Hexagon Alliance का कच्चे तेल और आम आदमी की जेब पर प्रभाव
गुटनिरपेक्ष नीति और ईरान के साथ संबंध में Hexagon Alliance की भूमिका
अतुल भारद्वाज
अंतरराष्ट्रीय कूटनीति और वैश्विक राजनीति में इन दिनों एक हलचल मची हुई है। 25 और 26 फरवरी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 9 साल बाद इजरायल के एक बेहद ऐतिहासिक और महत्वपूर्ण दौरे पर जा रहे हैं। इस यात्रा पर पूरी दुनिया की नजरें इसलिए टिकी हैं क्योंकि इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने एक बेहद महत्वाकांक्षी Hexagon Alliance का प्रस्ताव रखा है, जिसमें वह भारत को एक मुख्य भागीदार बनाना चाहते हैं। एक आम हिंदुस्तानी के मन में यह सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर यह Hexagon Alliance क्या है? इजरायल को इसमें हमारी जरूरत क्यों है? और सबसे बड़ी बात कि इससे हमारे देश को क्या नफा-नुकसान होने वाला है। मैं इन उलझे हुए अंतरराष्ट्रीय समीकरणों को आम भाषा में समझाने का प्रयास कर रहा हूं, ताकि हर कोई यह समझ सके कि आने वाले समय में दुनिया का नक्शा कैसे बदलने वाला है।
भारत-इजरायल कूटनीति का सफर: ‘डी-हाइफनेशन’ नीति का प्रभाव
इस नए गठजोड़ को समझने से पहले हमें भारत और इजरायल की दोस्ती के ऐतिहासिक सफर को समझना होगा। आधिकारिक तौर पर दोनों देशों के बीच 1992 में कूटनीतिक संबंध स्थापित हुए थे, लेकिन कई दशकों तक यह रिश्ता बहुत ही सतर्कता भरा रहा क्योंकि भारत ऐतिहासिक रूप से फिलिस्तीन का समर्थन करता आया था। 2014 के बाद इस नीति में एक बड़ा बदलाव आया और 2017 में नरेंद्र मोदी इजरायल जाने वाले पहले भारतीय प्रधानमंत्री बने। भारत ने ‘डी-हाइफनेशन’ नाम की एक कूटनीतिक नीति अपनाई, जिसका सीधा मतलब यह है कि भारत ने इजरायल और फिलिस्तीन के साथ अपने रिश्तों को अलग-अलग चश्मे से देखना शुरू कर दिया। यानी, हम फिलिस्तीन के अधिकारों का भी समर्थन करेंगे और इजरायल के साथ अपनी दोस्ती को भी स्वतंत्र रूप से पूरी दुनिया के सामने निभाएंगे। आज इजरायल भारत के सबसे बड़े रक्षा आपूर्तिकर्ताओं में से एक बन गया है, जिससे भारत यूएवी प्रणाली, मिसाइल रक्षा प्रणाली और रडार जैसी तकनीकें खरीदता है। इसी मजबूत होती नींव पर अब इजरायल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू Hexagon Alliance की इमारत खड़ी करना चाहते हैं।
क्या है Hexagon Alliance
अब बात करते हैं इस बहुचर्चित Hexagon Alliance की। हेक्सागॉन का मतलब एक ऐसी ज्यामितीय आकृति से है जिसके छह कोने होते हैं। नेतन्याहू का यह विजन मध्य पूर्व और उसके आसपास के देशों को मिलाकर एक बड़ा रणनीतिक और सुरक्षा ढांचा तैयार करने का है। इस प्रस्तावित नेटवर्क में इजरायल और भारत के साथ-साथ भूमध्यसागरीय देश (जैसे ग्रीस और साइप्रस), उदारवादी अरब देश (जैसे यूएई और बहरीन), अफ्रीकी देश और कुछ अन्य एशियाई देशों को एक सूत्र में पिरोने की योजना है। यह कोई आम समझौता नहीं है बल्कि यह मुख्य रूप से तीन मजबूत स्तंभों पर टिका होगा—आर्थिक सहयोग, कूटनीतिक तालमेल और सबसे महत्वपूर्ण रक्षा सहयोग। इजरायल चाहता है कि यह गठबंधन सिर्फ कागजों पर न रहे, बल्कि व्यापार और तकनीक के साथ-साथ रक्षा के क्षेत्र में भी एक-दूसरे की ढाल बने।

Hexagon Alliances का मुख्य उद्देश्य: कट्टरपंथ और आतंकवाद पर लगाम
जब भी दुनिया में कोई नया गुट बनता है तो वह किसी न किसी खतरे से निपटने के लिए ही बनता है। इजरायल के नजरिए से देखें तो इस Hexagon Alliance का मुख्य उद्देश्य उस कट्टरपंथ और आतंकवाद का मुकाबला करना है जो पूरे क्षेत्र की शांति के लिए खतरा बन चुका है। नेतन्याहू ने स्पष्ट रूप से मध्य पूर्व में पनप रहे दो कट्टरपंथी गुटों की तरफ इशारा किया है। पहला है ‘कट्टरपंथी शिया गुट’, जिसके केंद्र में ईरान है और जिसे हमास, हिजबुल्लाह और यमन के हूती विद्रोहियों का समर्थन प्राप्त है। इजरायल का मानना है कि उसने इस गुट पर गहरी चोट की है। दूसरा खतरा जिसे नेतन्याहू एक उभरते हुए ‘कट्टरपंथी सुन्नी गुट’ के रूप में देखते हैं, उसमें पाकिस्तान, तुर्की और अल-कायदा या आईएसआईएस जैसे चरमपंथी संगठनों की बढ़ती हुई सांठगांठ शामिल है। तुर्की और पाकिस्तान का गठजोड़ भारत के लिए भी चिंता का विषय रहा है, खासकर जब तुर्की कश्मीर मुद्दे पर पाकिस्तान का साथ देता आया है और उसने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान पाकिस्तान को सैन्य सहायता भी की थी। ऐसे में इस गठजोड़ का सीधा लक्ष्य इन कट्टरपंथी ताकतों पर लगाम कसना और एक निवारक ढांचा तैयार करना है।
इजरायल को इस Hexagon Alliance में भारत की जरूरत क्यों है?
यहां यह समझना जरूरी है कि इजरायल को इस Hexagon Alliance में भारत की इतनी सख्त जरूरत क्यों है। अक्टूबर 2023 में गाजा में हुए युद्ध के बाद से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई देशों ने इजरायल से दूरियां बना ली हैं और वह कूटनीतिक रूप से थोड़ा अलग-थलग पड़ गया है। ऐसे में इजरायल को एक ऐसे दमदार साथी की तलाश है जिसकी वैश्विक साख बहुत मजबूत हो। भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, हमारी अर्थव्यवस्था तेज रफ्तार से दौड़ रही है और हमारी सैन्य ताकत का लोहा पूरी दुनिया मानती है। इजरायल यह भलीभांति जानता है कि अगर भारत इस गठबंधन का आधिकारिक हिस्सा बनता है, तो इसे केवल एक मध्य-पूर्वी गुट नहीं माना जाएगा, बल्कि इसे पूरी दुनिया में एक बहुत बड़ी वैधता और वजन मिल जाएगा। नेतन्याहू खुद मानते हैं कि भारत इस पूरे ढांचे का एक बेहद महत्वपूर्ण हिस्सा है और दोनों देशों की सोच एक समान है।
भारत को क्या फायदा होगा? रक्षा, तकनीक और कृषि में सहयोग
आम हिंदुस्तानी के नजरिए से देखें तो सवाल उठता है कि दूसरों के इस रणनीतिक दांव-पेंच में पड़ने से हमें क्या हासिल होगा? कूटनीति की बिसात पर भारत के लिए इसमें बहुत बड़े फायदे छिपे हैं। रक्षा और तकनीक के मामले में इजरायल दुनिया के अग्रणी देशों में से एक है। इस यात्रा के दौरान भारत और इजरायल के बीच लगभग 8.7 अरब डॉलर के भारी-भरकम रक्षा समझौते होने की प्रबल संभावना है। भारत की सबसे बड़ी दिलचस्पी इजरायल की मिसाइल और लेजर रक्षा प्रणाली में है। इजरायल का ‘आयरन बीम’ एक ऐसी चमत्कारिक लेजर तकनीक है जो आसमान से आते हुए किसी भी दुश्मन ड्रोन या मिसाइल को महज एक डॉलर के मामूली खर्च में हवा में ही राख कर सकती है, जबकि पारंपरिक मिसाइलों से उन्हें गिराने में करोड़ों रुपये खर्च होते हैं। इसके अलावा आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, क्वांटम कंप्यूटिंग और ‘स्पाइस 1000’, ‘रैम्पेज’ तथा ‘गोल्डन होराइजन’ जैसी उन्नत मिसाइल प्रणालियों के भारत में निर्माण (मेक इन इंडिया) को लेकर भी बड़े समझौते हो सकते हैं। आम नागरिक की जिंदगी से जुड़े मुद्दों की बात करें तो जल प्रबंधन और कृषि के क्षेत्र में भी इजरायल हमारे लिए वरदान साबित हो सकता है। इजरायल एक रेगिस्तानी देश है, फिर भी वहां पानी की किल्लत नहीं है क्योंकि वे समुद्र के खारे पानी को पीने लायक बनाने की तकनीक में माहिर हैं और उनके पीने के पानी का 95% हिस्सा इसी तकनीक से आता है। भारत अपने सूखाग्रस्त इलाकों के लिए यह अमूल्य तकनीक वहां से ला सकता है।

कूटनीतिक जोखिम: गुटनिरपेक्षता नीति और ईरान के साथ संबंध
अंतरराष्ट्रीय राजनीति में हर फैसले की एक कीमत होती है और इस गठबंधन का हिस्सा बनने में भारत के लिए जोखिम भी कम नहीं हैं। हमारी विदेश नीति का सबसे बड़ा आधार ‘गुटनिरपेक्षता’ और ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ रहा है। आजादी के बाद से ही भारत ने खुद को किसी भी औपचारिक सैन्य गुट में बांधने से बचाया है। यदि भारत सीधे तौर पर नेतन्याहू के इस सुरक्षा गठबंधन से जुड़ता है, तो यह हमारी दशकों पुरानी स्वतंत्र कूटनीति से एक बड़ा भटकाव माना जाएगा। सबसे बड़ा पेंच ईरान को लेकर है। भारत के ईरान के साथ ऐतिहासिक और सभ्यतागत संबंध रहे हैं और वहां हमारा अरबों रुपये का चाबहार पोर्ट प्रोजेक्ट चल रहा है। चूंकि यह Hexagon Alliance सीधे तौर पर ईरान और उसके शिया गुट के खिलाफ बनाया जा रहा है, इसलिए इसमें शामिल होने से ईरान भड़क सकता है और हमारे महत्वपूर्ण व्यापारिक प्रोजेक्ट खतरे में पड़ सकते हैं।
आम आदमी पर असर: कच्चा तेल और महंगाई का डर
इस भू-राजनीतिक तनाव का सीधा असर भारत के आम आदमी की जेब पर पड़ सकता है। भारत अपनी जरूरत का 87% से ज्यादा कच्चा तेल आयात करता है। अगर मध्य पूर्व में इस गुटबाजी की वजह से तनाव बढ़ता है और ईरान समुद्र का रास्ता (होर्मुज जलडमरूमध्य) रोक देता है तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें आसमान छूने लगेंगी। तेल महंगा होने का सीधा मतलब है देश में पेट्रोल-डीजल का महंगा होना, जिससे हर आवश्यक वस्तु की कीमत बढ़ेगी और देश में भयंकर महंगाई आ जाएगी। इसलिए भारत के लिए किसी भी एक पक्ष में खुलकर खड़ा होना अर्थव्यवस्था के लिए घातक हो सकता है।
निष्कर्ष: वैश्विक राजनीति में भारत की स्वतंत्र और मजबूत भूमिका
प्रधानमंत्री मोदी का यह दौरा केवल एक सामान्य द्विपक्षीय यात्रा नहीं है। अपनी यात्रा के दौरान पीएम मोदी इजरायल की संसद ‘नेसेट’ को संबोधित करेंगे। यरूशलम में इनोवेशन कार्यक्रम में हिस्सा लेंगे और होलोकॉस्ट स्मारक ‘याद वाशेम’ का दौरा करेंगे। भारत के लिए यह पूरी स्थिति एक बहुत ही बारीक कूटनीतिक रस्सी पर चलने जैसी है। एक तरफ हमें अपनी सेना के आधुनिकीकरण के लिए इजरायल से विश्वस्तरीय लेजर तकनीक, एआई, मिसाइल रक्षा प्रणाली और आतंकवाद से लड़ने के लिए खुफिया जानकारी चाहिए तो दूसरी तरफ हमें अरब देशों और ईरान के साथ अपने उन पुराने रिश्तों को भी बचाए रखना है जो हमारी ऊर्जा जरूरतों के लिए अत्यंत आवश्यक हैं। भारत संभवतः इस Hexagon Alliance का सीधा सैन्य भागीदार बनने से परहेज करेगा क्योंकि हम अपनी स्वतंत्र विदेश नीति को दांव पर नहीं लगा सकते। हालांकि, पर्दे के पीछे रहकर रक्षा उत्पादन, अत्याधुनिक तकनीक और आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में भारत इजरायल के साथ अपनी इस रणनीतिक साझेदारी को एक नए मुकाम पर जरूर ले जाएगा। यह ऐतिहासिक दौरा इस बात का स्पष्ट संकेत है कि भारत अब वैश्विक राजनीति में केवल एक मूकदर्शक नहीं है बल्कि वह एक ऐसा प्रमुख खिलाड़ी है जिसके इर्द-गिर्द भविष्य की दुनिया का नया संतुलन तय होने जा रहा है।
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