मूर्ख दिवस पर हुआ घोंघाबसन्त हास्य कविसम्मेलन’
लखनऊ ( हिस़.)। लखनऊ में अखिल भारतीय सांस्कृतिक, साहित्यिक ‘रंगभारती’ की ओर से मूर्खादिवस पर ‘घोंघाबसन्त सम्मेलन’ आयोजित किया गया। चारबाग स्थित रवीन्द्रालय मे आयोजित कवि सम्मेलन मेें जहां कवियों ने व्यंग्य के तीर छोड़े वहीं अच्छे-अच्छे पुरस्कार भी दिए गए। कवि सम्मेलन में उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री बृजेश पाठक, उनकी पत्नी नमृता पाठक भी शामिल हुई।
मुख्य अतिथि उपमुख्यमंत्री बृजेश पाठक ने कहा कि श्याम कुमार के नेतृत्व में ‘रंगभारती’ ने अनेक नई-नई शुरुआतें कीं, जिनमें से एक है ‘घोंघाबसंतसम्मेलन’। वर्ष 1961 में इसे देश के पहले हास्य कविसम्मेलन के रूप मेंशुरू किया गया था। ‘घोंघाबंसत सम्मेलन’ शीर्श से यह हास्य-उत्सव 62 वर्षो से आयोजित हो रहा है। इसे विश्व का सबसे पुराना हास्य-आयोजनमाना जाता है, साथ ही देशभर में इसकी ख्याति है। आयोजन में श्री बृजेशपाठक की पत्नी श्रीमती नम्रता पाठक भी मौजूद थीं।
इस अवसर पर प्रयागराज से आए अंतरराष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त ‘मूंछ नर्तक’ दुकानजी ने अपनी मूंछों पर मोमबत्तियां जलाकर अद्भुत ‘मूंछ नृत्य’ प्रस्तुत किया। इसके अलावाा इस वर्ष का ‘बेढब बनारसी रंगभारती हास्य-व्यंग्य शिखर सम्मान’ दो प्रसिद्ध रचनाकारों डंडा बनारसी एवं डॉ. पापुलर मेरठी को दिया गया। ‘रंगभारती’ के दिवंगत सदस्यएवं हास्य रस के महाकवि बेढब बनारसी की स्मृति में प्रति वर्ष यह सम्मानदिया जाता है। ‘आयोजक सस्था के सदस्य रहे सुविख्यात अवधी कवि रमई काका के नाम पर‘रंगभारती’ द्वारा इस वर्ष ‘रमई काका रंगभारती सम्मान’ शुरू किया गया। यह सम्मान अवधी के प्रसिद्ध कवि बाराबंकी के विकास बौखल प्रदान किया गया। इसके अलावा कुछ विशिष्ट पुरस्कार भी दिए गए।
कार्यक्रम के आरम्भ में दीप-प्रज्ज्वलन के बाद मशहूर रंगकर्मी विजय वास्तव ने‘रंगभारती’ का परिचय दिया और हास्य कलाकार राजेंद्र विश्वकर्मा एवं चुटकुलेबाज देवकीनंदन के साथ हास्य प्रसंगो की शुरुआत हुई। वरिष्ठ शास्त्रीय गायिका पद्मा गिडवानी ने सरस्वती-वन्दना प्रस्तुत की।
डंडा, वाराणसी ने कविता पढ़ी कि सुरती चबाके थूकने से कुछ नहीं होगा, अपने वतन को फूंकने से कुछ नहीं होगा। कुछ नाम करके देश को आगे बढ़ाइए, कुत्ते की तरह भौंकने से कुछ नहीं होगा। लखनऊ के धर्मराज उपाध्याय ने पढ़ा कि उसके खत का जवाब दे आया प्यार में सब हिसाब दे आया। इश्क अंधा था, मैं अंधों की तरह उसकी मां को गुलाब दे आया। इसके अलावा अन्य कवियों ने भी काव्य पाठ किया।
शैलेंद्र मिश्रा
