Wednesday, April 1, 2026
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UP News : नागनथैया मेले की तैयारी पूरी, कोविड प्रोटोकाल का पालन करने पर मेले में शामिल होंगे श्रद्धालु

मेला स्थल पर काशी में कुछ क्षण गोकुल धाम का नजारा, गंगा प्रतीक रूप से बन जाती है यमुना

वाराणसी (हि.स.)। काशी के लक्खा मेला में शुमार तुलसीघाट के विश्व प्रसिद्ध नाग-नथैया लीला की तैयारियों को अन्तिम रूप देने के लिए मंगलवार को मेला आयोजन समिति से जुड़े पदाधिकारी दिनभर जुटे रहे। समिति के सदस्यों के साथ मिल कर माझी समाज के उत्साही युवाओं ने जानकीघाट पर कालिया नाग के प्रतिरूप को तैयार कर लिया।
मेला बुधवार को अपरान्ह तीन बजे से अखाड़ा गोस्वामी तुलसीदास और श्री संकटमोचन मंदिर के महन्त प्रो0 विश्वम्भर नाथ मिश्र की देखरेख में सम्पन्न होगा। कोविड काल को देखते हुए मेले में भीड़ को रोकने के लिए भी मंथन होता रहा। कोरोना संक्रमण के कारण इस बार विदेशी मेहमानों के नहीं आने की संभावना है। कोविड़-19 के गाइडलाइन का पालन कराने के लिए अफसर भी तैयार है। 
आयोजन समिति से जुड़े सदस्यों ने बताया कि गंगा में जल प्रदूषण रोकने का संदेश देने के लिए लक्खा मेला का आयोजन होता है। परम्परानुसार तुलसीघाट पर मेले की शुरूआत अपरान्ह तीन बजे शुरू होगी। मेले में नटखट कान्हा और उनके बाल सखा गंगा नदी प्रतीक रूप से यमुना के किनारे कंचुक गेंद खेलते है। खेलते—खेलते गेंद गंगा प्रतीक रूप से यमुना नदी में चली जाती है। यमुना नदी में विषधर कालियानाग के कारण कोई नदी के किनारे भी नहीं जाना चाहता। बाल सखाओं के दबाव पर कान्हा शाम 4.40 बजे कदम्ब की डाल के उपर चढ़कर यमुना में कूद जाते हैं।
काफी देर तक कान्हा जब नदी से बाहर नहीं निकलते तो बाल सखा व्याकुल हो जाते हैं।  कुछ समय बाद कान्हा कालियानाग का मान मर्दन कर उसके फन पर नृत्य मुद्रा में वेणुवादन कर प्रकट होते हैं। यह मनोहारी दृष्य देख पूरा गंगा तट और वहां उपस्थित श्रद्धालु, देशी-विदेशी पर्यटक नटवर नागर की जय जयकार, हर-हर महादेव के गगनभेदी उद्घोष से फिजाओं को गुंजायमान कर देते हैं। इसके बाद कान्हा की महाआरती देख श्रद्धालु निहाल हो जाते है। लीला का यहीं समापन होता हैंं। मेला देखने के लिए जुटती है लाखों की भीड़तुलसीघाट के ऐतिहासिक व लक्खा नागनथैया मेला की शुरूआत 450 साल पहले गोस्वामी तुलसीदास ने की थी। मेले में परम्परानुसार काशीनरेश के उत्तराधिकारी महाराज कुंवर अनन्त नारायण सिंह अपने दोनों पुत्रों के साथ रामनगर दुर्ग से गंगा में बड़े स्टीमर के काफिले में तुलसीघाट पहुंचते हैं। महाराज कुंवर यहां स्टीमर में सवार होकर ही लीला की प्रदक्षिणा करते हैं, इसके बाद स्टीमर गंगा में रूकता है। इसके कुछ देर बार तुलसीघाट पर बने कदम्ब वृक्ष की डाल से भगवान श्रीकृष्ण के स्वरूप यमुना में कूदते हैं। पहले से ही तैयार प्रशिक्षित गोताखोर भगवान के स्वरूप को गोद में लेकर गंगा में बने कालियानाग के फन पर विराजमान कराते हैं। कालिया नाग के फन पर वेणुवादन करते भगवान श्रीकृष्ण के स्वरूप में काशी में विश्वास है कि स्वयं भगवान का अंश रहता है। पूरी लीला के दौरान भगवान भोले की नगरी गोकुल बन जाती है। विश्वास है कि काशी पुराधिपति बाबा विश्वनाथ भी इस लीला को देखने आते हैं। बाबा विश्वनाथ के प्रतिनिधी के तौर पर काशीराज परिवार स्वयं उपस्थित होता है। लीला के समापन के बाद महाराज कुंवर लीला कमेटी के व्यवस्थापक को परम्परानुसार प्रतिवर्ष सोने की गिन्नी (स्‍वर्ण मुद्रा) भी देते हैं। 

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