आय और रोजगार।
  2. SDG 5 – लैंगिक समानता: महिलाओं का आर्थिक सशक्तिकरण और निर्णय लेने की क्षमता में वृद्धि।
  3. SDG 8 – सम्मानजनक कार्य और आर्थिक वृद्धि: स्थानीय स्तर पर रोजगार, कौशल विकास और उद्यमिता में वृद्धि।
  4. SDG 11 – सतत शहर और समुदाय: सांस्कृतिक विरासत और पारंपरिक कारीगरी का संरक्षण।
  5. SDG 12 – जिम्मेदार खपत और उत्पादन: टिकाऊ और पर्यावरण-अनुकूल उत्पादन पद्धतियाँ।
  6. SDG 13 – जलवायु कार्रवाई: कम कार्बन फुटप्रिंट और पर्यावरण पर न्यूनतम नकारात्मक प्रभाव।

चुनौतियाँ और समस्याएँ

हालांकि हथकरघा का महत्व निर्विवाद है, लेकिन यह क्षेत्र कई चुनौतियों से जूझ रहा है:

  • मशीन-निर्मित कपड़ों से प्रतिस्पर्धा।
  • युवा पीढ़ी का इस पेशे से दूरी बनाना।
  • कच्चे माल की बढ़ती कीमतें और बाजार तक पहुँच की कमी।
  • नकली और मशीन से बने “हैंडलूम” उत्पादों की बाढ़, जिससे असली कारीगरों की आय घटती है।

इन समस्याओं के समाधान के लिए संगठित प्रयासों की आवश्यकता है, जिसमें सरकारी योजनाओं का सही क्रियान्वयन, ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म पर असली हैंडलूम उत्पादों की मार्केटिंग और उपभोक्ता जागरूकता बढ़ाना शामिल है।

सरकारी और सामाजिक प्रयास

भारत सरकार और विभिन्न राज्य सरकारें हथकरघा को बढ़ावा देने के लिए अनेक योजनाएँ चला रही हैं; जैसे हथकरघा मार्क स्कीम, Geographical Indication (GI) टैग, मेले और प्रदर्शनियाँ, तथा डिज़ाइन और तकनीक के प्रशिक्षण कार्यक्रम। सामाजिक संगठनों और स्टार्टअप्स ने भी ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के माध्यम से बुनकरों को सीधे उपभोक्ताओं से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

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हमारी भूमिका

उपभोक्ता के रूप में, हम सबकी जिम्मेदारी है कि हम स्थानीय बुनकरों और हथकरघा उत्पादों को बढ़ावा दें। चाहे वह एक साड़ी खरीदना हो, घर के सजावट के लिए हैंडलूम फैब्रिक लेना हो, या उपहार में हस्तनिर्मित वस्त्र देना। हर खरीदारी एक कारीगर के जीवन में बदलाव ला सकती है।

राष्ट्रीय हथकरघा दिवस हमें याद दिलाता है कि हमारी वेशभूषा में केवल फैशन नहीं, बल्कि इतिहास, संस्कृति और आत्मनिर्भरता की पूरी कहानी छुपी है। हथकरघा एक ऐसा धागा है जो अतीत, वर्तमान और भविष्य को जोड़ता है। यह हमारे पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी, हमारी सांस्कृतिक पहचान और हमारे आर्थिक स्वावलंबन का प्रतीक है।

इस धरोहर को केवल एक दिन के लिए नहीं, बल्कि रोजमर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा बनाएं ताकि हमारी परंपरा, हमारी भाषा और हमारा पर्यावरण, आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित रह सके।

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