Saturday, March 7, 2026
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अयोध्या जैसी पुनरावृत्ति काशी या मथुरा में हुई तो बनेंगे तीन नए पाकिस्तानः शंकराचार्य

राज्य डेस्क

धनबाद। राम मंदिर का निर्माण शुरू हो गया है। यह भारत ही नहीं बल्कि संपूर्ण विश्व के लिए हर्ष की बात है। लेकिन जिस तरह यह कहकर कि अधिकार तो नहीं लेकिन उपहार स्वरूप पांच एकड़ जमीन दे रहे हैं, यह कृत और भाषा दोनों ही अनुचित है। यही चीजें काशी विश्वनाथ और मथुरा में दोहराई जाएंगी तो तीन नए पाकिस्तान बन जाएंगे। यह कृत्य देश को आग की भट्ठी में झोंकने के समान है। यह बातें पुरी गोवर्धन पीठ के पीठाधीश्वर शंकराचार्य निश्चलानंद सरस्वती जी महाराज ने कहीं। वे रविवार को मुरली नगर में आयोजित धर्म, अध्यात्म और राष्ट्र पर संगोष्ठी को संबोधित कर रहे थे। शंकराचार्य ने कहा कि राम मंदिर के निर्माण में जिन संतों ने अपना योगदान दिया है, उनका सम्मान होना चाहिए। यह याद रखना चाहिए कि रामालय ट्रस्ट पर सिर्फ पुरी पीठ के शंकराचार्य ने हस्ताक्षर नहीं किया था, इस वजह से अयोध्या में नरसिम्हा राव के प्रयास के बावजूद वहां मंदिर और मस्जिद एक साथ नहीं बना। प्रश्नोत्तरी कार्यक्रम के दौरान एक सवाल के जवाब में शंकराचार्य ने कहा की महज मनुष्य योनि पा लेने से ही मोक्ष की प्राप्ति नहीं होती। जीव को उसके कर्म ही योनि प्राप्त करवाता है। इसलिए जरूरी है कि मनुष्य शरीर भगवत भक्ति की ओर प्रशस्त करें। उन्होंने कहा कि सच्चिदानंद का नाम ही ब्रह्म है, वही परमात्मा है।

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स्त्री धर्म के महत्व को समझाते हुए शंकराचार्य ने कहा कि पत्नी द्वारा से पति के उद्धार का रास्ता प्रशस्त होना चाहिए। क्रिया भी आप है और कारक भी आप हैं। देवियों का कर्तव्य है कि शील की रक्षा करें, पति को वश में करके उनका स्वभाव परमात्मा में संलग्न करें। पति-पत्नी का संबंध परलोक तक का संबंध होता है। देवियों का सबसे ऊंचा काम है, पति से लेकर बाल गोपाल तक को संस्कारित करने का। माता चाहे तो बच्चे के जीवन को मुक्त बना कर उन्हें भगवत धाम का रास्ता प्रशस्त कर सकती हैं। मृत्यु पर चर्चा करते हुए शंकराचार्य ने कहा कि भगवत प्राप्ति की पूंजी अगले जन्म में काम आती है। बन सके तो मृत्यु को मुक्ति बना लें। जीवन में दर्शन, विज्ञान और व्यवहार तीनों का सामंजस्य जरूरी है। सरायढेला मुरली नगर स्थित संगोष्ठी में नारायण पादुका पूजन के लिए भक्तों की भीड़ उमड़ी। लोगों में शंकराचार्य के दर्शन और नारायण पादुका के स्पर्श करने की होड़ मची थी। अनुष्ठान के अंत में शंकराचार्य ने कई श्रद्धालुओं को दीक्षा दिलवाई।

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