Sunday, February 8, 2026
Homeसाहित्य एवं संस्कृतिविजय दशमी से होता है बच्चों का अक्षराम्भ

विजय दशमी से होता है बच्चों का अक्षराम्भ

डा. माधव राज द्विवेदी

भारतीय परम्परा में आश्विन शुक्ल पक्ष दशमी को विजया दशमी का उत्सव मनाया जाता है। हेमाद्रि, निर्णयसिन्धु, पुरुषार्थ चिन्तामणि, व्रतराज, कालतत्व विवेचन और धर्म सिन्धु आदि ग्रन्थों में विजयादशमी का वर्णन प्राप्त होता है। काल निर्णय के अनुसार, शुक्ल पक्ष की जो तिथि सूर्योदय के समय उपस्थित रहती है। उसी तिथि को उस दिन विहित कृत्य किए जाने चाहिए। हेमाद्रि ने बिद्धा दशमी के विषय में दो नियम प्रतिपादित किए हैं। प्रथम वह तिथि जिसमें श्रवण नक्षत्र पाया जाय और द्वितीय वह दशमी जो नवमी तिथि से संयुक्त हो, स्वीकार्य है। स्कन्द पुराण में विधान किया गया है कि जब दशमी तिथि नवमी से संयुक्त हो तो अपराजिता देवी की पूजा दशमी को उत्तर पूर्व दिशा में अपराह्ण में करनी चाहिए। विजया दशमी वर्ष की तीन प्रमुख तिथियों में एक है।

अन्य दो प्रमुख तिथियां कार्तिक शुक्ल पक्ष और चैत्र शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा हैं। विजयादशमी से बच्चों के अक्षरारम्भ की परम्परा पूर्वकाल में रही है। इसी दिन श्रवण नक्षत्र में राजागण शत्रुओं पर आक्रमण किया करते थे। अपराजिता देवी का पूजन, शमी पूजन और सीमोल्लंघन इस पर्व के प्रमुख कृत्य हैं। लोग अपने गांव या राज्य की सीमा से बाहर जाकर लौट आते थे। उस समय घर की स्त्रियां उनकी आरती करती थीं और वे नए वस्त्राभूषण धारण कर उत्सव मनाते थे। इसी कृत्य को सीमोल्लंघन कहा गया है। विजयादशमी को दशहरा भी कहते हैं। वैसे तो यह उत्सव सभी जातियों के लिए महत्वपूर्ण है, परन्तु राजाओं, सामंतों और क्षत्रियों के लिए इसका विशेष महत्व है। धर्म सिन्धु में अपराजिता पूजन की विधि वर्णित है।

उसके अनुसार, अपराह्न में गांव के उत्तर पूर्व दिशा में जाकर साफ सुथरे स्थान को गोबर से लीप कर चन्दन से आठ कोणों का एक चित्र बनाना चाहिए और ‘मम सकुटुम्बस्य क्षेम सिद्ध्यर्थम् पराजिता पूजनं करिष्ये’ इस संकल्प के साथ उस चित्र के बीच में अपराजिता का आवाहन करना चाहिए। उसके दाएं और बाएं जया और विजया का आवाहन करना चाहिए। साथ ही क्रियाशक्ति और उमा को नमस्कार करना चाहिए। इसके बाद ‘अपराजितायै नमः, जयायै नमः और विजयायै नमः’ मन्त्रों का पाठ कर अपराजिता, जया और विजया का षोडशोपचार से पूजन करना चाहिए और प्रार्थना करनी चाहिए कि हे देवी! मैंने यथाशक्ति जो पूजा अपनी रक्षा के लिए की है, उसे स्वीकार कर आप अपने स्थान को जा सकती हैं। इस पूजा के बाद गांव के बाहर उत्तर पूर्व दिशा में जाकर शमी वृक्ष की पूजा करनी चाहिए। इसके अनन्तर सीमोल्लंघन का कृत्य सम्पन्न करना चाहिए।

कुछ लोगों के मत में इस दिन भगवान् राम और सीता की पूजा करनी चाहिए क्योंकि इसी तिथि को राम ने रावण पर विजय प्राप्त की थी। इस दिन शमी पूजन के विषय में कहा गया है : शमी शमयते पापं शमी लोहित कंटका। धारिण्यर्जुन बाणानां रामस्य प्रियवादिनी।। करिष्यमाणं यात्रायां यथाकालं सुखं मया। तत्र निर्विघ्न कर्त्री त्वं भव श्रीराम पूजिते।। कालिदास के रघुवंश महाकाव्य में शरद् ऋतु के आगमन पर रघु द्वारा वाजिनीराजना नामक शान्ति कृत्य किए जाने का उल्लेख है। निर्णय सिन्धु में वर्णित है कि इस दिन राजा गण शत्रुओं पर आक्रमण करने के पूर्व अपराजिता देवी से प्रार्थना करते थे कि सब पर शासन करने वाली हे देवी, मेरी चतुरंगिणी सेना शत्रुरहित हो जाय और आप की कृपा से मुझे सभी स्थानों पर विजय प्राप्त हो। तिथितत्व में ऐसी व्यवस्था है कि राजाओं को अपनी सेना की वृद्धि के लिए गोशाला के पास जाकर नीराजन करके खंजन पक्षी को देखना चाहिए और उसे इस मंत्र से सम्बोधित करना चाहिए : नीलग्रीव शुभग्रीव सर्वकामफलप्रदम्। पृथिव्यामवतीर्णोसि खंजरीट नमोस्तु ते।।

उत्तर भारत में आश्विन शुक्ल पक्ष प्रतिपदा से दशमी तक दश दिन रामलीलाओं का आयोजन किया जाता है और अन्तिम दिन रावण और उसके सहयोगियों की आकृतियां जलाई जाती हैं। दशहरा उत्सव की उत्पत्ति के विषय में कई कल्पनाएं की गईं हैं। कुछ लोगों का मानना है कि नये अन्नों की हवि देने के लिए यह कृषि उत्सव मनाया जाता है और द्वार पर धान की अधपकी बालियां टांगकर गेहूं आदि अन्नों के अंकुरों को पगड़ी पर रखकर हर्ष व्यक्त किया जाता है। कुछ लोग इसे रणयात्रा के शुभारंभ का उत्सव मानते हैं। एक अन्य मत के अनुसार, दुर्गा पूजन के बाद दसवें दिन यह उत्सव मनाया जाता है। अतः इसे दशहरा कहते हैं। विजयादशमी के पावन पर्व पर सभी मित्रों, आत्मीय जनों और देशवासियों को हार्दिक बधाई एवं अनन्त शुभकामनाएं।
(लेखक एमएलके पीजी कालेज बलरामपुर में संस्कृत विभागाध्यक्ष रहे हैं।)

कलमकारों से ..

तेजी से उभरते न्यूज पोर्टल www.hindustandailynews.com पर प्रकाशन के इच्छुक कविता, कहानियां, महिला जगत, युवा कोना, सम सामयिक विषयों, राजनीति, धर्म-कर्म, साहित्य एवं संस्कृति, मनोरंजन, स्वास्थ्य, विज्ञान एवं तकनीक इत्यादि विषयों पर लेखन करने वाले महानुभाव अपनी मौलिक रचनाएं एक पासपोर्ट आकार के छाया चित्र के साथ मंगल फाण्ट में टाइप करके हमें प्रकाशनार्थ प्रेषित कर सकते हैं। हम उन्हें स्थान देने का पूरा प्रयास करेंगे :
जानकी शरण द्विवेदी

मोबाइल 09452137310
सम्पादक
E-Mail : jsdwivedi68@gmail.com

RELATED ARTICLES

Most Popular