Sunday, April 5, 2026
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प्रियंका के मौन व्रत में कम भीड़ बता रही थी यूपी में कांग्रेस की सांस लौटना है मुश्किल

-प्रियंका में अब 2019 की तरह भीड़ जुटाने की क्षमता भी नहीं दिख रही

-यूपी कांग्रेस का अंदरूनी कलह भी उसे कर रहा राजनीति में पीछे

लखनऊ (हि.स.)। लखीमपुर खीरी की घटना को हाथों-हाथ लेकर यूपी में अंतिम सांस ले रही कांग्रेस को जिंदा करने की कोशिश में लगी प्रियंका को अभी सफलता हाथ लगते नहीं दिख रही। अब 2017 में प्रयागराज से शुरू की गयी उनकी नाव यात्रा वाला आकर्षण भी नहीं दिखता, जिससे उनके कार्यक्रमों लोगों की भीड़ जुटे। अभी सोमवार को लखनऊ के अटल चौक स्थित गांधी प्रतिमा के सामने उनके द्वारा लखीमपुर में किसानों व अन्य की हुई मौत मामले में मौन व्रत रखा गया था। वहां जुटी भीड़ को देखकर यही लगता है कि कांग्रेस कार्यकर्ताओं में उत्साह खत्म हो चुका है।

अटल चौक पर प्रमोद तिवारी, पीएल पुनिया, आराधना मिश्रा दीपक सिंह सहित कई कांग्रेस के बड़े नेताओं की मौजूदगी के बावजूद पांच सौ भी कार्यकर्ताओं की संख्या नहीं थी। वहां लोगों द्वारा यह भी कहते सुना गया कि इससे ज्यादा भीड़ तो किसी सामान्य नेता के कार्यक्रम में हो जाता है, जबकि किसान आंदोलन को लेकर प्रियंका वाड्रा बहुत दिनों से सक्रिय हैं। लखीमपुर में हुई घटना के दिन ही वे दिल्ली से चल दी थीं। सीतापुर में आते-आते उन्हें पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया था। उन्होंने मामले को बहुत गर्माने की कोशिश की। इस मामले वे पूरे विपक्ष की अपेक्षा ज्यादा सक्रिय रहीं।

2019 से भी आकर्षण हो गया है कम

इसके बावजूद उनके कार्यक्रम में कार्यकर्ताओं का काफी कम संख्या में आना यह बताता है कि 2019 से भी उनके प्रति कार्यकर्ताओं का आकर्षण कम हो गया है, जब वे सक्रिय राजनीति में आयी थीं और महासचिव बनने के बाद चुनाव से पूर्व प्रयाग संगम से वाराणसी तक नाव से यात्रा की थीं। उस समय चुनाव में वे भले अपने कार्यक्रम उमड़ी भीड़ को वोट में बदल नहीं पायीं लेकिन लोगों उनको देखने के लिए काफी उत्सुकता थी। लोग उन्हें इंदिरा के रूप में देख रहे थे।

2004 से ही रायबरेली व अमेठी में कर रहीं चुनाव प्रचार, फिर भी नहीं दिखा असर

वैसे तो प्रियंका की राजनीतिक प्रवेश देखा जाय तो अपनी मां का चुनाव प्रचार उन्होंने 2004 में ही शुरू कर दिया था। उस समय वे रायबरेली निवासी रमेश बहादुर सिंह के घर पर एक माह तक मेहमान के रूप में ठहरी थी। वे प्रचार करने भी अकेले निकलती थीं। उनकी भाषा शैली भी लोगों को काफी पसंद था। चुनाव में सक्रिय न रहते हुए भी वे अमेठी और रायबरेली में हमेशा अपनी सक्रियता दिखाती थीं। 2012 के विधानसभा चुनाव में अमेठी में राबट्रा बाड्रा व अपने बच्चे के साथ चुनाव मैदान में थी और प्रत्याशियों का प्रचार करती रहीं लेकिन फिर भी कुछ विशेष नहीं कर पायीं। 2017 विधानसभा चुनाव में उन्हीं की मध्यस्थता से कांग्रेस व सपा का गठजोड़ हुआ लेकिन उनकी सक्रियता नहीं रहीं।

जब बनी थीं कांग्रेस महासचिव तबसे यूपी में हैं सक्रिय

उनकी सक्रियता तब शुरू हुई, जब 23 जनवरी 2019 को वे कांग्रेस की महासचिव बनायीं गयी। इसके साथ ही यूपी का प्रभार भी दिया गया। इसके बाद से वे लगातार सक्रिय हैं। उत्तर प्रदेश में छोटे-छोटे मुद्दों को भी बड़ा करने का प्रयास करती रहती हैं। इसके बावजूद कांग्रेस को आक्सीजन नहीं मिल पा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो इसका कारण है, कांग्रेस कार्यकर्ताओं में अंदरूनी कलह का होना।

कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष जेल में थे तो कार्यकर्ता घर में बैठ गये

राजनीतिक विश्लेषक राजीव रंजन सिंह का कहना है कि यूपी में कांग्रेस अंदरूनी कलह के कारण टूट चुकी है। अब इसमें सांसे आना बड़ा मुश्किल काम दिखता है। इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि जब कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष को भाजपा ने जेल भेज दिया तो कांग्रेस कार्यकर्ता घर में बैठ गये। क्या दूसरी किसी पार्टी में ऐसा संभव था? उस समय जरूरत थी, पूरे प्रदेश में सड़क पर उतर कर प्रदर्शन करने व जेल जाने की लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

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