प्रयागराज (हि.स.)। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने रामपुर के मसवासी नगर पंचायत के अध्यक्ष को पद से हटाने की मांग में दाखिल याचिका पर हस्तक्षेप करने से इंकार कर दिया है और कहा है कि कानून के तहत चयनित व्यक्ति को पद से हटाने की प्रक्रिया विहित है। जिसके तहत ही किसी को पद से हटाया जा सकता है।
किसी भी जनता द्वारा चुने हुए प्रतिनिधि को पद से हटाने का आदेश नही दिया जा सकता। कोर्ट ने याचिका खारिज कर दी है और पंचायत सदस्य याची को पंचायत अध्यक्ष को हटाने के लिए कानूनी प्रक्रिया अपनाने की छूट दी है। यह आदेश न्यायमूर्ति एस.पी केशरवानी तथा न्यायमूर्ति डॉ. वाई.के श्रीवास्तव की खंडपीठ ने नगर पंचायत सदस्य महेश चंद्र भारद्वाज की याचिका पर दिया है।
याची का कहना था कि नगर पंचायत अध्यक्ष ने ठेकों के आवंटन एवं विकास कार्यो में भारी वित्तीय घपले-घोटालों किये है। जिसकी जांच रिपोर्ट आ चुकी है। इसके बावजूद वह पद पर बने हुए हैं। घोटाले रोकने के लिए उन्हें पद से हटाया जाय। सरकारी अधिवक्ता का कहना था कि नगर पालिका अधिनियम की धारा 48 में चुने हुए पंचायत अध्यक्ष को पद से हटाने की कानूनी प्रक्रिया दी गयी है। ऐसे में याचिका पोषणीय नहीं है। इस याचिका को खारिज की जाय।
कोर्ट ने संविधान के 74वें संशोधन से स्थानीय चुनी हुई जनतांत्रिक सरकार के उपबंधों एवं सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि संविधान की मंशा निचले स्तर पर जनतंत्र को लागू करने की है। संविधान संशोधन से लोकल सेल्फ गवर्नमेंट की परिकल्पना को साकार करने का सिस्टम बनाया गया है। पंचायत राज को संवैधानिक दर्जा दिया गया है। चुने हुए प्रतिनिधि को पद से हटाने की कानूनी प्रक्रिया दी गयी है। ऐसे में कानून के तहत ही किसी को पद से हटाया जा सकता है। प्रशासनिक आदेश से नहीं हटाया जा सकता है । कोर्ट ने याचिका खारिज कर दी है।
