Tuesday, April 7, 2026
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चारे की महंगाई से देशी जानवरों से पालन पर संकट

भूसे और अनाज बढ़ते दाम से पशुपालकों में विदेशी नस्ल के मवेशियों का बढ़ा क्रेज

देशी जानवरों में कम दुग्ध क्षमता के चलते हो रहा मोहभंग

औरैया(हि. स.)। भूसा और अनाज सहित चारे की कीमतों में आए अप्रत्याशित उछाल ने देशी जानवरों के पालन पर संकट ला खड़ा किया है। पशुपालक अब विदेशी नस्लों को पालने में अधिक दिलचस्पी लेने लगे हैं। कारण साफ है कि इनसे दुग्ध उत्पादन क्षमता अधिक होती है।

ग्रामीण परिवेश में लोग पशुपालन के रूप में गाय और भैंस के रूप में देशी नस्लों को अधिक पसंद करते रहे हैं , जिसके पीछे वह इन देशी जानवरों से मिलने वाले दूध में अधिक पौष्टिकता को वरीयता देना था। मगर बीते अरसे से चारे और अनाज की कीमतों में आई महंगाई ने सारा नजरिया ही बदलकर रख दिया, अब लोग चारे पर आने वाले खर्चे की रिकवरी को लेकर संजीदा हुए और विदेशी नस्लों की गायों और भैंसों से इनकी अपेक्षा अधिक दुग्ध क्षमता होती है, को तवज्जो देने लगे। पशुपालक मेघनाथ यादव बताते हैं कि जितना एक देशी गाय का प्रतिदिन का भोजन खर्चा आता है उतना ही खर्चा एक साहीवाल या मारवाड़ी गाय पर आता है मगर दुग्ध उत्पादन क्षमता के मामले में काफी लम्बा अंतर है। जहां देशी गाय औसतन 8 से10 लीटर दूध देती है , वहीं विदेशी नस्ल की गाय दोगुना दूध देती है। रही बात गुणवत्ता की तो दोनों का दूध बाजार में लगभग एक ही रेटपर बिक रहा है।अनुज तिवारी कहते हैं कि यही हाल भैंसों को लेकर है जहां भदावरी और हरियाणवी भैंसों की मांग बढ़ी है। लोग अब देशी नस्ल की भैंसों को तवज्जो नहीं दे रहे हैं। अनुमान के मुताबिक पिछले साल और आज के चारे और अनाज की कीमतों पर बात करें तो कई गुना महंगाई ने आम पशुपालक की कमर तोड़ दी है जबकि दूध की कीमतों में कोई खास फर्क नहीं आया है। यही हाल रहा तो आने वाले समय में देशी जानवर अतीत का हिस्सा बनकर रह जाएंगे।

सरकार करे सहयोग तो हो बचें देशी मवेशी

किसान गोविंद गुर्जर का कहना है कि वह बचपन से ही देशी जानवरों का शौक पालते रहे हैं मगर अब कमर तोड़ महंगाई ने देशी जानवरों से निकलने वाले दूध की गुणवत्ता से मुंह फेरना पड़ रहा है। अगर सरकार उन्हे कोई सब्सिडी स्कीम लाकर लाभान्वित करे तो इन देशी नस्लों को बचाया जा सकता है।

अधिक लालच बन रहा कारण

पशु चिकित्साधिकारी डा कैलाश बाबू इस सबके पीछे किसानों का अधिक लालच और धन लोलुपता को जिम्मेदार मानते हैं कि अब पशुपालक गुणवत्ता को दरकिनार कर सिर्फ फायदे और खर्चे को लेकर चल रहे हैं । चारे और अनाज की बड़ी कीमतों ने उन्हें विदेशी नस्लों की ओर रुख करने पर मजबूर किया है।

सुनील

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