Thursday, February 12, 2026
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UP-बिहार से झारखंड तक कोरोना काल में भी धूल फांक रहे हजारों वेंटिलेटर

नई दिल्ली |एक वेंटिलेटर सालभर में न जाने कितने लोगों की जान बचाता है। यह जीवन रक्षक उपकरण काफी महंगा होता इसलिए हर अस्पताल में होता भी नहीं। दिल्ली-एनसीआर के बड़े अस्पतालों में भी हमेशा वेंटिलेटर की कमी रहती है। इस तरह के हालात होते हुए भी सैकड़ों वेंटिलेटर यहां वहां धूल फांक रहे हैं। कहीं चलाने वाला नहीं तो कहीं किसी मामूली उपकरण की कमी रह गई है। बिहार, झारखंड, उत्तराखंड और दिल्ली-एनसीआर से डिब्बा वेंटिलेटर की ग्राउंड रिपोर्ट।

कोरोना काल में वेंटिलेटर की मारामारी से पूरा मध्य यूपी जूझ रहा है। बुंदेलखंड के जिलों में हालात कमोवेश बेहतर हैं। मध्य यूपी के आठ जिलों में टेक्नीशियन व सपोर्टिंग स्टाफ न होने से दिक्कत ज्यादा है। पीएम केयर फंड और पहले से मौजूद 250 से ज्यादा वेंटिलेटर में आधे से ज्यादा धूल फांक रहे हैं। सबसे ज्यादा खराब स्थिति कन्नौज मेडिकल कॉलेज की है। यहां कुल 105 वेंटिलेटर थे, जिनमें  30 लखनऊ भेज दिेए गए हैं। बचे 75 इंस्टॉल तो हैं पर अनुपयोगी। जिला अस्पताल में 24 वेंटिलेटर स्टाफ न होने से बेकार हैं। यही हाल फर्रुखाबाद का है। यहां 16 वेंटिलेटर में एक भी काम नहीं कर रहा है, क्योंकि इन्हें चलाने वाला ही कोई नहीं है l कानपुर एक मात्र जिला है जहां न वेंटिलेटर की दिक्कत है न संचालन के लिए प्रशिक्षित पैरामेडिकल स्टाफ और डॉक्टर की। 

स्टाफ ही नहीं है तो चलेंगे कैसे 
बरेली के 300 बेड कोविड अस्पताल में 18 वेंटिलेटर लगाए गए थे जो एक साल से चले ही नहीं। प्रशिक्षित स्टाफ की कमी के चलते कोरोना काल में भी वेंटिलेटर बंद रहे। सीएमओ डाक्टर एसके गर्ग का कहना है कि जल्द ही ट्रेंड स्टाफ मिलने की संभावना है। उसके बाद वेंटिलेटर शुरू हो सकेगा। इसी तरह बदायूं जिला अस्पताल में पांच, राजकीय मेडीकल कालेज में 103 में से 90, शाहजहांपुर मेडिकल कालेज में 54, पीलीभीत में 16 में से 14 वेंटीलेटर चले ही नहीं हैं। सब जगह प्रशिक्षित स्टाफ नहीं है। जिला खीरी में 30 वेंटीलेटर धूल फांक रहे हैं। 

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