हेमंत शर्मा
कुंभ करोड़ों हिंदुस्तानियों की आस्था का पर्व है। इस परम्परा के केन्द्र में आस्था ही है। और आस्था व्यक्ति की होती है। समाज की होती है। जब व्यक्ति और समाज ही नही बचेंगे तो आस्था का क्या करेंगे? कौन मनाएगा कुंभ? कौन लगाएगा पवित्र डुबकी? जन आस्थाएँ ही कुंभ और दूसरे उत्सव मनाती है। कुंभ में जो करोड़ों लोग आते हैं, उन्हें कोई न्योता नहीं दिया जाता। न विज्ञापन। न रहने खाने का प्रबन्ध। न ढोकर लाई जाने वाली बसें। न कोई साजो सामान। उन्हें हमारी आस्था ही खींचकर ले आती है। सो इस आधार को समझिए। जब व्यक्ति बचेगा, समाज सुरक्षित रहेगा, तभी कुंभ होगा। धर्म भी तभी तक है, जब तक उसके मानने वाले है। महाभारत कहता है “धारयते इति धर्मः “अर्थात जब तक धारण करने वाले हैं तभी तक धर्म है। कोई भी धर्म, कर्मकांड, या सम्प्रदाय मनुष्य से ऊपर नहीं है। मनुष्य है, तब ही धर्म है, कर्मकांड है और विचार हैं। अखाड़ा है, महामण्डलेश्वर है। जब जान बचेगी, तभी धर्म का पालन होगा। सभी धर्मों से ऊपर होता है आपद्धर्म। यानी वह धर्म जिसका विधान केवल आपात काल के लिए हो। तो हमारी सनातन परम्परा के वाहक धर्माचार्यों। मनुष्यता को बचाइए। कुंभ को टालिए। वरना जब आपको धर्माचार्य मानने वाले लोग ही नहीं रहेंगे तो ऐसी परम्परा से क्या लाभ ?
देश कोरोना से लड़ रहा है। दवा, अस्पताल, बिस्तर का अभाव है। कोरोना से मुक़ाबला केवल सामाजिक दूरी से हो सकता है। ऐसे में कुंभ का औचित्य क्या है। कौन सा धर्म अपने श्रद्धालुआें को ऐसे मरने की इजाज़त देगा। माना कुंभ की एक सनातन परम्परा है। यही परम्परा और विश्वास हमारे समाज की बुनियाद है। पर आपद्धर्म कहता है कि कुंभ को प्रतीकात्मक बनाया जाय। लोगों की जान बचाने के लिए भीड़ को वापस किया जाय। साधू, संत बैरागी प्रतीकात्मक स्नान करे। अथर्ववेद कहता है प्रजा के दुखी होने पर, राष्ट्र के शोकमग्न होने पर आपद्धर्म का व्यवहार करना चाहिए। मनु स्मृति कहती है- विश्र्वैश्र्च देवैः साधैच्श्र ब्राह्मणैश्र्च महर्षिभि : आपत्सु मरणाभ्दीतैर्विधेः प्रतिनिधिः कृतः। यानी सब देवो, साधुओं, ब्राह्मणों और ऋषियों ने आपत्काल के समय मृत्यु से बचने के लिए आपद्धर्म की रचना की है। उसका पालन कीजिए। कुंभ पहली बार स्थगित होगा या प्रतीकात्मक होगा ऐसा नहीं है। मानवता के संकट पर पहले भी कुंभ स्थगित होते रहे हैं। हरिद्वार में ऐसा हो चुका है। साल 1891 के कुंभ में हरिद्वार में हैज़ा और दूसरी महामारी फैली थी। इस कुंभ में कॉलरा से कुल 1,69,013 यात्री मरे थे। उस दौरान महामारी पर नियंत्रण के लिए नॉर्थ वेस्टर्न प्रोविन्स की सरकार ने मेले पर प्रतिबंन्ध लगा दिया था। दो लाख यात्रियों को मेला क्षेत्र छोड़ने के आदेश दिए जाने के साथ ही रेलवे को हरिद्वार के लिए टिकट जारी न करने को कहा गया था। इन उपायों का सक्रिय रूप से विरोध नहीं किया गया था। इसी तरह सन् 1867 के कुंभ में भी अखाड़ों और साधू संतों ने सोशल डिस्टेंसिंग का पालन किया था-जब महामारी फैली तो ब्रिटिश सरकार ने साफ सफाई पर ध्यान देना शुरू किया और हरिद्वार कुंभ के आयोजन की जिम्मेदारी सरकार ने स्वास्थ्य विभाग को दी। ब्रिटिश सरकार के पुलिसकर्मियों ने एक स्थान पर भीड़ बढ़ने से रोकने के लिए तीर्थयात्रियों को लाइन लगवाकर घाटों पर जाने दिया गया था। इतना ही नहीं, साल 1897 अर्ध कुंभ के दौरान प्लेग फैलने से कनखल का सारा कस्बा खाली करा दिया गया था। सन् 1897 के कुंभ के दौरान अप्रैल माह में प्लेग से कई यात्री मरे। मेला स्थगित हुआ। यही आपदा का धर्म है। अतीत के उदाहरणों से लेकर हमारे धर्मग्रंथ तक इस आपद धर्म के पालन के सीख देते हैं। धर्म ग्रंथों में इस आपद धर्म पर विस्तार से चर्चा भी की गई है। महाभारत में एक प्रसंग है। युधिष्ठिर ने कृष्ण से पूछा-भगवन! आपकी कृपा से मैंने सब धर्मों के संग्रह का एवं भोजन के योग्य और भोजन के अयोग्य अन्न का विषय भी सुन लिया। अब कृपा करके आपद्धर्म का वर्णन कीजिये।
श्रीभगवान बोले, राजन! जब देश में अकाल पड़ा हो, राष्ट्र के ऊपर कोई आपत्ति आयी हो, जन्म या मृत्यु का सूतक हो तथा कड़ी धूप में रास्ता चलना पड़ा हो और इन सब कारणों से नियम का निर्वाह न हो सके तथा दूर का मार्ग तय करने के कारण विशेष थकावट आ गयी हो, उस अवस्था में ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य के न मिलने पर किसी से भी जीवन-निर्वाह के लिये थोड़ा-सा कच्चा अन्न लिया जा सकता है। रोगी, दुखी, पीड़ित और भूखा ब्राह्मण यदि विधि-विधान के बिना भोजन कर ले तो भी उसे प्रायश्चित नहीं लगता। आज एक बार फिर से भगवान कृष्ण मानवता को यही रास्ता दिखा रहे हैं। आवश्यकता आंखे खोलने की है। मैं सनातनी हिन्दू हूँ। 1977, 89, 2001 और 2013 के प्रयाग महाकुम्भ में स्नान कर चुका हूँ। मानता हूँ कि कुंभ हमारी आस्था का महापर्व है। इनमें से बाद वाले तीन कुंभ को तो रिपोर्ट भी किया है।शायद कई महामण्डलेश्वर ने भी चार महाकुंभ के स्नान नहीं किए होंगे। पर इस वक् का धर्म यही है कि मनुष्यता की रक्षा के लिए कुभ्म को टाला या प्रतीकात्मक बनाया जाय। यह अभूतपूर्व समय है और अभूतपूर्व समय अभूतपूर्व फैसलों की मांग करता है। इंसान और इंसानियत को बचाने से बड़ा पुण्य या धर्म कोई दूसरा नही। यही कुंभ की प्रेरणा है। सो धर्माचार्गण! धर्म का निर्वहन कीजिए। इतिहास और भविष्य दोनो आपकी ओर देख रहे हैं।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)
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