Friday, January 16, 2026
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राज्यपाल ने मऊ साड़ी को जीआई टैगिंग पत्र देकर दिलाई नई पहचान

मऊ (हि. स) अस्तित्व की तलाश करती अपनी अनूठी कला और गुणवत्ता के लिए दुनिया भर में मशहूर मऊ की साड़ियों को आखिर अपनी पहचान मिल ही गई। उत्तर प्रदेश की राज्यपाल आनंदीबेन पटेल ने मंगलवार को अपने दौरे के दौरान मऊ के बुनकरों को उनकी पहचान दिलाते हुए मऊ साड़ी को जीआई टैगिंग पत्र प्रदान किया। जीआई टैगिंग के बाद अब मऊ की साड़ियों को अपनी खुद की पहचान मिल गई है ।अब तक मऊ की साड़ियों को आसपास के जिलों में अपना प्रोडक्ट बता कर बेचा जाता रहा है।

दरअसल जीआई टैग यह दर्शाता है कि सामान उसी क्षेत्र का बना हुआ है। जीआई टैग मिलने के बाद बुनकरों में खुशी की लहर है। मीडिया से बात करते हुए उन्होंने बताया कि मऊ की साड़ी के बनने की कला अपने आप में अनूठी है ।इस प्रकार की साड़ियां सिर्फ यही बनती हैं। इसकी नकल बनारस तथा अन्य क्षेत्रों में की जाती है ,लेकिन वह गुणवत्ता नहीं दे पाते ।जी आई टैगिंग से हमें यह लाभ है कि अब मऊ की साड़ी को कोई और नहीं बेच सकता। मऊ की साड़ियों को बनारसी साड़ी बनाकर बेच दिया जाता था लेकिन अब ऐसा नहीं हो सकता अगर ऐसा होता है तो हम बुनकर लोग कोर्ट जा सकते हैं ।अब मऊ की साड़ियों को इंटरनेट और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जीआई द्वारा सर्च किया जा सकता है ।

इस बाबत संबंधित अधिकारी अशोक राय ने बताया कि जिले में लगभग 50000 पावर लूम और 2000 हैंडलूम हैं, जिसमें पावर लूम और हैंडलूम मिलाकर लगभग 40,000 बुनकर हैं ।जिला उद्योग केंद्र के प्रबंधक द्वारा इन्हें किटबॉक्स और प्रशिक्षण दिया जाता है ,जिसके बाद उन्हें गिफ्ट भी दिया जाता है तथा हर संभव सहायता प्रदान की जाती है।

मुगलों के समय से बन रही मऊ की साड़ियों को आजादी के 75 साल के बाद अब जाकर अपनी पहचान मिली है ,जिससे मऊ के बुनकर काफी खुश हैं।

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