जानिए नेशनल पार्क बंदी के चौंकाने वाली सच्चाई के पीछे के कारण!
मानसून में नेशनल पार्क बंद करने की आखिर क्या मजबूरी? प्राकृतिक संतुलन या पर्यटक असुरक्षा
नालेज डेस्क
अगर आप मानसून के दौरान भारत के किसी प्रसिद्ध नेशनल पार्क में वाइल्डलाइफ सफारी का सपना लेकर पहुंचे हैं और ‘पार्क बंद है’ की सूचना ने आपका उत्साह तोड़ा है, तो आप अकेले नहीं हैं। भारत के जिम कॉर्बेट, रणथंभौर, बांधवगढ़, काजीरंगा जैसे कई बड़े पार्क हर साल जुलाई से सितंबर तक बंद कर दिए जाते हैं। पर सवाल यह उठता है कि नेशनल पार्क आखिर मानसून में ही क्यों बंद होते हैं? जवाब जानकर आपको हैरानी जरूर होगी, क्योंकि इसके पीछे सिर्फ एक नहीं बल्कि कई चौंकाने वाले कारण हैं।
जानवरों का ब्रीडिंग सीजन
पार्क बंद करने का सबसे बड़ा कारण है जानवरों का प्रजनन काल। मानसून का समय जंगलों में बाघ, तेंदुआ, हाथी, हिरण और पक्षियों के लिए संतानोत्पत्ति और पालन-पोषण का समय होता है। घनी हरियाली और भरपूर जलस्रोत नवजात शावकों के लिए पोषक और सुरक्षित वातावरण तैयार करते हैं।
इस संवेदनशील काल में अगर बाहरी गतिविधियां यानी सफारी जारी रहें, तो जानवरों की प्रजनन क्रिया में बाधा पहुंच सकती है। यही वजह है कि नेशनल पार्क प्रशासन मानसून के दौरान पार्क को पूरी तरह से पर्यटकों के लिए बंद कर देता है। यह कदम वन्यजीव संरक्षण की नीति का अभिन्न हिस्सा है।

पर्यटकों के लिए खतरनाक हो जाते हैं नेशनल पार्क
मानसून के दौरान जंगलों में फिसलन भरे रास्ते, कीचड़, टूटे हुए पुल और तेज बारिश का खतरा बना रहता है। कई नेशनल पार्क में ऐसे इलाके होते हैं जहां अचानक जल भराव, भूस्खलन या पेड़ गिरने जैसी घटनाएं आम हैं। इन स्थितियों में जंगल सफारी न केवल कठिन हो जाती है, बल्कि सीधे तौर पर पर्यटकों के जीवन को भी खतरा होता है। पर्यटन स्थलों की सुरक्षा जिम्मेदारी भी नेशनल पार्क प्रबंधन की होती है, इसलिए मानसून में पार्क बंद करना एक ज़रूरी सावधानी मानी जाती है।
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पार्क संरचना की मरम्मत के लिए जरूरी होता है मानसून ब्रेक
मानसून का समय सिर्फ जानवरों के लिए ही नहीं, पार्क की संरचना की मरम्मत और नवीनीकरण के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण होता है। जब पार्क पर्यटकों के लिए बंद रहते हैं, तब वन विभाग सड़कों, वॉच टावर्स, साइनबोर्ड्स और रेस्ट हाउस जैसी सुविधाओं की मरम्मत करता है। जिन स्थानों पर सालभर पर्यटन होता है, वहां बुनियादी ढांचे में टूट-फूट होती ही है। मानसून का यह ऑफ-सीजन पार्क को फिर से तैयार करने और सुरक्षित बनाने का अवसर देता है।

किन प्रमुख नेशनल पार्क में होता है मानसून बंदी का पालन?
भारत के लगभग सभी प्रमुख नेशनल पार्क मानसून के दौरान कुछ समय के लिए बंद कर दिए जाते हैं। यहां प्रमुख उद्यानों की जानकारी दी जा रही है:
जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क (उत्तराखंड): इसके ढिकाला और बिजरानी जोन जून से अक्टूबर या नवंबर तक बंद रहते हैं। अन्य कुछ ज़ोन वर्षभर खुले रहते हैं।
रणथंभौर नेशनल पार्क (राजस्थान): 1 जुलाई से 30 सितंबर तक सफारी पर रोक रहती है, लेकिन जोन 6 से 10 तक सफारी कुछ हद तक चालू रहती है।
दुधवा टाइगर रिजर्व (उत्तर प्रदेश): मानसून के शुरुआती दौर में ही इसे बंद कर दिया जाता है और अक्टूबर के बाद दोबारा खोला जाता है।
काजीरंगा नेशनल पार्क (असम): एक सींग वाले गैंडे के लिए प्रसिद्ध यह पार्क हर साल मई से अक्टूबर तक बाढ़ और अधिक वर्षा के कारण बंद रहता है।
मानसून के बाद फिर से खुलते हैं नेशनल पार्क
अक्टूबर के बाद जैसे ही मौसम साफ होता है और जंगल की मिट्टी फिर से मजबूत हो जाती है, लगभग सभी पार्क दोबारा पर्यटकों के लिए खोल दिए जाते हैं। इस समय जंगल हरे-भरे हो जाते हैं, नदियां भरी होती हैं और जानवर खुलकर विचरण करते हैं। सफारी का यह समय बेहद रोमांचक और दर्शनीय होता है।
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क्या मानसून में कोई नेशनल पार्क खुले रहते हैं?
हालांकि अधिकतर नेशनल पार्क पूरी तरह से बंद हो जाते हैं, कुछ पार्कों के सीमित ज़ोन जैसे रणथंभौर के जोन 6-10 मानसून में खुले रहते हैं। लेकिन यह भी मौसम की स्थिति और सुरक्षा पर निर्भर करता है। कुछ निजी वाइल्डलाइफ रिज़र्व भी मॉनसून में चयनित पर्यटकों के लिए सीमित प्रवेश की अनुमति देते हैं, लेकिन ये अपवाद स्वरूप ही होते हैं।
पार्क बंद होने से होती है आर्थिक क्षति, लेकिन संरक्षण प्राथमिकता
पर्यटन से जुड़े लोगों को इस सीजन में नुकसान का सामना करना पड़ता है, लेकिन जानवरों और पर्यटकों की सुरक्षा को सर्वोपरि रखते हुए नेशनल पार्क प्रबंधन इस बंदी को जरूरी मानता है। यह संरक्षण का प्रतीक है, न कि असुविधा।
यात्रियों के लिए सलाह: नेशनल पार्क सफारी कब प्लान करें?
अगर आप नेशनल पार्क में घूमने की योजना बना रहे हैं, तो नवंबर से मई के बीच का समय सर्वोत्तम है। तब रास्ते सूखे रहते हैं, हरियाली बनी रहती है और वन्यजीव भी आसानी से नजर आते हैं। मानसून में पार्क की बंदी से हतोत्साहित होने की बजाय इसे प्रकृति और जीवन के बीच संतुलन के रूप में देखें।

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