झांसीहि. स.)। भारत आस्था और मान्यताओं का देश है। यहां सतियों की अपनी अलग कथाएं प्रचलित हैं। उनमें से एक हैं सती सावित्री। सती सावित्री के लिए कहा जाता है कि आज ही के दिन उन्होंने मृत्यु के देवता यमराज से अपने पति के प्राणों की रक्षा की थी। उसी प्रथा को मानते हुए आज वट सावित्री पर्व मनाया जाता है। झांसी में सुबह से ही सुहागिनों ने वट वृक्ष की पूजा कर मां सावित्री से अपने सुहाग की रक्षा की प्रार्थना की।
सुबह से ही धर्म स्थलों पर लगे वट वृक्षों की पूजा करने के लिए सुहागिन महिलाओं की भीड़ उमड़ पड़ी। महिलाओं ने अपने पतियों की लंबी आयु की प्रार्थना करते हुए वट वृक्ष को सूत के धागे से बांधते हुए वट वृक्ष की परिक्रमा की। सुहागन स्त्री के शृंगार का सारा सामान चढ़ाया, कथा सुनी। कथा में बताया गया कि किस प्रकार अपने अल्पायु पति के जीवन को यमराज द्वारा दिए वरदान के फेर में उलझाकर वापस कराया। कथा सुनकर और फिर शर्बत पीकर अपने अपने घर के लिए महिलाओं ने प्रस्थान किया। इससे पूर्व सोमवती अमावस्या होने के चलते महिलाओं ने पीपल के वृक्ष की भी परिक्रमा की। ऐसी मान्यता है कि सोमवती अमावस्या को पीपल की परिक्रमा करने से व्यक्ति के समस्त पापों का नाश हो जाता है। यह क्रम सुबह से शुरू होकर पूरे दिन चलता रहा। यह हाल केवल शहर या नगर क्षेत्र का नहीं था बल्कि ग्रामीण अंचल में इस मान्यता को और बेहतर ढंग से माना जाता है।
महेश
