वाराणसी(हि.स.)। शारदीय नवरात्र और दशहरा के बाद अब धर्म नगरी काशी में शरद पूर्णिमा को लेकर लोगों में खासा उत्साह है। बंगाली समुदाय कोजागरी पूजा के तैयारियों में जोर-शोर से जुट गया है।
आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि शरद पूर्णिमा (कोजागरी पूर्णिमा) इस बार 30 अक्टूबर को है। सांयकाल 05 बजकर 45 मिनट पर पूर्णिमा तिथि लग रही है। जो अगले दिन 31 अक्टूबर को रात 08 बजकर 18 मिनट तक रहेगी। आश्विन पूर्णिमा के विविध नामों में ‘शरद (कोजागरी) पूर्णिमा’, ‘नवान्न पूर्णिमा’ अथवा ‘शरद पूर्णिमा’ है । जिस दिन पूर्णिमा पूर्ण होती है, उस दिन ‘नवान्न पूर्णिमा’ मनाई जाती है।
सनातन संस्था की ज्योतिष फलित और वास्तु विशारद प्राजक्ता जोशी के अनुसार अश्विन पूर्णिमा की उत्तररात्रि को लक्ष्मीदेवी ‘को जागरति’ अर्थात ‘कौन जाग रहा है ?’, ऐसा पूछती हैं; इसलिए इस पूर्णिमा को ‘कोजागरी पूर्णिमा’ कहते हैं। किसान अश्विन पूर्णिमा को प्रकृति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए नए अनाज की पूजा कर उसका भोग लगाते हैं; इसलिए इस पूर्णिमा को ‘नवान्न पूर्णिमा’ कहते हैं । उन्होंने बताया कि अश्विन पूर्णिमा शरदऋतु में आती है; इसलिए इस पूर्णिमा को ‘शरद पूर्णिमा’ कहते हैं।
उन्होंने बताया कि पूर्णिमा तिथि दो दिन हो तो ज्योतिष शास्त्र के अनुसार सूर्योदय के समय जो तिथि होती है उसे ग्राह्य माना जाता है। हिन्दू पंचांगों के अनुसार अश्विन महीने में मध्यरात्रि की पूर्णिमा को शरद पूर्णिमा (कोजागरी पूर्णिमा) मनाई जाती है । उन्होंने बताया कि इस दिन चंद्रमा पृथ्वी के सर्वाधिक निकट रहता है। इस दिन देवी लक्ष्मी और इंद्र देवता का पूजन किया जाता है । इस कारण माता लक्ष्मी की कृपा से सुख समृद्धि प्राप्त होती है । रात्रि को दूध में चंद्रमा का दर्शन करने से चंद्रमा की किरणों के माध्यम से अमृत प्राप्ति होती है।‘अश्विन पूर्णिमा’ को चंद्रमा अश्विनी नक्षत्र में होता है। अश्विनी नक्षत्र के देवता ‘अश्विनी कुमार’ हैं। अश्विनीकुमार सर्व देवताओं के चिकित्सक हैं। उन्होंने बताया कि अश्विनीकुमार की आराधना करने से असाध्य रोग ठीक होते हैं। इसलिए वर्ष की अन्य पूर्णिमाओं की तुलना में अश्विन पूर्णिमा को चंद्रमा के दर्शन से कष्ट नहीं होता।
उन्होंने बताया कि चंद्रमा मातृ कारक ग्रह है, अर्थात कुंडली के चंद्रमा से माता के सुख का अध्ययन करते हैं। अश्विन पूर्णिमा को चंद्रमा की साक्षी से माता कृतज्ञता भाव से अपनी ज्येष्ठ संतान की आरती उतारती है, क्योंकि प्रथम संतान के जन्म के उपरांत स्त्री को मातृत्व का आनंद प्राप्त होता है।
ज्योतिषविद के अनुसार इस दिन देर रात चावल की खीर बनाकर छत पर खुले आसमान के नीचे रखी जाती है। ऐसा कहा जाता है कि इस दिन अमृत वर्षा होती है। इसलिए चंद्रमा के नीचे रखी खीर खाने से कई प्रकार की परेशानिया खत्म होती हैं।
