प्रत्येक रविवार को गुरूद्वारा में होगा गुरू का सिमरन
लखनऊ (हि.स.)। अनोखे योद्धा बाबा दीप सिंह जी की जयंती को समर्पित अमृतबेला की शुरूआत रविवार से हुई। इस अवसर पर एलडीए कॉलोनी स्थित गुरूद्वारा मानसरोवर में गुरू के नाम का सिमरन हुआ। बाबा की जयंती 26 जनवरी को है।
इस अवसर पर गुरुद्वारा आशियाना से आए हजूरी रागी भाई गुरमीत सिंह ने गुरू के सिमरन से संगत को निहाल कर दिया। कार्यक्रम की समाप्ति पर मिष्ठान, दूध और नाश्ते का लंगर वितरित किया गया। बाबा दीप सिंह जी सोसाइटी के संस्थापक मनमोहन सिंह हैप्पी ने बताया कि बाबा की जयंती 26 जनवरी को है। अब प्रत्येक रविवार लखनऊ शहर के विभिन्न गुरुद्वारा साहब में अमृतवेला करवाया जाएगा। 12 दिसंबर, रविवार को गुरुद्वारा, आशियाना में अमृतवेला आयोजित की जाएगी। कार्यक्रम में विशेष रूप से दिल्ली से भाई दविंदर सिंह जी दरवेश, सिमरजोत सिंह एवं यशपाल सिंह एबट मौजूद थे।
अनोखे बाबा दीप सिंह जी ने महिलाओं-बच्चों की रक्षा में अपना जीवन कर दिया न्यौछावर
शहीद बाबा दीप सिंह जी का जन्म ग्राम पहुविंड, तहसील पट्टी, जिला अमृतसर में हुआ था। आपके पिता जी का नाम भाई भगता जी एवं माता का नाम जीऊणी जी था। बाबा सिक्ख पंथ के दसवें गुरूगुरू गोविन्द सिंह जी के परम शिष्य थे। उन्होंने गुरूमुखी, फारसी, अरबी भाषा का ज्ञान, घुड़सवारी एवं शस्त्र विद्या में निपुणता गुरू जी से ही सीखी। सिक्ख धर्म के महान योद्धा बाबा दीप सिंह जी की शहादत की मिसाल पूरे विश्व में कहीं नहीं मिलती।
40 हजार दुश्मन के फौजियों से अपने चुनिंदा साथियों के साथ लड़े बाबा
मुराद बेग ने अहमद शाह अब्दाली को पत्र लिखकर भारत पर हमला करने की गुजारिश की। अब्दाली ने एक लाख की फौज के साथ हमला कर दिया। क्रूरता की सारी हदें पार करती फौज ने जब बच्चों और स्त्रियों को भी नहीं बक्शा तो बाबा दीप सिंह से यह देखा न गया। बाबा दीप सिंह ने प्रण लिया कि ‘खालसा सो जो चढे़ तुरंग, खालसा सो जो करे नित जंग’। 1757 में गोलवड़ के टिब्बे पर 40 हजार फौजियों ने हमला कर दिया। बाबा दीप सिंह अपने साथियों बाबा नौध सिंह, भाई दयाल सिंह, बलवंत सिंह, बसन्त सिंह और कई यो़द्धाओं के साथ मुकाबला शुरू कर दिया।
बाबा 18 सेर की दो धारी तलवार लेकर मैदान-ए-जंग में लड़ते रहे
धर्म की रक्षा करने के साथ ही महिलाओं एवं बच्चों की रक्षा करने वाले बाबा दीप सिंह 18 सेर की दो धारी खंडा (दो धार वाली तलवार) लेकर मैदान-ए-जंग में लड़ते रहे। बाबा ने सुधासर (अमृतसर) में शहीद होने का प्रण लिया था। बाबा का सिर जंग में कट जाने के बावजूद एक हाथ में तलवार और दूसरे हाथ में सिर लेकर वह गुरू रामदास के चरणों में पहुंच गये। वहां अब बाबा के नाम से टाहला साहिब गुरूद्वारा है। बाबा के शरीर का जहां संस्कार किया गया, वहां शहीदगंज बाबा दीप सिंह जी के नाम से गुरूद्वारा बनाया गया है।
