-बच्चे अपने खिलौनों में व्यस्त तो बड़े दान-पुण्य करने में जुटे
-मेले में मौत के कुएं के करतब देख हैरत में हैं दर्शक श्रद्धालु
गोरखपुर (हि.स.)। मकर संक्रांति के अवसर पर गोरखनाथ मंदिर में लगने वाला खिचड़ी मेला भी पूरे रौब में है। श्रद्धालुओं ने पहले बाबा गोरखनाथ का दर्शन-पूजन किया और फिर मेले का लुत्फ उठाया। सतरंगी मेले में श्रद्धालु खूब आनंदित हैं।
मेले में सजी दुकानें श्रद्धालु दर्शकों को आकर्षित कर रहीं हैं। कोई मिठाई की दुकान पर स्वाद ले रहा है तो कोई सजावट के सामानों को खरीदने में जुटा है। महिलाएं श्रृंगार के सामानों की खरीदादारी में काफी रुचि ले यहीं हैं। लड़कियां भी इन्हीं जैसी दुकानों पर जुट रहीं हैं। बच्चों की रुचि खिलौनों में है। झूले का आनंद भी उठा रहे हैं। बच्चों को तो मानो ठंड का कोई एहसास ही नहीं हो रहा है। बच्चों की चीख पुकार और भय के माहौल में भी उनकी खुशी का ठिकाना नहीं है। करतब दिखाने वाले खिलाडियों के पास भी अच्छी खासी भीड़ है। मौत का कूआं देखने वाले दर्शक हैरत में हैं। इस जानलेवा खेल को एडवेंचर पसंद लोग काफी संख्या में देख रहे हैं। यह मेला यूं तो पहली जनवरी से ही शुरू हो गया है लेकिन इसकी औपचारिक शुरुआत मकर संक्रांति से मानी जाती है। महाशिवरात्रि पर इस मेले का समापन होगा।
त्रेतायुगीन है खिचड़ी चढ़ाने की परंपरा
गोरखनाथ मंदिर में खिचड़ी चढ़ाने की परंपरा त्रेतायुगीन मानी जाती है। मान्यता है कि उस आदि योगी गुरु गोरखनाथ एक बार हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले में स्थित मां ज्वाला देवी के दरबार में पहुंचे। मां ने उनके भोजन का प्रबंध किया। कई प्रकार के व्यंजन देख बाबा ने कहा कि वह तो योगी हैं और भिक्षा में प्राप्त चीजों को ही भोजन रूप में ग्रहण करते हैं। उन्होंने मां ज्वाला देवी से पानी गर्म करने का अनुरोध किया और स्वयं भिक्षाटन को निकल गए। भिक्षा मांगते हुए वह गोरखपुर आ पहुंचे और यहीं धूनी रमाकर साधनालीन हो गए। उनका तेज देख तभी से लोग उनके खप्पर में अन्न (चावल, दाल) दान करते रहे। इस दौरान मकर संक्रांति का पर्व आने पर यह परंपरा खिचड़ी पर्व के रूप में परिवर्तित हो गई। तब से बाबा गोरखनाथ को खिचड़ी चढ़ाने का क्रम हर मकर संक्रांति पर अहर्निश जारी है। कहा जाता है कि उधर ज्वाला देवी के दरबार मे बाबा की खिचड़ी पकाने के लिए आज भी पानी उबल रहा है।
डा. आमोदकांत
