Tuesday, March 3, 2026
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उप्रः रक्त संबंधों के मध्य अचल संपत्ति के हस्तानान्तरण पर स्टाॅम्प शुल्क में मिलेगी छूट : मंत्री रविन्द्र जायसवाल

लखनऊ(हि.स.)। उत्तर प्रदेश के स्टाम्प एवं पंजीयन मंत्री रवीन्द्र जायसवाल ने गुरुवार को कहा कि रक्त संबंधांे के मध्य अचल संपत्ति के हस्तानान्तरण पर अब नागरिकों को स्टाॅम्प शुल्क में छूट मिलेगी। 

मंत्री रवीन्द्र जायसवाल ने कहा कि वर्तमान समय में अपने रक्त संबंधो में अचल संपत्ति के हस्तानान्तरण हेतु स्टॅाम्प शुल्क से बचने के लिए लोग दानपत्र के स्थान पर वसीयत का सहारा लेते हैं। दान पत्र पर स्टाॅम्प एक्ट के अनुसार विक्रय पत्र (बैनामा) की भांति स्टाॅम्प शुल्क देय होता है, जिसका आर्थिक बोझ परिवारों पर अत्यधिक होता है, इस अत्यधिक आर्थिक बोझ से बचने के लिए लोग वसीयत का सहारा लेते हैं। वसीयतनामा, वसीयतकर्ता की मृत्यु के पश्चात ही प्रभावी होता है। रजिस्ट्रेशन एक्ट 1908 की धारा 17 व 18 के प्रावधानों के तहत वसीयत का निबंधन होना आवश्यक नहीं है, इस कारण से बहुधा वसीयत विवादित हो जाती है तथा संपत्ति स्वामी की मृत्यु के पश्चात अनेक विवाद पैदा होते हैं और समाज में विवादों के साथ-साथ अपराधिक घटनाओं में भी बढ़ोतरी होती रहती है जो राम राज्य की परिकल्पना से कोसों दूर है।
उन्होंने जानकारी देते हुए कहा कि देश के अनेक राज्यों यथा उत्तराखंड, हरियाणा, पंजाब तथा महाराष्ट्र आदि के द्वारा अपने प्रदेश में प्रथम श्रेणी रक्तय सम्बंन्ध्यिों के मध्य अचल संपत्तियों के दान विलेख पर देय स्टाॅम्प  शुल्क में छूट प्रदान किये जाने की व्यवस्था की गयी है। उत्तर प्रदेश राज्य में भी रक्त संबंधो में अचल संपत्ति के दान विलेख पर स्टाॅम्प शुल्क एवं निबंधन शुल्क में छूट देने से ऐसे लेखपत्र पंजीकृत कराये जायेंगे, जिससे न सिर्फ समाज में विवादों में कमी होगी अपितु इससे अपराध मुक्त समाज, पारदर्शी सरकार और समाज के प्रति उत्तरदायी सरकार की अपने व्यक्तियों के प्रति उसकी कृतज्ञता का परिचायक होगी।
उन्होंने कहा कि इस प्रकार के हस्तानान्तरण से पारिवारिक सौहार्द बढ़ेगा और कुटुंब की संरचना सुदृढ़ होगी और अनेक पारिवारिक विवादों का अंत हो जायेगा। वर्तमान समय में प्रदेश में दान विलेखों की संख्या अधिक नहीं है। इस प्रावधान से प्रारम्भ में राजस्व में कुछ कमी तो संभावित है परन्तु पारिवारिक विवादों का अंत होने के पश्चात बडी संख्यां में ऐसी अचल सम्पतत्तियां अंतरण हेतु उपलब्ध हो सकेंगी जो कि विवादग्रस्त होने के कारण अंतरण योग्य नहीं थीं और भविष्य में इन संपत्तियों के क्रय-विक्रय से राजस्व की प्राप्ति संभव होगी। इसी प्रकार जनसामान्य में भी वसीयत करने की प्रवृति कम होगी। इस कारण से भी भविष्य में राजस्व वृद्धि की भी पूरी सम्भावना है।
मानवीय पहलू बताते हुए कहा कि इस व्यवस्था से परिवार का मुखिया अपने जीवन काल में ही अपने परिवार को समृद्ध होते हुए और आपसी सौहार्द में अपने परिवार को जीवन यापन हेतु यत्न करते हुए देख सकेंगे और परिवार के सदस्य भी भविष्य में ऐसी सम्पत्तियों पर किसी संभावित विवाद के भय से मुक्त रह सकेंगे और संपत्ति का उपयोग विभिन्न प्रयोगों हेतु कर सकेंगे।

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