Tuesday, March 10, 2026
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UP : विभाग के लिए मील का पत्थर साबित होगी ‘कमेंट्री आन पाक्सो एक्ट’

प्रयागराज के आइजी ने किया शिवराज व एमएच जैदी द्वारा लिखित किताब का विमोचन

कार्यशाला में अधिकारियों ने दिए बाल कल्याण अधिकारियों व विवेचकों को कानूनी टिप्स

जानकी शरण द्विवेदी

लखनऊ। पुलिस विभाग के दो अधिकारियों शिवराज तथा एमएच जैदी द्वारा यौन अपराधों से बच्चों की सुरक्षा (पाक्सो) से सम्बंधित विषय पर लिखी गई पुस्तक ‘कमेंट्री आन पाक्सो एक्ट-2012′ विभाग के लिए मील का पत्थर साबित होगी। इस पुस्तक में बताए गए विवेचना की तकनीकी पहलुओं को ध्यान में रखकर विवेचना करने से मजबूत साक्ष्यों के साथ अदालत में आरोप पत्र प्रेषित किया जा सकेगा और कानून की मंशा के अनुरूप ज्यादा से ज्यादा अपराधियों को सजा मिल सकेगी। यह बात प्रयागराज के पुलिस महानिरीक्षक डा. राकेश सिंह ने पुलिस लाइंस प्रयागराज के सभागार में बालकों को लैंगिक शोषण से संरक्षण प्रदान करने के लिये बनाए गए पाक्सो अधिनियम 2012 पर लिखी गए कमेंट्री पुस्तक के विमोचन के अवसर पर बोलते हुए कही। डा. सिंह ने कहा कि पुलिस विभाग के यह दोनों अधिकारी अपनी दक्षता एवं कार्य कुशलता के कारण विभाग में अलग स्थान रखते हैं। साइबर अपराध पर इनके द्वारा लिखी गई पुस्तक में बताए गए टिप्स के सहारे अनेक बैंकों के अधिकारी अपने ग्राहकों को साइबर फ्राड से बचने के लिए जागरूक करते हैं। इस मौके पर अपने सम्बोधन में देवीपाटन परिक्षेत्र के पुलिस महानिरीक्षक पद से सेवानिवृत्त हुए भागवत प्रसाद त्रिपाठी ने कहा कि प्रोटेक्शन आफ चिल्ड्रेन फ्राम सेक्सुअल आफेंसेस (पाक्सो) अधिनियम को महिला और बाल विकास मंत्रालय ने वर्ष 2012 में बनाया था। इस कानून के जरिए नाबालिग बच्चों के प्रति यौन उत्पीड़न, यौन शोषण और पोर्नोग्राफी जैसे यौन अपराध और छेड़छाड़ के मामलों में कार्रवाई की जाती है। दोनों अधिकारियों की जोड़ी ने इस पर विस्तार से टीका लिखकर बहुत ही सराहनीय कार्य किया है। इस मौके पर प्रयागराज के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक शैलेश कुमार पाण्डेय ने एक्ट की विशेषताओं की तारीफ करते हुए कहा कि पाक्सो अधिनियम के तहत रिपोर्ट दर्ज होने के बाद पुलिस की यह जवाबदेही हैं कि पीड़ित का मामला 24 घंटे के अन्दर बाल कल्याण समिति के सामने लाया जाए, जिससे पीड़ित की सुरक्षा के लिए जरुरी कदम उठाये जा सके। इसके साथ ही पीड़ित बच्चे की चिकित्सक जाँच करवाना भी अनिवार्य है। यह चिकित्सीय परीक्षण बच्चे के माता-पिता या किसी अन्य व्यक्ति की उपस्थिति में किया जायेगा, जिस पर बच्चे का पूर्ण विश्वास हो। पीड़ित अगर लड़की है तो उसकी चिकित्सीय जांच अनिवार्य रूप से महिला चिकित्सक द्वारा ही की जानी चाहिए।

UP : विभाग के लिए मील का पत्थर साबित होगी ‘कमेंट्री आन पाक्सो एक्ट’

इससे पूर्व साइबर क्राइम पर भी पुस्तक लिख चुके हैं ये अधिकारी

बताते चलें कि दो भाषाओं (हिंदी और अंग्रेजी) में लिखी गई इस पुस्तक के लेखक शिवराज वर्तमान में गोंडा जिले में अपर पुलिस अधीक्षक तथा मोहम्मद हसन जैदी चाइल्ड प्रोटेक्शन एण्ड साइबर क्राइम लीगल एक्सपर्ट हैं। इससे पूर्व इनके द्वारा साइबर क्राइम पर लिखी गई पुस्तक के लिए यह दोनों अधिकारी केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह से सम्मानित हो चुके हैं। पुस्तक के लेखक शिवराज ने बताया कि पुस्तक में किशोर-किशोरियों के उत्पीड़न पर पाक्सो अधिनियम के प्रावधानों तथा उच्चतम न्यायालय व देश भर के विभिन्न उच्च न्यायालयों द्वारा समय-समय पर इस विषय पर दिए गए फैसलों और दिशा निर्देशों का विस्तृत वर्णन किया गया है। इसके साथ ही पुस्तक में चैप्टर वार पाक्सो अधिनियम का परिचय, पीड़ित और आरोपी का चिकित्सीय परीक्षण, पीड़ित की उम्र का निर्धारण, चाइल्ड पार्नोग्राफी, यौन अपराधी का मनोवैज्ञानिक परीक्षण, दोष सिद्धि एवं अभियुक्तों का बरी होना, पास्को अधिनियम 2012 के तहत जमानत आदि तथा अन्य विभिन्न प्रकार के आनलाइन/आफलाइन लैंगिक अपराधों को कवर किया गया है। अपराध पंजीकरण, विवेचना, चिकित्सीय परीक्षण के साथ-साथ विचारण के अहम बिंदुओं को वर्णित किया गया है। पुस्तक का प्रकाशन आलिया ला एजेंसी सप्रू मार्ग लखनऊ ने किया है।

UP : विभाग के लिए मील का पत्थर साबित होगी ‘कमेंट्री आन पाक्सो एक्ट’

बच्चे के गुम होने पर प्राथमिकी दर्ज होगी, गुमशुदगी नहीं

विमोचन समारोह के उपरान्त प्रयागराज पुलिस के सभी बाल कल्याण अधिकारियों, पुलिस उपनिरीक्षकों, बाल संरक्षण से संबंधित विभिन्न इकाइयों डीसीपीयू, सीडब्ल्यूसी, एसजेपीयू, एएचटीयू, डीपीओ और एनजीओ के साथ पाक्सो अधिनियम के संबंध में कार्यशाला का भी आयोजन किया गया। कार्यशाला को सम्बोधित करते हुए अपर पुलिस अधीक्षक ने कहा कि 18 वर्ष से कम आयु के किसी बच्चे के गायब होने की सूचना मिलते ही थाने पर भादवि की धारा 363 के तहत प्राथमिकी दर्ज की जाएगी, गुमशुदगी नहीं। ऐसा न करने पर हेल्प डेस्क पर बैठी महिला पुलिस अधिकारी, ड्यूटी पर मौजूद लेखक, दिवस अथवा रात्रि अधिकारी और थाना प्रभारी सीधे-सीधे जिम्मेदार होंगे। इसी प्रकार थाने पर किसी के साथ लैंगिक अपराध होने की सूचना मिलते ही सर्वप्रथम थाने का बाल कल्याण अधिकारी उसकी बात महिला पुलिस अधिकारी से कराएगा। महिला पुलिस अधिकारी, थाने पर मौजूद निरीक्षक, उपनिरीक्षक, मुख्य आरक्षी अथवा आरक्षी आदि में से कोई भी हो सकता है। अपराध की पुष्टि होते ही तत्काल अभियोग दर्ज किया जाएगा तथा महिला पुलिस अधिकारी द्वारा दंप्रसं की धारा 161 के तहत पीड़ित का बयान दर्ज किया जाएगा। इस बात का विशेष ध्यान रखना है कि बयान वाले कागज पर उसे दर्ज करने वाले महिला पुलिस अधिकारी का हस्ताक्षर होना है, न कि पीड़ित का। पीड़ित का बयान दर्ज होते समय पीड़ित का वीडियो भी रिकार्ड किया जाएगा, जिसमें पीड़ित और बयान लेने वाला पुलिस अधिकारी दिखना चाहिए। यह बयान पेन ड्राइव में सुरक्षित होगा। इसे केस डायरी का भाग भी बनाया जा सकता है। पुलिस अभिरक्षा में आने के बाद पीड़ित को 24 घंटे के अंदर बाल कल्याण समिति (सीडब्लूसी) के समक्ष पेश करना होगा। इससे पूर्व थाने पर अपराध दर्ज होते ही उसकी एक प्रति सम्बंधित क्षेत्राधिकारी कार्यालय और एक प्रति सीडब्लूसी को अनिवार्य रूप से भेजी जाएगी। किसी अग्रिम विधिक कार्रवाई की जरूरत होने पर पीड़ित को वन स्टाप सेंटर पर रखा जाएगा। कोई भी पुलिस अधिकारी, चाहे वह महिला ही क्यों न हो, उसे अपने आवास अथवा थाने पर रात्रि में नहीं रखेगा। यदि प्राथमिकी, दंप्रसं की धारा 161 और 164 के बयान में भिन्नता है तो सभी को एक साथ रखकर विचारण करते हुए तथा पीड़ित के अन्य निकट सम्बंधियों का बयान दर्ज करते हुए विवेचक तय करेगा कि अपराध किस कोटि का है। ऐसे मामलों में यदि घटना सत्य है तो 60 दिन के अंदर आरोप पत्र लगाना अनिवार्य है।

महिला पुलिस अधिकारी के पर्यवेक्षण में होगा चिकित्सीय परीक्षण

पीड़िताओं के चिकित्सीय परीक्षण, आयु निर्धारण, सुपुर्दगी, देखरेख एवं संरक्षण विषय पर बोलते हुए एमएच जैदी ने कहा कि ऐसे मामलों में ‘एएए’ श्रेणी का चिकित्सीय परीक्षण महिला पुलिस अधिकारी के पर्यवेक्षण में होगा। अधिकांश विवेचक पीड़ित अथवा आरोपी के आयु निर्धारण में आधार कार्ड तथा परिवार रजिस्टर की नकल लगाते हैं, जो विधि मान्य नहीं है। उन्होंने बताया कि हाईस्कूल की परीक्षा के प्रमाण पत्र में अंकित जन्म तिथि सर्वमान्य है। इसके न रहने पर कक्षा आठ या पांच जो भी हो, यदि उसने किसी स्कूल में कभी दाखिला लिया था, तो पंजीकरण रजिस्टर से उसकी जन्म तिथि प्राप्त की जा सकती है। साथ ही सम्बंधित विद्यालय के प्रधान अध्यापक से इस आशय का एक प्रमाण पत्र भी लिया जाना श्रेयस्कर होगा कि विद्यालय के अभिलेखों के अनुसार अमुक की जन्म तिथि यह है। विद्यालय के अभिलेखों में कोई छेड़छाड़ नहीं किया गया है। ऐसा करने से जल्दी कोई भी गलत प्रमाण पत्र जारी करने की हिम्मत नहीं जुटाएगा। यह भी न मिल पाने पर नगर पंचायत, नगर पालिका, नगर निगम अथवा जिला पंचायत द्वारा जारी जन्म प्रमाण पत्र विधि मान्य होता है। चिकित्सीय परीक्षण अंतिम विकल्प होना चाहिए क्योंकि इस वैज्ञानिक प्रक्रिया में कोई निश्चित तिथि निर्धारित नहीं की जा सकती है। ऐसी दशा में बालिग आरोपी को नाबालिग और नाबालिग पीड़िता को बालिग साबित किए जाने की संभावना रहती है। बचाव पक्ष अदालत में इस विन्दु पर ज्यादा फोकस करता है। इसलिए यदि हमारे पास शैक्षिक प्रमाण पत्र उपलब्ध हैं तो चिकित्सीय परीक्षण कराते समय सम्बंधित डाक्टर को स्पष्ट मना कर देना है कि उन्हें आयु निर्धारण के सम्बंध में कोई जांच नहीं करनी है।

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