शासन के निर्देशों पर ज्यादा तेजी दिखाना आयुक्त पर पड़ा भारी
अतुल अद्वैत
गोंडा। अवधी में एक कहावत है-हवन करते हाथ जल जाना। वर्तमान में यह कहावत मंडलायुक्त दुर्गा शक्ति नागपाल पर सटीक बैठ रही है। उप्र शासन के निर्देश पर सरकारी जमीनों से अवैध अतिक्रमण हटवाने के लिए उनकी अति सक्रियता ने उन्हें विवादों में पहुंचा दिया है। पूरे घटनाक्रम के विवेचन से स्पष्ट परिलक्षित होता है कि आयुक्त और सिविल जज के बीच फोन पर हुई वार्ता ने पहचान के संकट से उपजी गलतफहमी के कारण विवाद का रूप ले लिया।
प्रकरण करीब तीन दशक पुराने जमीन विवाद से जुड़ा है। जिले के सिविल लाइंस क्षेत्र के छावनी सरकार में स्थित भूमि राजस्व अभिलेखों में आयुक्त के नाम दर्ज है। उस पर सरकारी आवास बनाए जाने का प्रस्ताव है। इसी भूमि से संबंधित एक वाद दीवानी न्यायालय में विचाराधीन है। अप्रैल 2026 के अंत में पदभार ग्रहण करने के बाद आयुक्त ने सरकारी जमीनों से अवैध अतिक्रमण हटवाए जाने का निर्देश सभी जिलाधिकारियों को दिया। साथ ही वह स्वयं इसकी नियमित समीक्षा करने लगीं। इसी बीच जनसुनवाई के दौरान उनकी जानकारी में आया कि सिविल लाइंस क्षेत्र में उनके नाम दर्ज नजूल की भूमि पर अवैध कब्जा करके विद्यालय संचालित किया जा रहा है। (हालांकि वर्तमान में वहां कोई विद्यालय संचालित नहीं हो रहा है।) साथ ही इससे संबंधित एक मुकदमा नंबर 721/1997 ज्योति विद्या मंदिर आनंदपुरी छावनी सरकार बनाम नगर पालिका परिषद के नाम से अदालत में लंबित है और उसमें स्थगन आदेश भी है। आयुक्त ने अदालत में प्रभावी पैरवी करके करीब तीन दशक से लंबित वाद को यथाशीघ्र निस्तारित कराने के निर्देश मुकदमे के प्रतिवादी व जिला प्रशासन को दिए।
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अदालत में लंबित सरकारी भूमि से संबंधित वादों की समीक्षा के दौरान उनकी जानकारी में आया कि पीठासीन अधिकारी सिविल जज (सीडि) शबीना खातून अवकाश पर हैं। जुलाई माह में चार, सात और 15 तारीख को सुनवाई की तिथि नियत होने के बावजूद इस मुकदमे में कार्यवाही आगे नहीं बढ़ सकी है। वाद के जल्द निपटारे की इच्छुक आयुक्त ने सिविल जज को महज यह जानने के लिए फोन किया कि यदि उन्हें लंबे समय तक अवकाश पर रहना हो तो पत्रावली किसी अन्य न्यायालय में स्थानांतरित करवाकर जल्दी सुनवाई पूरी कराई जाए। उन्होंने किसी मुकदमा विशेष के बारे में तो जज साहिबा से कोई बात ही नहीं की। वह केवल छुट्टी के बारे में जानना चाह रही थीं, क्योंकि उनका स्टाफ भी स्पष्ट रूप से इस बारे में कुछ बता पाने की स्थिति में नहीं था। जिला जज को लिखे सिविल जज के पत्र में भी इस बात का कहीं कोई उल्लेख नहीं है कि आयुक्त किस मुकदमे के संबंध में उनसे बात करना चाह रही थीं।
लगता है कि पहचान स्पष्ट न होने के कारण बातचीत की शुरुआत ही संदेह के दायरे में हुई। सिविल जज ने अपने पत्र में स्वयं लिखा है कि उन्हें प्रथम दृष्टया यह विश्वास ही नहीं हुआ कि कोई कमिश्नर फोन करके किसी मुकदमे की बात क्यों करेगा? ‘मुझे यह भी पता नहीं था कि यह नंबर वास्तव में कमिश्नर का है या फेक कॉल है।………कई बार फेक कॉल भी आती है और लोग आइडेंटिटी का मिसयूज भी करते हैं।’ स्थानीय अधिवक्ताओं के अनुसार, ऐसा लगता है कि अपने न्यायप्रिय फैसलों के लिए चर्चित सिविल जज और सख्त प्रशासक के रूप में लोकप्रिय आयुक्त के मध्य बातचीत की शुरुआत ही गलतफहमी से हुई। उनके पत्रों से स्पष्ट है कि दो वरिष्ठ अधिकारियों के बीच फोन पर बातचीत के दौरान पहचान का संकट होने के कारण कुछ ऐसी बातें हो गईं, जो उन्हें अपने सम्मान के विपरीत लगीं और लिखा-पढ़ी की नौबत आ गई। स्वाभाविक है कि जब पहचान पर संदेह हो तो हम सामने वाले व्यक्ति को अपेक्षित तवज्जो नहीं देते हैं। इस प्रकरण में बात यहीं से खराब होने लगी और वार्ता समाप्त होते-होते यह स्थिति पैदा हो गई कि दोनों अधिकारियों ने एक-दूसरे के विरुद्ध पत्र लिख डाला। बाद में गोपनीय तरीके से लिखे गए यही पत्र हाईकोर्ट में कार्रवाई के आधार बने।
सूचना विभाग द्वारा प्रकरण पर जारी स्पष्टीकरण
मामला लगभग 1997 से यानी 30 वर्षों से लंबित है और अत्यंत मूल्यवान सरकारी नजूल भूमि से संबंधित है। उपलब्ध अभिलेखों के अनुसार इस भूमि पर वर्ष 2008 से बिना किसी विधिक प्रपत्र के एक साधारण कागज के आधार पर कथित पट्टा दर्शाया जा रहा है, जबकि भूमि सरकारी है और 1985 में पट्टा निरस्त करके सरकार के नाम पर दर्ज है। इस भूमि पर निजी विद्यालय भी संचालित हो रहा है। मंडलायुक्त द्वारा पदभार ग्रहण करने के बाद इस पुराने मामले की जानकारी मिलने पर उनका उद्देश्य केवल सरकारी भूमि के संरक्षण तथा सरकार की ओर से लंबित वाद में प्रभावी पैरवी सुनिश्चित करना था।
इसी क्रम में, जब यह जानकारी नहीं मिल सकी कि संबंधित पीठासीन अधिकारी अवकाश से कब लौटेंगी अथवा अवकाश बढ़ेगा, तो मंडलायुक्त ने उन्हें केवल यह जानने के लिए फोन किया कि वे कब वापस लौट रही हैं। फोन पर न तो वाद के गुण-दोष पर चर्चा हुई, न किसी आदेश अथवा निर्णय के संबंध में कोई बात हुई और न ही वाद संख्या या वाद का नाम लेकर कोई चर्चा की गई। पीठासीन अधिकारी के पत्र में भी यह उल्लेख नहीं है कि मंडलायुक्त ने वाद का नाम या संख्या लेकर कोई बातचीत की थी। पत्र में मंडलायुक्त की ‘27 वर्ष की सेवा’ का उल्लेख भी तथ्यात्मक रूप से सही नहीं है, क्योंकि उनकी सेवा लगभग 16 वर्ष की है। यह भी महत्वपूर्ण है कि मंडलायुक्त से बात करने के लिए संदेश दिए जाने के बाद पीठासीन अधिकारी ने स्वयं उन्हें वापस फोन किया था। मंडलायुक्त न्यायपालिका की स्वतंत्रता और उसकी गरिमा का पूर्ण सम्मान करती हैं। उनका उद्देश्य केवल लगभग 30 वर्षों से लंबित सरकारी भूमि से जुड़े मामले की प्रशासनिक स्थिति जानना और सरकारी हितों की प्रभावी पैरवी सुनिश्चित करना था। पूरे घटनाक्रम को इसी तथ्यात्मक संदर्भ में देखा जाना चाहिए।
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