प्रादेशिक डेस्क
लखनऊ। अब हर पीएचडी करने वाले शोधार्थी को आठ क्रेडिट का पेडगॉजी कोर्स करना अनिवार्य होगा। इस कोर्स के माध्यम से शोधार्थियों को करिकुलम की समझ, उसमें संशोधन, क्लास रूम में छात्रों से जुड़ने और मूल्यांकन में तकनीकी को समझने का मौका मिलेगा। नई शिक्षा नीति में इसे अनिवार्य किया गया है। यह जानकारी सेंट्रल इंस्टिट्यूट ऑफ एजुकेशन (सीआई) दिल्ली के प्रो. पंकज अरोड़ा ने दी। वह रविवार को डॉ शकुंतला मिश्रा राष्ट्रीय पुनर्वास विश्वविद्यालय में आयोजित राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 पर आयोजित संगोष्ठी को संबोधित कर रहे थे। ’राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के दर्पण में समतामूलक समावेशी शिक्षा एवं अध्यापक’ विषय पर हुए सेमिनार में प्रो. पंकज अरोड़ा ने कहा कि अभी तक उच्च शिक्षा में जो अभ्यर्थी अध्यापक बनने आते हैं, वह पीएचडी और यूजीसी नेट परीक्षा उत्तीर्ण होते हैं। लेकिन अक्सर उनमें करिकुलम, किस समाज क्लास रूम में छात्रों से जुड़ने सहित कई चीजें हैं या नहीं, यह नहीं देखने को मिलती हैं। इसलिए नई शिक्षा नीति में पैडोगॉजी कोर्स शामिल किया गया है। उन्होंने बताया कि नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 में समावेशी शिक्षा का प्राविधान किया गया है। यानी सभी वर्ग को साथ लेकर चलना। इसमे ट्रांस जेंडर के शैक्षिक अधिकारों से लेकर तीन से 15 साल तक के बच्चों के लिए स्कूल स्ट्रक्चर को भी प्राथमिकता दी गई है, ताकि सभी वर्ग के लोग एक समान शिक्षा हासिल कर सकें। सभी बच्चे अपने आप में यूनीक हैं। अलग-अलग भिन्नताएं होती हैं। हर बच्चे के सीखने का तरीका भी अलग होता है। उन्हें सिखाने से पहले का वातावरण विकसित करने का तरीका भी पॉलिसी में शामिल किया गया है।
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दिव्यांगजन विभाग के विशेष सचिव अजीत कुमार ने कहा कि सबसे अच्छा शिक्षक वही जो इंस्पायर करता हो। अध्यापक और अभिभवक ऐसे हैं जो अपने बच्चे को ऊंचा देखना चाहते हैं। जो दोनों का आदर नहीं करता, वो आगे नहीं बढ़ सकता। इसलिए उनकी सुनिए। अनुभव लीजिए। जानिए जरूर। किसी भी चीज की धारणा पहले से न बनाएं। उन्होंने कहा कि शिक्षा में सभी को साथ लेकर चलना जरूरी है। तभी समाज की तस्वीर बदलेगी। आज टेक्नोलॉजी का युग है। शिक्षा भी इसी से जुड़ी होनी चाहिये। दिव्यांगों को भी सामान्य बच्चों की तरह पढ़ना चाहिए। उनके साथ व्यवहार भी वैसा ही होना चाहिए। श्रवण बाधित बच्चों के लिए एक ही लैंग्वेज होनी चाहिए। टीचर्स ट्रेनिंग ऐसी हो ताकि दिव्यांग बच्चों को अच्छे से पढ़ाया जा सके। स्कूल वातावरण भी दिव्यांग फ्रेंडली हो। आगे बढ़ने के लिए चुनौतियां बहुत है। इसलिए आप बेस्ट करने की कोशिश करिए। अपनी किसी भी कमजोरी को शक्ति बनाइये।
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