प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की त्रिनिदाद और टोबैगो यात्रा के दौरान पोर्ट ऑफ स्पेन में उनका स्वागत भोजपुरी चौताल के मधुर स्वरों से हुआ। पारंपरिक कलाकारों ने इस लोकगायन के माध्यम से अपनी सांस्कृतिक जड़ों को प्रस्तुत किया, जिसने प्रधानमंत्री को भावविभोर कर दिया। वीडियो में उनकी तन्मयता और गुनगुनाने की कोशिश इस क्षण की जीवंतता को दर्शाती है। त्रिनिदाद और टोबैगो में, पीएम नरेंद्र मोदी के स्वागत ने एक नये अध्याय की शुरुआत की। यह अध्याय है भारतवंशियों के बीच उनके पारंपरिक लोकगायन को एक अलग उंचाई तक पहुंचाने की कोशिश के रूप में। दूसरी ओर, भारतीयों के बीच भोजपुरी चौताल के पुनर्जीवन की, जो एक समय में पूर्वी उत्तर प्रदेश से बिहार तक खूब लोकप्रिय था। पर, समय के साथ हाशिये पर पहुंच गया।
प्रधानमंत्री का ट्वीट और सांस्कृतिक जुड़ाव
प्रधानमंत्री ने अपने ट्विटर पर लिखा, “बहुत खुशी भइल कि पोर्ट ऑफ स्पेन में हम भोजपुरी चौताल प्रस्तुति के प्रदर्शन देखनी। त्रिनिदाद एंड टोबैगो आ भारत, खास करके पूर्वी यूपी आ बिहार के बीच के जुड़ाव उल्लेखनीय बा।” यह जुड़ाव न केवल ऐतिहासिक है, बल्कि सांस्कृतिक गौरव का प्रतीक भी है। उन्होंने बताया कि त्रिनिदाद में नवरात्रि, शिवरात्रि और जन्माष्टमी जैसे पर्व धूमधाम से मनाए जाते हैं, और भोजपुरी चौताल, भजन व बैठक गाना आज भी लोकप्रिय हैं। उन्होंने कहा, त्रिनिदाद और टोबैगो का भारत, खासकर पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार से ऐतिहासिक और सांस्कृतिक रिश्ता गौरव का विषय है। भारतीय संस्कृति से जुड़े भोजपुरी चौताल, भजन और बैठक गाना आज भी यहां लोकप्रिय हैं।
चौताल की लोकप्रियता और महत्व
चौताल, भोजपुरी लोक परंपरा की एक प्राचीन विधा है, जिसका अर्थ है चार ताल। यह न केवल मनोरंजन का साधन है, बल्कि समकालीन और ऐतिहासिक घटनाओं को व्यक्त करने का प्रामाणिक माध्यम भी है। चौताल की धुन-लय की यही सहजता, मोहकता और खासियत है। आम जन से लेकर खास लोगों तक समान रूप से लोकप्रिय। पीढ़ियों से उस समाज के मानस में रचा-बसी एक ऐसी धुन, ताल और लय, जो सदियों पहले भारत से उनके पुरखे थांति की तरह सात समंदर पार लेकर गए थे। यह विधा 19वीं और 20वीं सदी में गिरमिटिया मजदूरों के साथ सात समंदर पार त्रिनिदाद, मॉरीशस, सूरीनाम और फिजी जैसे देशों तक पहुंची। चौताल आज भी वहां भारतीय डायस्पोरा की सांस्कृतिक पहचान का आधार है।
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सॉफ्ट पावर के रूप में भोजपुरी चौताल
भारत के बढ़ते वैश्विक प्रभाव में सॉफ्ट पावर की भूमिका अहम है। ‘साफ्ट पावर’ के माध्यम से देश एक दूसरे के करीब आते हैं। भोजपुरी चौताल इसका एक शानदार उदाहरण है। यह विधा न केवल भारतीय डायस्पोरा को उनकी जड़ों से जोड़ती है, बल्कि विश्व मंच पर भारत की सांस्कृतिक समृद्धि को भी प्रदर्शित करती है। त्रिनिदाद में चौताल की गूंज ने साबित किया कि संगीत सीमाओं को पार कर दिलों को जोड़ सकता है।
चौताल की संरचना और विशेषताएं
चौताल ग्रामीण गायन-वादन की एक विधा है, जो विशेषकर फाग गायन में प्रयोग होती है। इसमें एक अंतरे को चार बार गाया जाता है, जिसमें पारंपरिक ज्ञान, सामाजिक मूल्य और उत्सव का समावेश होता है। भाव, भजन का होता है। शृंगारिक गीत भी चौताल में गाये जाते हैं। होली में लोग एक साथ इकट्ठा होकर फगुआ गीतों को गाते हैं। यह गायकी सिर्फ मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही जीवन राग, कहानियों, दुख-सुख और सामाजिक संदेशों का वाहक भी है। भोजपुरी चौताल के माध्यम से अपनी खुशी और जनभावना को सामूहिक रूप में व्यक्त करते हैं।
बिहार और उत्तर प्रदेश के गांवों में आज भी भोजपुरी चौताल गायकी सामुदायिक मेलजोल और सांस्कृतिक निरंतरता का प्रतीक है। यह गायकी न केवल स्थानीय लोगों को जोड़ती है, बल्कि उनकी साझा स्मृतियों और परंपराओं को जीवित रखती है। भोजपुरी लोक-संस्कृति के विशेषज्ञ प्रो रामनारायण तिवारी के अनुसार, फाग गायन में 40 लोकराग हैं, जिनमें चहका, लहका, उलारा और चौताल प्रमुख हैं। आज ये लोकराग विलुप्ति के कगार पर हैं।
गिरमिटिया मजदूरों के साथ चौताल का सफर
19वीं और 20वीं सदी में ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के दौरान लाखों भारतीय गिरमिटिया मजदूरों के रूप में विदेश ले जाए गए। उनकी गठरी में सतुआ, पिसान और अचार के साथ-साथ झाल, ढोलक, रामचरित मानस और हनुमान चालीसा भी थे। उनकी संस्कृति, भाषा और संगीत भी इन देशों में पहुंचा। थगन्ना के खेतों में हाड़-तोड़ मेहनत के बाद, जब ये श्रमिक थक जाते थे, तो अपने लोकधुनों, लोकरागों और लोकगीतों को गाते थे। भोजपुरी भाषा और चौताल गायकी इन गिरमिटिया समुदायों की सांस्कृतिक पहचान को जीवित रखने का आधार बनी। मॉरीशस में ‘गीत गवई’ को यूनेस्को ने 2016 में अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की सूची में शामिल किया।
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सांस्कृतिक कूटनीति में चौताल
भोजपुरी चौताल का यह वैश्विक स्वरूप भारत की कूटनीति में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। जब प्रधानमंत्री मोदी मॉरीशस, सूरीनाम या त्रिनिदाद जैसे देशों की यात्रा करते हैं, तो वहां के भारतीय समुदायों के साथ सांस्कृतिक जुड़ाव भारत के राजनयिक संबंधों को और मजबूत करता है। यह सांस्कृतिक कूटनीति भारत को उन देशों के साथ गहरे और भावनात्मक रिश्ते स्थापित करने में मदद करती है, जहां भारतीय डायस्पोरा मौजूद है। भोजपुरी चौताल, इस संदर्भ में, एक सांस्कृतिक दूत के रूप में कार्य कर रहा है, जो भारत की समृद्ध विरासत को विश्व के सामने प्रस्तुत करती है।
त्रिनिदाद में भारतीय संस्कृति की झलक
प्रधानमंत्री के सम्मान में आयोजित राजकीय भोज में फुलौरी, कोहड़ा की तरकारी, दालपुड़ी, समोसा, चटनी, सोहारी पुड़ी जैसे पारंपरिक पकवान परोसे गए। कैरेबियाई देशों खासकर त्रिनिडाड-टौबैगो में आज भी कई ऐसे शब्द मिलते हैं, जो आम बोलचाल से गायब हो रहे हैं। मसलन, वहां बैगन को भंटा, टमाटर को टमाटी, बेल्ट को चमौधा, नमक को नून कहते हैं। यह हमें याद दिलाता है कि हमारी परंपराएं और संस्कृति न केवल हमारी पहचान हैं, बल्कि वे हमें विश्व के साथ जोड़ने का एक शक्तिशाली माध्यम भी हैं।
चौताल के संरक्षण की जरूरत
आधुनिकीकरण और वैश्वीकरण के दौर में चौताल जैसी परंपराओं के प्रति युवा पीढ़ी की रुचि कम हो रही है। भारत में भोजपुरी संगीत को पॉपुलर कल्चर तक सीमित कर दिया गया है, जिससे इसकी सांस्कृतिक जड़ें उपेक्षित हो रही हैं। इसके संरक्षण के लिए सरकारी और गैर-सरकारी प्रयास आवश्यक हैं। भोजपुरी चौताल की यह वैश्विक गूंज, हमें अपनी जड़ों से जुड़े रहने की प्रेरणा देती है। यह सॉफ्ट पॉवर का वह स्वर है, जो बिना शोर के दुनिया के कोने-कोने में भारत की कहानी सुना रहा है।
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