Tuesday, January 13, 2026
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फर्जी वकीलों का संकट और भारतीय न्याय व्यवस्था

सर्वेश तिवारी एडवोकेट

भारतीय न्याय प्रणाली को लोकतंत्र का आधारस्तंभ माना जाता है, जिसमें वकीलों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। वकील न केवल न्यायालय में पक्षकारों की पैरवी करते हैं, बल्कि वे न्याय तक पहुँच को सुगम बनाने और समाज में विधि का शासन बनाए रखने के लिए आवश्यक कड़ी हैं। किन्तु पिछले कुछ वर्षों में यह समस्या गंभीर रूप से उभरकर सामने आई है कि बड़ी संख्या में ऐसे लोग भी न्यायालयों में वकालत कर रहे हैं जिनकी डिग्रियाँ फर्जी हैं या जिन्होंने आवश्यक पात्रता ही प्राप्त नहीं की है। यह स्थिति न केवल कानून के पेशे की गरिमा को ठेस पहुँचाती है, बल्कि आम जनता के अधिकारों और न्याय प्राप्ति की संभावनाओं को भी प्रतिकूल रूप से प्रभावित करती है।

फर्जी वकीलों का मुद्दा कोई नया नहीं है। बार काउंसिल ऑफ इंडिया (बीसीआई) ने 2015 में यह चौंकाने वाला खुलासा किया था कि देश में लगभग 30 प्रतिशत वकील या तो फर्जी डिग्रियों के सहारे वकालत कर रहे हैं या फिर प्रैक्टिस करने की पात्रता ही नहीं रखते। बाद में विभिन्न राज्यों में की गई जांचों ने इस समस्या की पुष्टि की। दिल्ली बार काउंसिल द्वारा कराए गए सत्यापन में सैकड़ों वकीलों की डिग्रियाँ फर्जी पाई गईं, जिनमें से कई एक ही विश्वविद्यालय से जारी बताई गई थीं। सुप्रीम कोर्ट ने भी समय-समय पर इस समस्या को गंभीर मानते हुए चेतावनी दी है कि यदि फर्जी वकीलों पर नियंत्रण नहीं किया गया, तो न्याय व्यवस्था की साख पर गहरा आघात होगा। जनवरी 2025 में सर्वोच्च न्यायालय ने टिप्पणी की कि देश के लगभग 15 लाख वकीलों में से 20 प्रतिशत फर्जी हो सकते हैं और बीसीआई को कड़े कदम उठाने के निर्देश दिए।

कई ताज़ा मामलों से यह स्थिति और भी स्पष्ट होती है। चेन्नई में 2025 में दो व्यक्तियों को फर्जी दस्तावेजों के आधार पर वकालत करने की कोशिश में गिरफ्तार किया गया। तेलंगाना बार काउंसिल ने 2025 में नौ वकीलों की सदस्यता रद्द की, जिन्होंने या तो जाली प्रमाणपत्र प्रस्तुत किए थे या महत्वपूर्ण सूचनाएँ छिपाई थीं। दिल्ली में भी बड़ी संख्या में ऐसे वकीलों की पहचान की गई, जो या तो अपात्र थे या उनकी डिग्रियाँ संदिग्ध थीं। तमिलनाडु में तो बाकायदा गिरोह पकड़े गए जो फर्जी विधि एवं इंजीनियरिंग की डिग्रियाँ बेचते थे। इन घटनाओं से यह स्पष्ट है कि यह केवल व्यक्तिगत धोखाधड़ी का मामला नहीं, बल्कि एक संगठित अपराध का रूप ले चुका है, जो कानूनी पेशे की नींव को कमजोर कर रहा है।

इन फर्जी वकीलों का असर कई स्तरों पर दिखाई देता है। सबसे पहले, यह आम नागरिकों को सीधे प्रभावित करते है। भोले-भाले मुवक्किल, जो अपने विवादों के समाधान के लिए न्यायालय का दरवाजा खटखटाते हैं, ऐसे तथाकथित वकीलों के झांसे में आकर ठगे जाते हैं। उन्हें गलत सलाह दी जाती है, झूठे वादे किए जाते हैं और कई बार फर्जी आदेश भी बनाकर प्रस्तुत कर दिए जाते हैं। मुंबई में एक वकील द्वारा फर्जी हाईकोर्ट आदेश बनाकर करोड़ों रुपये की ठगी करने का मामला इसका उदाहरण है। दूसरा बड़ा असर न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता पर पड़ता है। जब समाज को यह लगता है कि न्यायालयों में काले कोट पहनकर खड़े लोग ही फर्जी हैं, तो न्याय व्यवस्था की नींव पर संदेह गहराता है। इससे न्याय में विश्वास घटता है और समाज में विधि के शासन की धारणा कमजोर होती है।

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इस समस्या का तीसरा पहलू पेशेवर नैतिकता और मानकों के पतन से जुड़ा है। जब फर्जी लोग वकालत करने लगते हैं तो वे बार-बार अनावश्यक हड़तालें, विवाद और अव्यवस्था फैलाने में भी शामिल पाए जाते हैं। वे न्यायिक प्रक्रियाओं को लंबा खींचकर अपने निजी लाभ के लिए काम करते हैं। यह न केवल न्याय में देरी का कारण बनता है बल्कि न्यायपालिका पर बोझ भी बढ़ाता है। आर्थिक रूप से देखा जाए तो ऐसे लोग झूठे मामलों और लंबी सुनवाई से न केवल खुद लाभान्वित होते हैं बल्कि व्यवस्था को भी भ्रष्ट और अक्षम बना देते हैं।

फर्जी वकीलों की समस्या न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता और आमजन के अधिकारों पर सीधा आघात करती है, अतः इसका समाधान केवल औपचारिकता के स्तर पर नहीं बल्कि कठोर विधिक उपायों के माध्यम से ही संभव है। इस संदर्भ में सर्वोपरि कदम यह होना चाहिए कि सभी राज्य बार काउंसिलें नामांकन के समय ही विश्वविद्यालयों से सीधे अभ्यर्थियों की डिग्री एवं शैक्षिक प्रमाणपत्रों का अनिवार्य सत्यापन करें। इस प्रक्रिया को पूर्णत: पारदर्शी और तकनीकी रूप से सुरक्षित बनाना आवश्यक है ताकि किसी भी प्रकार की हेराफेरी की गुंजाइश न रहे।

जिन व्यक्तियों की डिग्रियाँ या अन्य दस्तावेज़ फर्जी पाए जाएँ, उनके विरुद्ध केवल अधिवक्ता पंजीकरण की सदस्यता समाप्त करना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि उनके खिलाफ तत्काल आपराधिक मुकदमा दर्ज किया जाना चाहिए ताकि समाज में एक सख्त संदेश प्रसारित हो सके और ऐसे अनधिकृत तत्व दोबारा न्यायालयों में प्रवेश न कर सकें। यह भी आवश्यक है कि बार काउंसिल ऑफ इंडिया राज्य बार काउंसिलों को इस विषय में समयबद्ध दिशानिर्देश जारी करे और सत्यापन प्रक्रिया को एक समान स्वरूप में लागू करने के लिए एक केन्द्रीयकृत डिजिटल पोर्टल की स्थापना करे। जब तक फर्जी अधिवक्ताओं पर न केवल पेशेवर निष्कासन बल्कि कठोर दंडात्मक कार्यवाही नहीं होगी, तब तक इस समस्या का स्थायी समाधान संभव नहीं हो पाएगा।

इसके अतिरिक्त, तकनीक का उपयोग इस समस्या के समाधान में कारगर हो सकता है। यदि सभी वकीलों के शैक्षणिक प्रमाणपत्रों और लाइसेंस का डिजिटल रिकॉर्ड एक सार्वजनिक मंच पर उपलब्ध कराया जाए तो धोखाधड़ी की संभावना बहुत कम हो जाएगी। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और डिजिटल वेरिफिकेशन टूल्स का उपयोग करके दस्तावेजों की स्वचालित जाँच की जा सकती है। जन-जागरूकता अभियान चलाकर आम जनता को भी यह बताया जा सकता है कि वे अपने वकील की पंजीकरण स्थिति और योग्यता कैसे सत्यापित कर सकते हैं। इस समस्या का एक पहलू यह भी है कि न्यायालयों और सरकार को मिलकर निचली अदालतों की क्षमता बढ़ानी होगी और न्याय व्यवस्था में सुधार लाना होगा। जब व्यवस्था पारदर्शी, कुशल और सुलभ होगी, तो फर्जीवाड़े की संभावना अपने आप घटेगी।

अंततः कहा जा सकता है कि फर्जी वकीलों की समस्या भारतीय न्याय व्यवस्था की जड़ों को खोखला कर रही है। यह केवल बार काउंसिल या न्यायालय की चिंता का विषय नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए खतरे की घंटी है। यदि समय रहते कठोर कदम नहीं उठाए गए, तो इसका परिणाम न्यायिक अविश्वास और सामाजिक असमानता के रूप में सामने आएगा। किन्तु यदि सर्वोच्च न्यायालय, बीसीआई, राज्य बार काउंसिलों और सरकार के बीच समन्वय स्थापित कर प्रभावी कदम उठाए जाएँ, तो निश्चित ही इस समस्या को नियंत्रित किया जा सकता है। एक सशक्त, पारदर्शी और नैतिक वकालत व्यवस्था ही न्याय की गरिमा को बहाल कर सकती है और जनता के विश्वास को बनाए रख सकती है। यही व्यवस्था अंततः भारत के लोकतांत्रिक ताने-बाने को मज़बूत करेगी।

(ये लेखक के निजी विचार हैं।)

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