Tuesday, January 13, 2026
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Vikas Divyakirti defamation case : न्यायपालिका पर टिप्पणी कर कानूनी पचड़े में फंसे

मानहानि की शिकायत पर अदालत ने लिया सख्त संज्ञान, Vikas Divyakirti defamation मामले में 22 जुलाई को तलब

नेशनल डेस्क

नई दिल्ली। Vikas Divyakirti defamation केस ने शिक्षा जगत और कानूनी हलकों में सनसनी फैला दी है। दृष्टि IAS कोचिंग संस्थान के संस्थापक और चर्चित यूट्यूबर विकास दिव्यकीर्ति ने अपने वीडियो ‘IAS vs Judge: कौन ज्यादा ताकतवर?’ में न्यायपालिका पर की गई टिप्पणियों से खुद को एक बड़े विवाद में उलझा लिया है। अजमेर की एक अदालत ने इस मामले का संज्ञान लेते हुए उन्हें 22 जुलाई 2025 को कोर्ट में व्यक्तिगत रूप से पेश होने का आदेश दिया है।

दरअसल, विकास दिव्यकीर्ति अपने साफ-सपाट और बेबाक अंदाज के लिए छात्रों में खासे मशहूर हैं। लेकिन इस बार vikas divyakirti defamation विवाद ने उनकी छवि पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। वीडियो में उन्होंने कहा था कि हाईकोर्ट बहुत ताकतवर होता है और अगर मुख्यमंत्री भी अवमानना करे तो कोर्ट उसे सजा दे सकता है। इसके अलावा उन्होंने कॉलेजियम सिस्टम और न्यायिक नियुक्तियों पर भी कटाक्ष किए, जिसे कई लोगों ने न्यायपालिका की गरिमा को ठेस पहुँचाना माना।

यह वीडियो वायरल होते ही अजमेर के वकील कमलेश मंडोलिया ने कोर्ट में vikas divyakirti defamation के तहत मानहानि की याचिका दायर कर दी। अदालत ने सुनवाई के दौरान कहा कि विकास दिव्यकीर्ति ने जानबूझकर लोकप्रियता पाने के लिए न्यायपालिका की छवि को धूमिल किया। अदालत ने भारतीय न्याय संहिता (BNS) 2023 की धारा 356 और IT एक्ट की धाराओं के तहत मामला दर्ज करने का आदेश दिया।

कोर्ट ने माना कि वीडियो में दी गई टिप्पणियां न्यायपालिका की निष्पक्षता और विश्वास को कमजोर करने का प्रयास करती हैं। सुप्रीम कोर्ट के चर्चित अरुंधति रॉय (2002) और प्रशांत भूषण (2020) मामलों का हवाला देते हुए अदालत ने कहा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मतलब यह नहीं है कि आप न्यायपालिका का अपमान करें।

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vikas divyakirti defamation मामले में अपनी सफाई में विकास दिव्यकीर्ति ने दावा किया कि यह वीडियो उनकी अनुमति के बिना किसी तीसरे पक्ष ने एडिट कर अपलोड किया। उन्होंने तर्क दिया कि उनके विचार संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के दायरे में आते हैं। साथ ही, उन्होंने यह भी कहा कि उन्होंने किसी विशेष व्यक्ति या समूह का नाम नहीं लिया और शिकायतकर्ता को “पीड़ित व्यक्ति” नहीं माना जा सकता।

हालांकि, अदालत ने उनके तर्क को खारिज करते हुए कहा कि एक शिक्षक और संस्थान के प्रमुख होने के नाते उन्हें पता होना चाहिए था कि उनका हर शब्द सार्वजनिक और रिकॉर्ड हो सकता है। अदालत ने अजमेर पुलिस को मामले की जांच जारी रखने का भी आदेश दिया।

शिकायतकर्ता कमलेश मंडोलिया ने आरोप लगाया कि वीडियो में vikas divyakirti defamation के तहत गंभीर अपराध हुआ है। उन्होंने कहा कि “हाईकोर्ट दोनों को टांग देगा” जैसे शब्द न्यायपालिका के प्रति जनता के विश्वास को तोड़ते हैं। वकील अशोक सिंह रावत ने कोर्ट में तर्क दिया कि यह बयान न्यायिक प्रणाली के लिए बेहद अपमानजनक और जनता के बीच गलत संदेश फैलाने वाला है।

गौरतलब है कि vikas divyakirti defamation केस से पहले भी विकास दिव्यकीर्ति कई बार अपने बयानों को लेकर विवादों में रहे हैं, लेकिन इस बार मामला काफी गंभीर होता दिख रहा है। 22 जुलाई को कोर्ट में उनकी पेशी पर पूरे देश की नजरें टिकी हुई हैं।

इस पूरे vikas divyakirti defamation प्रकरण ने यह स्पष्ट कर दिया है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की अपनी सीमाएं हैं और किसी भी संवैधानिक संस्था के प्रति की गई टिप्पणी का गंभीर परिणाम हो सकता है। इस प्रकरण ने न केवल शिक्षा जगत बल्कि पूरे समाज को एक कड़ा संदेश दिया है कि जिम्मेदारियों को नजरअंदाज करना महंगा पड़ सकता है।

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