विभीषण नाम क्यों नहीं?

शंभूनाथ शुक्ल

राम जी के राज्य में जब यह तय हो गया, कि सीता जी को राज महल से बाहर कर किसी जंगल में भेज दिया जाए, तो सवाल उठा कि यह काम करे कौन? हनुमान जी ने कह दिया-प्रभु मैं आपका भक्त हूँ, चमचा नहीं। मैं तो यह काम नहीं करूँगा। भले आप अपनी राज्य सभा से बर्खास्त कर दें। राजा रामचंद्र जी ने छोटे भाई भरत से यह निवेदन किया, कि भरत तुम मुझे सबसे प्यारे हो। लक्ष्मण तो अविवेकी है। सारे काम बिगाड़ देता है, तुम विवेकवान हो। तुम सीता को ले जाकर जंगल में छोड़ आओ। भरत ने कहा, मैंने आप दोनों की घर वापसी के लिए 14 साल अयोध्या से दूर भरत कूप के जंगल में क्या इसीलिए बिताए थे कि मैं आपको पत्नी वियोग दूँ? मैं नहीं जाऊँगा। अंत में राम ने लक्ष्मण को आज्ञा दी कि सीता को घने जंगल में छोड़ आओ। अब लक्ष्मण उनके भाई भी, भक्त और सेवक भी। उन्हें यह कष्टकारी काम करना पड़ा। पट्ट महादेवी सीता को कानपुर के निकट बिठूर के घने जंगल में बाल्मीकि आश्रम के नज़दीक ले जाकर बोले- माँ! मैं क्या करूँ, आपको छोड़ कर जा रहा हूँ। भैया का यही आदेश है। सीता दुःखी होकर बोलीं-राजा राम न मेरे हुए न तुम्हारे। वे बस राजा हैं। उनसे एक बार पूछना अवश्य कि जब उनके राज दरबार में सुग्रीव और विभीषण जैसे कुलद्रोही हैं, तो तुम्हें यह कार्य क्यों सौंपा?
लक्ष्मण जी सीता जी को छोड़कर अयोध्या लौटे तो फ़ौरन राम जी के पास जाकर पूछा, कि आपने यह हृदय विदारक काम मुझे क्यों सौंपा? सुग्रीव या विभीषण को क्यों नहीं? राम जी बोले-भोले बालक! वे मेरे दरबार में हैं, मित्र हैं किंतु भरोसेमंद नहीं। जो लोग अपने भाई से घात कर सकते हैं, उनके लिए मित्र कौन बड़ी चीज़ है। यह सच है, कि अगर विभीषण न होते तो राम शायद लंका न जीत पाते! वे हर नाज़ुक मौक़े पर रावण पक्ष के हर वीर की कमज़ोरियाँ राम को बताते रहते हैं। रावण का क़िला सुदृढ़ था। उसके पास मृत को भी ज़िंदा कर देने की क़ाबिलियत रखने वाले चिकित्सक थे। अक्षत, पृहस्थ, अमंडक, प्रमंडक जैसे अनेक आज्ञाकारी पुत्र थे। मंदोदरी के पहले पति से प्राप्त संतान मेघनाद (इंद्रजीत) को तो वह इतना प्यार करता था, कि उसे ही युवराज बनाया था। मेघनाद ने राम और लक्ष्मण दोनों को नागपाश में बांध लिया था। तब हनुमान द्वारा गरुड़ को ले आने से वह बच सके। दूसरी बार लक्ष्मण को उसने अपने अमोघ अस्त्र से मार दिया था, किंतु रावण पक्ष के चिकित्सक सुषेण की बताई दवा से वे ज़िंदा हो गए। लेकिन विभीषण की सलाह पर लक्ष्मण ने हवन कर देवी को प्रसन्न कर रहे मेघनाद की पूजा में विघ्न डाला। विभीषण की यह दग़ाबाज़ी देख कर मेघनाद बोलता है, काका विभीषण आज आपने जो काम किया है, उसके कारण लोग आपको संतान-द्रोही भी कहेंगे। विभीषण लपड़घोंघों बने रहते हैं। हालाँकि भाई, भतीजों और पुत्रों से घात करने वाले कई राजा, सम्राट और बादशाह हिंदुस्तान में हुए हैं, किंतु विभीषण जैसे घृणा किसी और को नहीं मिली।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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